इमेज कैप्शन, भारत में माओवाद के प्रभावी इलाक़ों के बड़े हिस्से को सुरक्षाबलों ने अपने क़ब्ज़े में लिया है….में
“नक्सलवाद अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है… बस्तर में अब स्कूल बन रहे हैं, राशन की दुकानें खुल रही हैं,” सोमवार 30 मार्च को लोकसभा में जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह दावा किया.
गृह मंत्री अमित शाह ने एक और अहम दावा किया कि “नक्सलवाद की जड़ ग़रीबी या विकास की कमी नहीं, बल्कि एक विचारधारा है,” और यह भी कि 31 मार्च, 2026 तक देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का लक्ष्य हासिल कर लिया गया है.
हालांकि मंगलवार 31 मार्च को छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने गृह मंत्री अमित शाह के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा, “कल (सोमवार) लोकसभा में अपने बयान में अमित शाह जी ने दावा किया कि हमारी सरकार ने नक्सलवाद के ख़िलाफ़ प्रयासों का समर्थन नहीं किया. यह पूरी तरह गलत है. मैं उन्हें किसी भी समय और स्थान पर इस पर बहस की चुनौती देता हूं. राज्य और देश के लोगों को गुमराह नहीं किया जाना चाहिए.”
इसके पहले लोकसभा में “वामपंथी उग्रवाद से देश को मुक्त करने के प्रयास पर चर्चा” के दौरान तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने सरकार के नक्सलवाद के ख़ात्मे के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा, “अगर नक्सलवाद ख़त्म हो गया है और सामान्य स्थिति लौट आई है, तो फिर बस्तर में भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती क्यों है?”
गृह मंत्री अमित शाह ने अगस्त 2024 में माओवाद की समाप्ति का लक्ष्य दिया था. इसके बाद पिछले लगभग 2 साल में सुरक्षाबलों ने माओवाद विरोधी अभियानों में तेज़ी लाते हुए भारत में माओवाद प्रभावित इलाक़ों के बड़े हिस्से को अपने क़ब्ज़े में लिया है.
इसी बीच, नक्सलवाद के समाप्ति की डेडलाइन के एक शाम पहले संसद के भीतर गृह मंत्री अमित शाह की यह घोषणा निर्णायक मानी जा रही है. लेकिन क्या सच में नक्सलवाद खत्म हो गया है? छत्तीसगढ़, जहां पिछले दो दशकों में माओवाद सबसे ज़्यादा प्रभावी रहा है वहां सब-कुछ सामान्य हो गया है?
दो साल में बस्तर में माओवाद विरोधी अभियान कैसे बदला?
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इमेज कैप्शन, एक समय में 12 राज्यों में फैला ‘रेड कॉरिडोर’ देश के बड़े हिस्से को प्रभावित करता था (फ़ाइल फ़ोटो)
2024 में जब गृह मंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 की समय सीमा तय की, उसके बाद छत्तीसगढ़ में सुरक्षा अभियानों की तीव्रता तेजी से बढ़ी.
बस्तर में पदस्थ एक शीर्ष अधिकारी ने बताया, “इस दौरान सुरक्षाबलों को छूट प्रदान की गई और उन्हें लेटेस्ट टेक्नोलॉजी, बेहतर सुविधाएं दी गईं. साथ ही साथ डिस्ट्रिक्ट रिज़र्व गार्ड्स जैसी टुकड़ियों का बेहतर इस्तेमाल करके सूत्र और जंगल के अंदर सूचना तंत्र तैयार किया गया, जिसने इन दो सालों में माओवादियों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन में बहुत मदद की”.
इन दो वर्षों में, राज्य में 531 माओवादी मारे गए. बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं और हज़ारों माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया. माओवादी संगठन की ऊपरी इकाई, पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी, अपने 24 सदस्यों को खो चुकी हैं, जो या तो मारे गए या सरेंडर कर चुके हैं.
भारत सरकार की माओवाद विरोधी मुहिम ने माओवादियों को सबसे बड़ा झटका मई 2025 में दिया, जब सीपीआई (माओवादी) संगठन के महासचिव नंबाला केशव राव उर्फ़ बसवराजू को सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में अबूझमाड़ में एक मुठभेड़ में मारने की बात कही.
इसके बाद अक्तूबर 2025 में पोलित ब्यूरो सदस्य मल्लोजुला वेणुगोपाल राव ने आत्मसमर्पण कर दिया. इसी महीने एक और वरिष्ठ नेता वासुदेव राव ने भी हथियार डाल दिए.
इस दौरान लगातार छत्तीसगढ़ के जंगलों में सुरक्षाबलों द्वारा चलाए जा रहे अभियान अपनी पकड़ मजबूत करते रहे.
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इमेज कैप्शन, बीते दो वर्षों में, राज्य में 531 माओवादी मारे गए. बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं और हज़ारों माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया (फ़ाइल फोटो)
नवंबर 2025 में केंद्रीय समिति सदस्य और छत्तीसगढ़ में सशस्त्र माओवादियों में सबसे बड़ा नाम माडवी हिडमा की मुठभेड़ में मारे जाने की घटना को भी बड़ा मोड़ माना गया.
फरवरी 2026 में थिप्पिरी तिरुपति उर्फ़ (देवजी), जिन्हें संगठन का संभावित अगला प्रमुख माना जा रहा था, ने भी सरेंडर कर दिया.
इस दौरान, बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों ने 100 से ज्यादा नए कैंप स्थापित किए और करीब 8,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अपनी पहुंच बनाई, जहां पहले राज्य सरकार या केंद्र सरकार की मौजूदगी बेहद सीमित थी.
छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री विजय शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए इस बदलाव को राज्य के संदर्भ में निर्णायक बताया.
उन्होंने कहा, “देश में लगभग 75% नक्सल गतिविधियां छत्तीसगढ़ में केंद्रित थीं और उनका बड़ा हिस्सा बस्तर में था. अब माओवादियों का ज़्यादातर कैडर लगभग ख़त्म हो चुका है, जो हमारे लिए एक बड़ा बदलाव है.”
उन्होंने कहा, “अब छत्तीसगढ़ में केवल 25 से 30 के आसपास सदस्य बचे हैं, जो कांकेर के उत्तर और बीजापुर के दक्षिण के इलाकों में हैं. हालांकि ये लोग अब किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की स्थिति में नहीं हैं. अधिकांश ने हथियार छोड़ दिए हैं और आम लोगों के बीच घुल-मिल गए हैं.”
छत्तीसगढ़ में नक्सल ऑपरेशन्स के प्रभारी अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक विवेकानंद सिन्हा ने बीबीसी से कहा, “पहले जो माओवादियों की फाइटिंग विंग थी (सैन्य ढांचा) वह लीडरशिप को ताकत देती थी, हालांकि अब वह भी लगभग ख़त्म हो चुकी है. जो कुछ कैडर बचे हैं, वह निचले कैडर के सिपाही ही बचे हैं जिनमें नेतृत्व क्षमता नहीं है”.
नक्सलवाद: नक्सलबाड़ी से छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य तक
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इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र, घने जंगलों, कठिन भूगोल और सीमित सरकारी पहुंच के कारण, माओवादी आंदोलन का सबसे मजबूत गढ़ बन गया था (फ़ाइल फ़ोटो)
भारत में नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी. यह एक सशस्त्र किसान आंदोलन था, जिसने धीरे-धीरे एक व्यापक उग्रवादी विचारधारा का रूप लिया.
1970 और 80 के दशक में यह आंदोलन बिहार, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के इलाकों में फैलता गया. 2004 में कई संगठनों के विलय से सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ, जिसने इसे एक केंद्रीकृत संरचना दी.
धीरे-धीरे छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र, घने जंगलों, कठिन भूगोल और सीमित सरकारी पहुंच के कारण, माओवादी आंदोलन का सबसे मजबूत गढ़ बन गया. दंडकारण्य क्षेत्र में नक्सलियों ने समानांतर ढांचा खड़ा किया, जिसमें जन अदालतें, हथियारबंद दस्ते और स्थानीय नेटवर्क शामिल थे.
सरकार के मुताबिक, एक समय में 12 राज्यों में फैला ‘रेड कॉरिडोर’ देश के बड़े हिस्से को प्रभावित करता था, जहां करोड़ों लोग रहते थे.
सरकार के सामने अब क्या चुनौतियाँ हैं?
गृह मंत्री अमित शाह ने अपने लोकसभा के भाषण में कहा कि 2014 के बाद माओवादियों के ख़िलाफ़ सरकारी रणनीति में बड़ा बदलाव आया.
सुरक्षा के मोर्चे पर, अतिरिक्त 596 पुलिस स्टेशन बनाए गए, सुरक्षाबलों के सैकड़ों नए कैंप स्थापित हुए और ड्रोन, सैटेलाइट और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा.
गृह मंत्री ने जानकारी देते हुए बताया कि देश भर में साल 2024 से 2026 के बीच 706 नक्सली मारे गए, 2,218 गिरफ्तार किए गए और 4,800 से ज्यादा माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया.
गृह मंत्री ने यह भी बताया कि, विकास के मोर्चे पर, 17,000 किलोमीटर से ज्यादा सड़कों को मंज़ूरी दी गई, जिनमें से 12,000 किलोमीटर बन चुकी हैं. करीब 5,000 मोबाइल टावर लगाए गए और हज़ारों बैंक शाखाएं, एटीएम और पोस्ट ऑफिस खोले गए.
उन्होंने कहा कि बस्तर जैसे इलाकों में, जहां पहले राज्य सरकारों की मौजूदगी सीमित थी, वहां अब प्रशासन की पहुंच तेज़ी से फैल रही है.
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इमेज कैप्शन, गृह मंत्री ने कहा कि 2014 के बाद माओवादियों के ख़िलाफ़ सरकार की रणनीति में बड़ा बदलाव आया
हालांकि कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि सरकार के लिए चुनौती यहां ख़त्म नहीं हो जाती.
बस्तर में लंबे समय से पत्रकारिता कर रहे विकास तिवारी कहते हैं, “सुरक्षा अभियान के बाद अब सरकार के सामने एक अलग तरह की चुनौती है.”
हजारों लोगों ने आत्मसमर्पण किया है. उनके लिए पुनर्वास नीति बनाई गई है, जिसमें आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और आवास शामिल हैं. लेकिन इन लोगों को मुख्यधारा में टिकाऊ तरीके से शामिल करना आसान नहीं है.
विकास तिवारी कहते हैं, “सशस्त्र माओवाद का असर अब काफ़ी कम हो गया है लेकिन माओवाद के जाने से एक तरह का वैक्यूम बना है. यह देखना होगा कि इसे कैसे भरा जाता है.”
उनके मुताबिक, “स्थानीय स्तर पर लोगों के मन एक आशंका यह भी है कि अब जब माओवादियों का प्रभाव कम हुआ है, तो ज़मीन और संसाधनों पर बाहरी दखल बढ़ सकता है. लोगों के मन में यह डर है कि उनकी ज़मीन कहीं पूंजीपतियों को न दे दी जाए”.
आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी कैडरों को लेकर भी कई सवाल सामने आ रहे हैं.
विकास तिवारी कहते हैं कि सरकार के लिए सिर्फ़ पुनर्वास योजनाएं बनाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि यह देखना भी उतना ही अहम है कि इन्हें समाज में किस तरह स्वीकार किया जाता है.
वह पूछते हैं, “सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को माफ़ कर दिया है लेकिन जिन परिवारों ने हिंसा में अपने लोगों को खोया है, क्या वे इन्हें स्वीकार कर पाएंगे?”
उनके मुताबिक, यह स्थिति संवेदनशील हो सकती है. वह कहते हैं, “अगर किसी आत्मसमर्पित कैडर के खिलाफ स्थानीय स्तर पर हिंसा होती है, तो यह प्रशासन के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है”
सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह भी चुनौती है कि बचे हुए छोटे समूह फिर से संगठित न हो जाएं. पहले लगाई गई आईईडी और जंगलों में छिपे नेटवर्क अभी भी ख़तरा बने हुए हैं.
विकास तिवारी कहते हैं कि सबसे अहम सवाल यह है कि जिन इलाकों में राज्य की पहुंच नई-नई बनी है, वहां भरोसा कैसे कायम किया जाए.
बस्तर की आवाज़ विकास, लेकिन किस तरह का?
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इमेज कैप्शन, कई आदिवासी समुदायों ने बड़े पैमाने पर खनन और चौड़ी सड़कों का विरोध किया है (फ़ाइल फ़ोटो)
बस्तर में रहने वाले लोगों की ज़रूरतें और चिंताएं इस पूरी कहानी का सबसे अहम लेकिन अक्सर अनसुना हिस्सा हैं.
स्थानीय लोगों के लिए सड़क, स्कूल, अस्पताल और राशन जैसी बुनियादी सुविधाएं प्राथमिक मांग रही हैं. लंबे समय तक ये सुविधाएं वहां नहीं पहुंच सकीं.
लेकिन इसके साथ ही, खनन और बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को लेकर आशंकाएं भी हैं. कई आदिवासी समुदायों ने बड़े पैमाने पर खनन और चौड़ी सड़कों का विरोध किया है, यह कहते हुए कि इससे उनके जंगल, ज़मीन और जीवन पर असर पड़ता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.