इमेज स्रोत, Asian News International
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से क़रीब 91 लाख वोटरों के नाम हटा दिए गए हैं. यह काम राज्य की मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न (एसआईआर) के बाद हुआ.
यह संख्या राज्य के कुल मतदाताओं का लगभग 12% है, जो बीते साल अक्तूबर में एसआईआर शुरू होने के समय क़रीब 7.66 करोड़ थी.
इन 91 लाख में से 63 लाख से ज़्यादा वोटरों के नाम फ़रवरी में चुनाव आयोग की जारी सूची में ही हटा दिए गए थे. इन लोगों को “अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट” बताया गया.
इसके अलावा 60.06 लाख वोटरों को “अंडर एडजुडिकेशन” यानी जांच के दायरे में रखा गया है. चुनाव आयोग के मुताबिक़ इन लोगों के रिकॉर्ड में “तार्किक गड़बड़ियां” थीं, जैसे नाम की स्पेलिंग, जेंडर में ग़लती, माता-पिता से उम्र का असामान्य अंतर आदि.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद, लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को “अंडर एडजुडिकेशन” हर वोटर की योग्यता को उनके जमा किए गए पहचान के दस्तावेज़ों के आधार पर वेरिफ़ाई करने का काम सौंपा गया था.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
चुनाव आयोग ने सोमवार को इन 60 लाख में से 27 लाख (क़रीब 45%) लोगों को “अयोग्य” घोषित कर दिया गया.
यह क़दम पश्चिम बंगाल में चुनावों से ठीक पहले उठाया गया. वहीं सोमवार को चुनाव आयोग ने 23 अप्रैल को जिन 152 विधानसभा सीटों पर मतदान होना है, उनके लिए वोटर लिस्ट फ्रीज़ कर दी है. बाक़ी 29 अप्रैल को जिन 142 सीटों के लिए मतदान होना है उसके 9 अप्रैल को फ्रीज़ किया जाएगा.
पहले से ही एसआईआर एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना हुआ था, और 90 लाख नाम हटने से विवाद और बढ़ गया.
इमेज स्रोत, Subham Dutta
एसआईआर विवाद में पश्चिम बंगाल केंद्र में क्यों?
एसआईआर की शुरुआत बीते साल सबसे पहले बिहार में विधानसभा चुनावों से पहले हुई थी और बाद में इसे अन्य राज्यों तक बढ़ाया गया. नवंबर और फ़रवरी के बीच एसआईआर की प्रक्रिया नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में हुई.
लेकिन किसी भी राज्य में सबसे ज़्यादा विवाद पश्चिम बंगाल से अधिक नहीं हुआ.
एक ओर राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बीजेपी का कहना है कि यह प्रक्रिया ज़रूरी थी ताकि बांग्लादेश और म्यांमार जैसे देशों से आए “घुसपैठियों” के नाम हटाए जा सकें.
हालांकि दूसरी ओर सत्तारुढ़ टीएमसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए मुस्लिम वोटरों को निशाना बनाया गया, जो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी का बड़ा समर्थन आधार हैं.
यहां तक कि मंगलवार को ममता बनर्जी और बीजेपी नेता अर्जुन सिंह ने अपने-अपने दावों को दोहराया.
कोलकाता के राजनीतिक विश्लेषक शुभमॉय मैत्रा बीबीसी बांग्ला से कहते हैं कि राज्य सरकार, चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के बीच अनबन का एसआईआर एक मुख्य कारण था.
जब मामला कोर्ट में पहुंचा, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भी राज्य और केंद्र सरकारों के बीच “भरोसे की कमी” और “चल रहे विवाद” पर ध्यान दिया और प्रक्रिया को पूरा करने की ज़िम्मेदारी ज्यूडिशियल अधिकारियों को सौंप दी.
इमेज स्रोत, Asian News International
बंगाल एसआईआर में क्या सच में कुछ विवादित है?
संक्षेप में इसका जवाब– हां भी और नहीं भी दोनों है.
फ़रवरी में जब चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट प्रकाशित की थी, तब पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में क़रीब 8% नाम हटाए गए थे. एक अन्य बड़े राज्य तमिलनाडु जहां चुनाव होना है वहां भी क़रीब 74 लाख नाम हटाए गए, जो पश्चिम बंगाल के लगभग समान स्तर है.
इसके अलावा, चुनाव आयोग ने मतदाता लिस्ट से “विदेशियों” के नाम हटाने पर भी कोई ख़ास डेटा नहीं दिया है.
लेकिन विवाद असली आंकड़ों में नहीं, बल्कि प्रक्रिया में है.
सबसे पहले, पॉलिटिकल जानकारों ने बताया है कि “तार्किक विसंगतियां” कैटेगरी, जिसके कारण लाखों वोटर “अंडर ज्यूरिडिक्शन” में आए हैं, उसका ज़िक्र एसआईआर के बारे में चुनाव आयोग के शुरुआती आदेश में नहीं किया गया था. इसे पश्चिम बंगाल से पहले किसी भी राज्य में लागू नहीं किया गया था.
चुनाव आयोग के शुरुआती नियमों के मुताबिक़, अगर कोई वोटर ख़ुद या अपने माता-पिता का नाम 2002 की वोटर लिस्ट से जोड़ सकता था, तो उसे योग्य माना जाता. लेकिन बाद में उसी डेटा में भी “गड़बड़ियां” बताकर लोगों को जांच में डाल दिया गया.
इमेज स्रोत, Asian News International
राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने बीबीसी न्यूज़ बांग्ला से कहा, “बंगाल के एसआईआर में जो हुआ वो बिहार या बाक़ी देश से बिलकुल अलग है.”
“चुनाव आयोग ने यह मानकर शुरुआत की कि बंगाल में वोटर्स की संख्या बहुत ज़्यादा है और उसने एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए राज्य के बाहर से अधिकारियों की एक फ़ौज को काम पर रखा. बंगाल के बारे में ख़ास बात यह भी है कि इन 60 लाख वोटर्स की एक ख़ास कांट-छांट की गई.”
कोलकाता के एक थिंक टैंक सबर इंस्टीट्यूट के एक विश्लेषण में पाया गया कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल ज़िलों में वोटरों के नाम हटाने की संख्या “बहुत ज़्यादा” थी.
ख़ास बात यह है कि सोमवार को “अंडर एडजुडिकेशन” में रखे गए वोटरों में से “अयोग्य” घोषित लोगों की सूची में मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है. उत्तर 24 परगना और मालदा इस सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं.
इमेज स्रोत, Subham Dutta
इन बातों ने तृणमूल कांग्रेस के इस दावे को बल दिया है कि एसआईआर प्रक्रिया में उसके मुस्लिम समर्थन आधार को निशाना बनाया गया.
पिछले महीने कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बीबीसी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से कुछ समुदायों के ख़ुद को निशाना बनाए जाने की भावना पर सवाल किया.
इसके जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार पूरक सूचियां जारी की जाएंगी. मंज़ूरी की यह सूची वेबसाइट पर भी उपलब्ध होगी और चरणबद्ध तरीक़े से जारी की जाएगी.”
वहीं दो अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पश्चिम बंगाल बीजेपी नेता शमिक भट्टाचार्य ने कहा कि पार्टी का “भारतीय मुसलमानों” से कोई विरोध नहीं है, लेकिन वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि “पश्चिम बंगाल, पश्चिम बांग्लादेश न बन जाए.”
इमेज स्रोत, Subham Dutta
हटाए गए वोटरों के लिए आगे क्या रास्ता है?
सोमवार को “अयोग्य” घोषित किए गए वोटरों के नाम तकनीकी रूप से अभी पूरी तरह वोटर लिस्ट से हटाए नहीं गए हैं.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग ने 19 अपील ट्रिब्यूनल बनाए हैं, जहां वोटर अपनी योग्यता पर लिए गए फ़ैसलों के ख़िलाफ़ अपील या आपत्ति दर्ज कर सकते हैं.
लेकिन ये ट्रिब्यूनल मार्च के आख़िर में बनाए गए, यानी चुनाव से लगभग एक महीने पहले.
सोमवार को जब वोटर लिस्ट फ्रीज़ होने में कुछ ही घंटे बचे थे, तब पूरे राज्य में हज़ारों लोग ज़िला प्रशासन कार्यालयों के बाहर अपील दर्ज कराने के लिए लाइन में खड़े दिखे.
लेकिन 9 अप्रैल तक वोटर लिस्ट पूरी तरह फ़ाइनल हो जाने के कारण इन 91 लाख वोटरों के लिए इस चुनाव में अपनी योग्यता साबित कर वोट देने का लगभग कोई मौक़ा नहीं है.
हालांकि अगर वे बाद में अपनी योग्यता साबित कर देते हैं, तो उन्हें अगले चुनावों में वोट देने की अनुमति होगी.
ये हटाए गए वोटर नए वोटर के रूप में भी पंजीकरण नहीं कर पाएंगे क्योंकि इसकी आख़िरी तारीख़ 31 मार्च निकल चुकी है.

इस बीच “अयोग्य” घोषित किए गए लोगों में ग़ुस्सा और निराशा है.
कोलकाता की आलिया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर सैफ़ुल्ला का नाम भी सूची में नहीं है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “2002 की वोटर लिस्ट में मेरे नाम की स्पेलिंग में ग़लती के कारण मुझे अंडर एडजुडिकेशन में डाल दिया गया था.”
उन्होंने कहा, “मैं इतने सालों से अपने सुधारे हुए नाम के साथ वोट देता रहा हूं. मैंने कुछ भी ग़लत नहीं किया. मेरी मां और भाई भी इसी स्थिति में हैं. मैं अपनी मां को रोते हुए नहीं देख पा रहा.”
सोमवार को कोलकाता में एसआईआर के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान, एक वोटर जिसका नाम हटा दिया गया है, उन्होंने इसे “संविधान का उल्लंघन” बताया.
उन्होंने कहा, “मेरा नाम हटा दिया गया है. मैं ट्रिब्यूनल में अपील नहीं करूंगा. मैं हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लड़ूंगा. मैं न्याय के लिए लड़ता रहूंगा, भले ही इस चुनाव में हम ‘डिलीटेड वोटर्स’ ही क्यों न रहें.”
राजनीतिक विश्लेषक शुभमॉय मैत्रा ने इस स्थिति को समझाते हुए कहा कि अयोग्य वोटरों को हटाने की प्रक्रिया में कई योग्य वोटरों के नाम भी हट गए हों, ऐसा हो सकता है.
उन्होंने कहा, “इस प्रक्रिया में सबसे ज़्यादा नुक़सान ग़रीब और समाज के कमज़ोर वर्गों को हुआ है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.