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पश्चिम एशिया में ‘डिजिटल जंग’: लाखों बॉट्स से सच पर हमला, झूठ बन रहा हथियार

Byadmin

Mar 27, 2026


जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अब युद्ध सिर्फ जमीन, आसमान और समुद्र में नहीं लड़ा जा रहा। एक नया, अदृश्य और बेहद खतरनाक युद्ध इंटरनेट पर चल रहा है। मिसाइलें गिरने से पहले ही इंटरनेट मीडिया पर झूठ की आंधी चल पड़ती है।

लाखों नकली अकाउंट मिलकर ऐसी कहानियां फैलाते हैं, जो सच जैसी लगती हैं लेकिन होती पूरी तरह झूठ है। यह नया डिजिटल युद्ध इतना तेज, इतना खतरनाक और इतना असरदार है कि असली खबर आने से पहले ही लोगों के दिमाग में नकली सच बैठ जाता है।

क्या है बॉट आर्मी और कैसे करती है काम?

पश्चिम एशिया के संघर्ष में ईरान ने करीब चार लाख बॉट्स की एक बड़ी डिजिटल सेना तैयार की है। ये बॉट्स असली इंसान नहीं होते, बल्कि कंप्यूटर से चलने वाले नकली इंटरनेट मीडिया अकाउंट होते हैं। पीक समय में दो से चार लाख अकाउंट एक साथ सक्रिय रहते हैं। इनसे रोजाना लगभग 4.4 लाख पोस्ट और हफ्ते भर में करीब 30 लाख पोस्ट किए जाते हैं।

रूस और चीन जैसे सहयोगी देशों के जुड़ने पर यह नेटवर्क और बड़ा हो जाता है और पांच से सात लाख अकाउंट तक पहुंच जाता है। यानी यह किसी छोटे देश की पूरी इंटरनेट आबादी के बराबर है।

हमला कैसे होता है? मिनट-दर-मिनट समझिए

  • शून्य मिनट : मिसाइल हमला शुरू
  • चार-सात मिनट : बॉट्स एक्टिव
  • 15 मिनट : 80,000 से ज्यादा पोस्ट
  • एक घंटा : दो लाख पोस्ट इंटरनेट मीडिया पर छा जाते हैं।
  • यानी पत्रकारों के सच बताने से पहले ही झूठ पूरी दुनिया में फैल चुका होता है।
  • तीन स्तरों में चलता है झूठ का खेल
  • स्लीपर अकाउंट संख्या : 10,000-30,000
  • सालों तक सामान्य पोस्ट (खाना, घूमना, खेल) भरोसा जीतने के बाद अचानक झूठ फैलाना
  • स्ट्रैटेजिक अकाउंट संख्या : 50,000-एक लाख
  • धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलना
  • पोस्ट में एक जैसी भाषा यानी कंट्रोल एक जगह से
  • शाक अकाउंट संख्या : एक-तीन लाख
  • अचानक एक्टिव हर 10 सेकंड में पोस्ट

संकट के समय झूठ की बाढ़ बॉट फार्म : एक कमरा, हजारों नकली लोग एक ही जगह पर 500 से 1000 मोबाइल फोन रखे जाते हैं और हर फोन से कई इंटरनेट मीडिया अकाउंट चलाए जाते हैं। वीपीएन और एआई की मदद से इन अकाउंट्स को इस तरह आपरेट किया जाता है कि वे इंसानों जैसे व्यवहार करें नींद लेना, भावनाएं दिखाना और टाइपो तक करना। इस तरह एक छोटा सा कमरा भी पूरे शहर से ज्यादा ऑनलाइन गतिविधि पैदा करने में सक्षम हो जाता है।

हैशटैग का खेल : कैसे बनता है नकली सच?

जैसे ही हमला होता है, कुछ हैशटैग ट्रेंड करने लगते हैं। जांच में सामने आया कि शुरुआती दौर में 60 से 80 प्रतिशत ट्रैफिक बॉट्स के जरिए बनाया गया था। एक ही दिन में इस नेटवर्क का करीब 3.4 लाख बार इस्तेमाल हुआ। कुल पोस्ट में से लगभग 68 प्रतिशत पोस्ट्स नकली अकाउंट्स से किए गए थे। विशेषज्ञों के मुताबिक, जब कोई बात बार-बार दिखाई जाती है, तो झूठ भी सच जैसा लगने लगता है।

दो बड़े झूठ जिन्होंने दुनिया को गुमराह किया- बहरीन आग का वीडियो (14 मार्च) एक ऊंची इमारत में आग लगने का वीडियो वायरल हुआ, जिसे करीब 50 लाख लोगों ने देखा।

सच्चाई : ऐसी कोई इमारत थी ही नहीं। पूरा वीडियो एआई की मदद से तैयार किया गया था। अमेरिकी नेवी बेस पर हमला (15 मार्च) नकली सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए दावा किया गया कि अमेरिकी नेवी बेस तबाह हो गया। इस पोस्ट को 1.2 करोड़ व्यूज मिले। सच्चाई : बेस पूरी तरह सुरक्षित था, हमला हुआ ही नहीं था। विशेषज्ञ कहते हैं इंसान का दिमाग मानता है ज्यादा लोग बोल रहे हैं तो सच होगा।

बॉट्स क्या करते हैं?

बॉट्स के जरिये झूठ को बार-बार दोहराया जाता है, जिससे ऐसा माहौल बनाया जाता है कि हर कोई वही बात कह रहा है। इस रणनीति को फेक कंसेंस यानी नकली सहमति कहा जाता है। एआई टूल्स अभी सिर्फ 60-70 प्रतिशत फेक कंटेंट ही पकड़ पाते हैं, जबकि करीब 30 प्रतिशत डीपफेक बच निकलते हैं। आने वाले समय में असली और नकली के बीच फर्क करना और भी मुश्किल हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह अब महज हथियारों का नहीं, बल्कि जानकारी का युद्ध भी बन चुका है। सच और झूठ के बीच की रेखा लगातार धुंधली हो रही है। सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि लोग झूठ को सच मान लें, बल्कि यह है कि लोग हर चीज पर शक करने लगें। अब जंग आपकी स्क्रीन तक पहुंच चुकी है।

पश्चिम एशिया का यह संघर्ष साफ दिखाता है कि लड़ाई सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि लोगों के दिमाग और मोबाइल पर भी लड़ी जा रही है। यह बॉट आर्मी हर किसी को सीधे नहीं हराती, बल्कि इतना करती है कि आप सच पहचान ही न पाएं और जब सच पहचानने की क्षमता खत्म हो जाए, तो यही इस युद्ध की सबसे बड़ी जीत होती है।

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