डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। विशेषज्ञों ने पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र द्वारा प्रस्तावित नई स्थायी संस्थाओं में सदस्यों के चयन मानदंडों पर चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि इससे परियोजनाओं की जांच-पड़ताल कमजोर हो सकती है।
पांच मार्च को जारी मसौदा अधिसूचना के अनुसार, राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरणों (एसईआइएए) और राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समितियों (एसईएसी) का कार्यकाल समाप्त होने या पुनर्गठन में देरी होने पर ये काम करना बंद कर देंगी।
एसईआइएए पर्यावरण मंजूरी देता है, तो एसईएसी परियोजना के मूल्यांकन में उसे सलाह देता है। इनके स्थान पर नई संस्थाएं- पर्यावरण प्रभाव आकलन पर स्थायी प्राधिकरण (एसएईआइए) और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन पर स्थायी समिति (एससीईआइए) काम संभालेंगी। इसमें ”पदेन सदस्य” होंगे, जिसका अर्थ है केंद्र सरकार द्वारा नामित सरकारी अधिकारी या ब्यूरोक्रेट।
सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट में शोधकर्ता शुभ्रजीत गोस्वामी ने बताया, ”यह कदम पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 के परिशिष्ट-6 की कानूनी बाध्यता की अनदेखी करता है। इसके अनुसार, अध्यक्ष और सदस्यों के पास संबंधित क्षेत्र का पर्याप्त अनुभव होना अनिवार्य है, जैसे वे 15 वर्षों का अनुभव रखने वाले प्रख्यात विशेषज्ञ हों या संबंधित क्षेत्रों में उनके पास पीएचडी की डिग्री हो।”
उन्होंने कहा, ”प्रशासनिक निगरानी अक्सर कारोबारी सुगमता पर अधिक जोर देती है, जिससे किसी स्थल-विशेष की पारिस्थितिकी की अनदेखी हो सकती है, जिसके बारे में कोई अनुभवी वनस्पति शास्त्री या पर्यावरण इंजीनियर चेता सकता है।
जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के प्रोफेसर नवनीत विभव ने कहा, हालांकि पदेन सदस्यों के पास पर्यावरण मंजूरी जैसे मुद्दों से निपटने के लिए आवश्यक तकनीकी ज्ञान या विशेषज्ञता हो सकती है, फिर भी मसौदा अधिसूचना में पात्रता मानदंडों को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)