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- Author, इल्मा हसन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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पढ़ने का समय: 7 मिनट
पश्चिम बंगाल का मुर्शिदाबाद ज़िला एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं. पिछले दिनों ज़िले के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणा हुई थी.
11 फ़रवरी को औपचारिक रूप से इस मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू हो गया है. जब से मुर्शिदाबाद ज़िले में ‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण की घोषणा हुई है, राज्य में इसे लेकर सियासी हलचल मची हुई है.
इस मामले के केंद्र में हैं हुमायूँ कबीर, जो पहले सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हुए थे. लेकिन अब उन्होंने अपनी नई पार्टी बना ली है.
वर्ष 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई थी. बाद में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद वहाँ राम मंदिर का निर्माण किया गया. अयोध्या के नज़दीक ही नई मस्जिद के लिए ज़मीन आबंटित की गई थी, लेकिन वहाँ अभी तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है.
अब पश्चिम बंगाल के एक मुस्लिम बहुल ज़िले में बन रही बाबरी मस्जिद बहस के केंद्र में है.
जहाँ एक ओर लोग मस्जिद के नाम और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुए निर्माण को लेकर चर्चा कर रहे हैं, वहीं बेलडांगा और आसपास के इलाक़े के कई लोगों में मस्जिद के निर्माण को लेकर बहुत उत्साह है.
जितना ख़िलाफ़ बोलेंगे, उतना मुसलमान वोट मेरे पास आएगा
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11 फ़रवरी को मस्जिद का निर्माण कार्य शुरू हुआ था, तो क़रीब एक लाख लोग बेलडांगा पहुँचे.
बड़ी संख्या में पुरुषों के अलावा इस कार्यक्रम में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल हुए. बेलडांगा में माहौल मेले जैसा था.
खाने-पीने के स्टॉल लगे थे और ‘आई लव बाबरी’ लिखे कप और टी-शर्ट बेचे जा रहे थे. कई लोगों ने वहाँ आने के लिए काम से छुट्टी भी ले रखी थी.
निर्माण स्थल से कुछ किलोमीटर पहले और बाद तक सड़कों पर मस्जिद के पोस्टर लगे हुए थे.
पश्चिम बंगाल इस्लामिक फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया निर्माण समिति के मुताबिक़ शिलान्यास के दिन क़रीब 1,200 लोगों ने सामूहिक रूप से क़ुरान का पाठ किया. बड़ी संख्या में लोगों ने चंदा दिया और ईंटें दान कीं.
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समिति का दावा है कि मस्जिद का निर्माण स्थानीय सहयोग और दान से किया जा रहा है. ज़मीन समतल की जा चुकी है, फ़ाउंडेशन डाला जा चुका है और अब शुरुआती इमारत की तैयारी चल रही है.
ये मस्जिद चार एकड़ ज़मीन पर बन रही है और अनुमान है कि इसमें 69 करोड़ रुपए की लागत आएगी.
इस पहल के केंद्र में हैं हुमायूँ कबीर. वे मुर्शिदाबाद के भरतपुर क्षेत्र से विधायक रह चुके हैं और पहले तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा थे.
पार्टी के ख़िलाफ़ जाकर बयानबाज़ी के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था. बाद में उन्होंने अपनी अलग ‘जनता उन्नयन पार्टी’ बनाई.
बीबीसी से बातचीत में हुमायूँ कबीर ने कहा, “ममता बनर्जी ने दुर्गा आंगन के लिए पैसे दिए, प्रधानमंत्री ने चुनाव के साल राम मंदिर का उद्घाटन किया. अगर मैं कोशिश करूँ तो ग़लत, और वो करें तो ग़लत नहीं?”
अब जल्द ही होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर कबीर ने कहा, “जितना मेरे ख़िलाफ़ बोलेंगे, उतने मुसलमान वोट मेरे पास आएँगे और हिंदू वोट उनके पास जाएँगे.”
शुक्रवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में ‘बाबर या बाबरी मस्जिद’ के नाम पर किसी भी धार्मिक ढांचे के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका की सुनवाई से इनकार कर दिया.
याचिकाकर्ता के वकील ने ‘बाबर के नाम मस्जिद’ के निर्माण से जुड़ी गतिविधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सुनने से मना कर दिया.
स्थानीय लोग इस पर क्या कहते हैं
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लेकिन स्थानीय लोगों की राय इस मुद्दे पर एक जैसी नहीं है.
बेलडांगा के जब्बार अली शेख़ कहते हैं, “मैं बाबरी मस्जिद देखकर बहुत ख़ुश हुआ. मुसलमान एकजुट हुए हैं. बदलाव ज़रूर आएगा. तृणमूल को थोड़ा नुक़सान होगा. सीट हुमायूँ कबीर को मिलेगी.”
वहीं निर्माण स्थल पर आईं एक युवती मोमो ख़ातून का कहना है, “सबको अपना धर्म पालन करने का अधिकार है. चुनाव धर्म से अलग है.”
शेख़ अलीमुद्दीन इसे राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ते हैं. वे कहते हैं, “राम मंदिर बन गया. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में मस्जिद के लिए भी ज़मीन देने की बात थी. हुमायूँ कबीर हक़ के लिए लड़ रहे हैं, इसका असर चुनाव पर पड़ सकता है.”
मिनाज ख़ातून कहती हैं कि आस्था और राजनीति अलग है. उन्होंने कहा, “जब मस्जिद टूटी थी तब दुख हुआ था. अब बन रही है तो ख़ुशी है. लेकिन इसका चुनाव से कोई लेना-देना नहीं है. मस्जिद के लिए कोई वोट नहीं करेगा.”
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वामपंथी दलों और अन्य पार्टियों के साथ संभावित गठबंधन की बात करते हुए कबीर कहते हैं कि वो 294 में से 90 से 100 सीटें जीतेंगे. कबीर कहते हैं, “सिर्फ़ मुर्शिदाबाद में नहीं, पूरे बंगाल में मुसलमान हमें वोट देगा.”
बेलडांगा से क़रीब 20 किलोमीटर दूर बहरामपुर है. मुर्शिदाबाद का एक ऐसा शहर, जहाँ हिंदू आबादी ज़्यादा है. क्या इस मस्जिद की गूँज और हुमायूं कबीर की चर्चा वहाँ तक पहुँची है?
बहरामपुर के रहने वाले राहुल ने कहा, “हुमायूँ कबीर जो भी करें, उससे यहाँ मुर्शिदाबाद में वोटों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. जो सरकार सत्ता में है, वही सत्ता में बनी रहेगी. मस्जिद के नाम पर एक घोटाला चलाया जा रहा है, लोगों से पैसा लेने का घोटाला, ताकि वह चुनाव के दौरान उसका इस्तेमाल कर सकें.”
दुकानदार बिनता सरकार कहते हैं, “मस्जिद बेलडांगा में बन रही है, इसलिए अभी तक बहरामपुर में इसका ज़्यादा असर नहीं पड़ा है. फिलहाल यहाँ शांति है.”
वहीं के निवासी ईश्वरचंद्र हलदर ने कहा, “उस तरफ़ कोई ढंग की मस्जिद नहीं थी. इसलिए यह मस्जिद बनाई जा रही है और यह ठीक है ख़ासकर स्थानीय मुसलमानों के लिए. लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसका कोई बड़ा राजनीतिक असर होगा, क्योंकि हम धर्मनिरपेक्ष लोग हैं.”
मुर्शिदाबाद का सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ
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मुर्शिदाबाद पश्चिम बंगाल का मुस्लिम बहुल ज़िला है, जहाँ मुसलमान आबादी क़रीब दो-तिहाई मानी जाती है.
ऐतिहासिक रूप से यह ज़िला कांग्रेस का गढ़ रहा, लेकिन पिछले एक दशक में यहाँ तृणमूल कांग्रेस ने अपनी पकड़ मज़बूत की है.
2021 के विधानसभा चुनाव में ज़िले की अधिकांश सीटें तृणमूल के खाते में गई थीं.
हालाँकि बीजेपी के वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई थी और पार्टी ने कई सीटें जीती थीं.
मुर्शिदाबाद में बीजेपी ने मामूली सीटें जीती थीं, लेकिन उसका वोट शेयर बढ़ा.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम वोटों का बिखराव तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है.
अगर हुमायूँ कबीर जैसे नेता सीमित इलाक़ों में भी प्रभाव डालते हैं, तो इससे मुक़ाबला त्रिकोणीय हो सकता है, जिसका सीधा असर नतीजों पर पड़ेगा.
सांप्रदायिक तनाव और हालिया घटनाएँ
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मुर्शिदाबाद ने समय-समय पर सांप्रदायिक तनाव की घटनाएँ देखी हैं. अप्रैल 2025 में भड़की हिंसा में कई लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हुए थे.
इन घटनाओं के बाद राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज़ हुआ.
‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण की घोषणा पर तृणमूल कांग्रेस ने भी सवाल उठाए हैं.
पार्टी ने इस पहल को विभाजनकारी राजनीति बताया है. पार्टी नेता तौसीफ़ अहमद कहते हैं, “क्या मुसलमानों के लिए बंगाल में और जगह नहीं है? आप जो विभाजन की राजनीति करना चाहते हैं, क्या वही करना ज़रूरी है?”
उन्होंने आरोप लगाया, “आप अपनी रोटी सेंक रहे हैं. ये न बंगाल के लिए है और न मुसलमानों के लिए. ज़मीनी हक़ीक़त में तृणमूल कांग्रेस का कोई मुक़ाबला नहीं है.”
वहीं बीजेपी नेता शमिक भट्टाचार्य ने इसे ‘वोट बैंक की राजनीति’ करार देते हुए कहा, “ममता बनर्जी की राजनीति विभाजनकारी है. वो मुस्लिम वोट बैंक को मज़बूत करना चाहती हैं. बाबर की मस्जिद को ग़ुलामी के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है. पश्चिम बंगाल की जनता इसका जवाब देने को तैयार है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.