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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने लगभग 13 घंटे के भीतर ईरान के मामले में एक बड़ा यूटर्न लिया.
सात अप्रैल की शाम ट्रंप ने कहा था कि आज की रात ईरानी सभ्यता हमेशा के लिए मिट जाएगी लेकिन दूसरे ही दिन उन्होंने दो हफ़्ते के युद्धविराम की घोषणा कर दी.
ट्रंप ने कहा कि उन्होंने यह फ़ैसला पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से बातचीत के बाद किया.
ट्रंप ईरान को लगातार धमकी दे रहे थे लेकिन ईरान भी झुकने को तैयार नहीं था. ऐसे में पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ के रूप में उभरा और दो हफ़्ते का युद्धविराम सुनिश्चित करने में मदद की.
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने वार्ता में मध्यस्थता के लिए शरीफ़ और मुनीर की भूमिका की सराहना की.
ये घटनाक्रम दिखाते हैं कि पाकिस्तान मध्य-पूर्व में एक अहम खिलाड़ी बनकर उभरा है. ईरान पर अमेरिका और इसराइल के हमले में सैकड़ों लोग मारे गए हैं और दुनिया के कई देश ऊर्जा संकट की चपेट में आ गए.
ट्रंप ने शहबाज़ शरीफ़ और आसिम मुनीर का नाम लेकर पाकिस्तान को युद्धविराम का श्रेय दिया. इसे पाकिस्तान की बड़ी कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा रहा है.
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‘पाकिस्तान की बड़ी जीत’
वॉशिंगटन स्थित अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के रेजिडेंट सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन ने एक्स पर लिखा है, ”आज रात, पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक जीतों में से एक हासिल की. इसने कई संदेह करने वालों और आलोचकों को भी ग़लत साबित किया, जिन्हें नहीं लगता था कि उसके पास इतने जटिल और जोखिम वाले काम को पूरा करने की क्षमता है. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसने ईरान में संभावित तबाही को टालने में मदद की.”
अमेरिकन एंटरप्राइजेज इंस्टिट्यूट के फेलो सदानंद धुमे ने एक्स पर लिखा है, ”किसी भी तरह से देखें तो यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है. इस्लामाबाद एक ज़िम्मेदार पक्ष के रूप में उभरा है, जिस पर प्रमुख वैश्विक ताक़तों को इतना भरोसा है कि वह एक संभावित वैश्विक तबाही को टालने में मदद कर सकता है.”
कुगलमैन ने अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग से भी कहा, “यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है और दशकों में उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी सफलता की कहानियों में से एक है. इसने कम से कम अभी के लिए दुनिया के हाल के वर्षों के सबसे गंभीर संघर्षों में से एक को टालने में मदद की है.”
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युद्धविराम की घोषणा करते हुए अपने संदेश में शरीफ़ ने शुक्रवार को इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडलों को बातचीत के लिए आमंत्रित किया ताकि लड़ाई का निर्णायक अंत किया जा सके. व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलाइन लेविट ने कहा कि बातचीत के अगले चरण को लेकर चर्चा जारी है लेकिन अभी कुछ भी अंतिम नहीं है.
न्यूयॉर्क टाइम्स ने तीन अज्ञात ईरानी अधिकारियों का हवाला देते हुए रिपोर्ट किया कि चीन के आख़िरी समय में हस्तक्षेप के बाद ईरान ने युद्धविराम प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसमें उसने इस्लामिक गणराज्य से लचीलापन दिखाने और तनाव कम करने का आग्रह किया.
ट्रंप ने समाचार एजेंसी एएफ़पी से कहा कि उनका मानना है कि चीन ने ईरान को युद्धविराम पर सहमत कराने में भूमिका निभाई.
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‘दबाव और बातचीत साथ-साथ’
पूरे मामले में अमेरिका की नीति भी बदलती दिख रही है. कहाँ अमेरिका ईरान को मिटाने की बात कर रहा था और अब सशर्त वार्ता के लिए तैयार दिख रहा है. कहा जा रहा है कि अमेरिका ने भले ईरान को कमज़ोर किया है लेकिन राजनीतिक मक़सद हासिल नहीं कर पाया है.
भारत की पू्र्व विदेश सचिव निरूपमा मेनन राव कहती हैं कि यह युद्धविराम बताता है कि अमेरिका का लक्ष्य स्पष्ट नहीं है.
उन्होंने एक्स पर एक लंबी पोस्ट में लिखा है, ”युद्धविराम की घोषणा एक विराम को दर्शाती है लेकिन उससे भी अहम यह है कि अब हर पक्ष कहाँ खड़ा है. अमेरिका उस किनारे से पीछे हट गया है, जिसे उसने स्वयं बनाया था. धमकियों से भरी एक समय-सीमा अब वार्ताओं पर आधारित एक सशर्त विराम में बदल गई है. यह केवल ताक़त का संकेत नहीं है बल्कि सीमाओं की पहचान भी है. सैन्य मक़सदों को शायद हासिल कर लिया गया हो लेकिन राजनीतिक अंतिम लक्ष्य अब भी स्पष्ट नहीं हैं.”
उन्होंने लिखा है, ”इसराइल, अपनी ओर से एक अधिक अस्पष्ट स्थिति में दिखाई दे रहा है. तनाव को बढ़ाने के बाद अब वह एक ऐसी प्रक्रिया से बंधा हुआ है, जिस पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं है. उसके मक़सद ख़ासकर सत्ता परिवर्तन या ईरान को लंबी अवधि के लिए कमज़ोर करने से जुड़े, कहीं और आकार ले रही वार्ता प्रक्रिया के साथ सहज नहीं बैठते.”
”ईरान एक हद तक रणनीतिक लचीलापन दिखाते हुए उभरा है. उसने हमलों को झेला, जवाबी कार्रवाई की और फिर युद्धविराम की चर्चा को व्यापक समझौते की शर्तों की ओर मोड़ दिया: प्रतिबंधों में राहत, सुरक्षा गारंटी और क्षेत्रीय तनाव में कमी. ऐसा करते हुए उसने अपने मूल रुख़ से समझौता भी नहीं किया.
निरूपमा राव ने लिखा है, ”पाकिस्तान की भूमिका एक योजनाकार के रूप में नहीं बल्कि एक माध्यम के रूप में सामने आई है. उसने वह रास्ता दिया, जिसके माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान हुआ, समय-सीमाएँ नरम पड़ीं और कूटनीतिक अवसर का एक संकरा दरवाज़ा खुला. यह पारंपरिक अर्थों में मध्यस्थता नहीं है लेकिन इसे हल्की-फुल्की टिप्पणियों से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता. हम जो देख रहे हैं, वह संघर्ष का समाधान नहीं बल्कि उसकी स्थिति में बदलाव है. युद्ध समाप्त नहीं हुआ है. यह एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है, जहाँ दबाव और वार्ता साथ-साथ चल रहे हैं.”
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पाकिस्तान का बड़ा रोल
निरूपमा राव कहती हैं, ”भारत के लिए संकेत स्पष्ट हैं. इसे केवल तनाव में कमी के रूप में न देखें. इसे एक ऐसे तंत्र के रूप में समझें जो दबाव में है, जहाँ परिणाम अब भी बदल सकते हैं.
भारत को अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से रखनी चाहिए. तनाव में कमी का समर्थन करे, समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और इस संघर्ष की किसी एक कथा के साथ ख़ुद को न जोड़े.
यह मौन रहने का समय नहीं है. यह संतुलित और सोच-समझकर बोलने का समय है.”
ईरान के ख़िलाफ़ इसराइल और अमेरिका का हमला किसी भी लिहाज से पाकिस्तान के हक़ में नहीं था. ईरान के पाकिस्तान से 909 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. पाकिस्तान की क़रीब 20 फ़ीसदी आबादी शिया मुसलमानों की है. ज़ाहिर है कि ईरान शिया बहुल इस्लामिक देश है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ डिफेंस पैक्ट भी किया है, जिसमें प्रावधान है कि दोनों देशों में से किसी एक पर हमला दोनों देश अपने ऊपर मानेंगे.
ईरान ने सऊदी अरब के कई इलाकों में हमला किया और यह पाकिस्तान के लिए असहज करने वाला था. ऐसे में युद्धविराम होना पाकिस्तान के भी हक़ में है. भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू की पाकिस्तान में संवाददाता रहीं और विदेशी मामलों की जानकार निरूपमा सुब्रमण्यम भी मानती हैं कि पाकिस्तान ने एक बड़ा रोल अदा किया है.
निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं, ”पाकिस्तान की छवि पहले युद्ध ख़त्म कराने वाली नहीं थी. उसकी छवि बहुत ही नकारात्मक थी. उसकी पहचान थी कि वह ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों को पनाह देता है लेकिन इस बार उसने बिल्कुल अलग रोल अदा किया है. पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय मंच पर इससे पहले ऐसी मौजूदगी नहीं थी. सऊदी अरब की तरफ़ से भी पाकिस्तान पर दबाव था कि उस पर ईरान लगातार हमले कर रहा है. लेकिन पाकिस्तान के लिए ईरान के ख़िलाफ़ सऊदी की लड़ाई लड़ना आसान नहीं था. अगर ऐसा होता तो पाकिस्तान के भीतर बग़ावत हो जाती. ऐसे में पाकिस्तान हर हाल में चाहता था कि युद्ध बंद हो.”
मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की सफलता काफ़ी हद तक ट्रंप प्रशासन के साथ उसके बढ़ते क़रीबी संबंधों से जुड़ी है. निरूपमा सुब्रमण्यम कहती हैं कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान ने ट्रंप प्रशासन से क़रीबी बढ़ाई और इसका फ़ायदा भी उन्हें मिल रहा है जबकि भारत और अमेरिका के संबंधों में एक किस्म की असहजता आई.
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पाकिस्तान ने भारत के साथ शांति स्थापित करने के लिए ट्रंप के प्रयासों का समर्थन किया, उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया और बार-बार उनके शांति प्रयासों की सराहना की. पिछले एक साल में मुनीर कई बार वॉशिंगटन गए हैं और ट्रंप ने उन्हें “पसंदीदा फील्ड मार्शल” तक कहा.
पाकिस्तान के ईरान के साथ भी ऐतिहासिक रूप से गर्मजोशी भरे संबंध रहे हैं, साथ ही उन खाड़ी देशों के साथ भी, जो तेहरान के क्षेत्रीय हमलों और होर्मुज़ की नाकाबंदी से प्रभावित हुए हैं.
ज़्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे इससे ठोस शांति वार्ता हो या न हो पाकिस्तान पहले ही अपने पक्ष में एक बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल कर चुका है.
अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने वाल स्ट्रीट जर्नल से कहा, “पाकिस्तान के नज़रिए से यह एक विन-विन स्थिति है, चाहे समझौता हो या न हो. पाकिस्तान ने जो हासिल किया है, वह यह है कि अलग-थलग पड़ने की छवि अब ख़त्म हो गई है और उसकी जगह केंद्र में होने की छवि बन गई है.”
लेकिन बीच-बचाव करने की भूमिका अपने साथ जोखिम भी लाती है, पाकिस्तान के ओमान में पूर्व राजदूत इमरान अली ने कहा वाल स्ट्रीट जर्नल से कहा, “पाकिस्तान को ईरान और सऊदी अरब के बीच एक बहुत कठिन कूटनीतिक संतुलन बनाना पड़ा है.”
वर्षों तक, शीत युद्ध और आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को एक सहयोगी के रूप में देखा.
सीआईए ने 11 सितंबर 2001 के हमलों के लिए ज़िम्मेदार अल-क़ायदा के आतंकवादियों, जिनमें उसके नेता ओसामा बिन लादेन भी शामिल थे, की तलाश में पाकिस्तान की सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित