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पाकिस्तान के बलूचिस्तान में सिलसिलेवार तरीक़े से हमले हो रहे हैं, जिनमें 31 नागरिक और 17 सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं.
प्रांत के मुख्यमंत्री सरफ़राज़ बुगती ने बताया था कि सुरक्षा बलों ने 40 घंटे तक चली गोलीबारी में कम से कम 145 हमलावरों को मारा है.
दूसरी ओर, बीएलए ने सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ ‘हेरोफ़ 2.0’ या ‘काला तूफ़ान’ नाम से ऑपरेशन शुरू करने का दावा किया था.
साथ ही दावा किया था कि उसने सुरक्षा बलों के 84 सदस्यों को मारा है और 18 का अपहरण कर लिया है.
इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तानी सेना ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और यह देश के कुल भूभाग का लगभग 44% हिस्सा है.
इसकी सीमा ईरान और अफ़ग़ानिस्तान के साथ लगती है. अरब सागर के तट का एक हिस्सा भी इसमें शामिल है. पाकिस्तान की कुल आबादी 24 करोड़ में से 5% लोग यहां रहते हैं.
बीएलए का पाकिस्तान की सरकार पर आरोप है कि वह अपने सबसे बड़े प्रांत के समृद्ध खनिज संसाधनों का दोहन कर रही है, जबकि स्थानीय आबादी को इसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है.
यह प्रांत गैस और खनिजों सहित कई प्राकृतिक संसाधनों के मामले में काफ़ी समृद्ध है. यही कारण है कि यहां पर चल रही उठा-पटक दुनिया के दो शक्तिशाली देशों, अमेरिका और चीन के लिए चिंता का सबब बनी हुई है.
ताक़तवर देशों की नज़र क्यों?
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बलूचिस्तान प्राकृतिक रूप से बहुत समृद्ध है. यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंध द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषण में बताया गया है कि यहां पर प्राकृतिक गैस, तेल, तांबा, सोना, लोहा, जस्ता, क्रोमाइट, जिप्सम, कोयला, मार्बल और ग्रेनाइट जैसे बहुत सारे खनिज मिलते हैं. रेको दिक में अकेले सोने-तांबे का इतना बड़ा ख़ज़ाना बताया जाता है जिसकी क़ीमत ट्रिलियन डॉलर बताई जाती है.
प्रकाशित विश्लेषण में बताया गया है कि बलूचिस्तान क़रीब 2280 मेगावाट बिजली बनाता है. लेकिन उसे वापस सिर्फ़ 700-800 मेगावाट मिलती है. प्रांत में 56% लोग बिजली के बिना रहते हैं, सिर्फ़ 25% लोगों को बिजली मिलती है. पूरे पाकिस्तान में इस्तेमाल होने वाली गैस का 17% हिस्सा अकेले बलूचिस्तान से आता है, लेकिन खुद इसका केवल 7% ही इस्तेमाल कर पाता है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंध के मुताबिक़, बलूचिस्तान के डेरा बुगती ज़िले के सूई शहर से 70 साल पहले से गैस निकालकर पाइपलाइन से बाहर भेजी जा रही है. लेकिन इस इलाके के कई घरों में अब भी चूल्हे पर खाना पकता है, क्योंकि इनके पास गैस नहीं पहुंच रही. जबकि पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 158 के मुताबिक़, जिस इलाक़े में गैस निकलती है, उसे पहले मिलनी चाहिए, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा.
बलूचिस्तान प्रांत के चग़ाई ज़िले में रेको दिक जैसा बड़ा प्रोजेक्ट चल रहा है, जो दुनिया के सबसे बड़े अविकसित तांबा और सोने के भंडारों में से एक है. लेकिन प्रांत को इसका फ़ायदा बहुत कम मिलता है. इसी तरह सोने-तांबे की खदानों से जुड़े सैंदक प्रोजेक्ट में बलूचिस्तान के लोगों को 20% हिस्सा देने का वादा था, लेकिन वह भी पूरा नहीं हुआ.
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बलूचिस्तान बहुत सारी संपत्तियां पैदा करता है, लेकिन केंद्र सरकार उनको बाहर भेज देती है. प्रांत को विकास, गैस, बिजली, पैसा और हक़ बहुत कम मिलता है. इसी वजह से वहां आंदोलन और हिंसक विद्रोह होता रहता है.
बलोच कार्यकर्ताओं का यह भी दावा रहा है कि पाकिस्तानी फ़ौज उनके प्रांत में अपहरण, उत्पीड़न और हत्याएं करती है. इस कारण बलोच कार्यकर्ताओं की भावना पाकिस्तान की सेना के ख़िलाफ़ हैं.
जेएनयू के साउथ एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज ने कहा, “पाकिस्तान यहां पर बाहर के देशों का दख़ल चाह रहा है, क्योंकि यह एक संघर्ष वाला क्षेत्र है. पाकिस्तान को इससे न सिर्फ़ आर्थिक फ़ायदा होगा, बल्कि वह रणनीतिक फ़ायदा भी देख रहा है. लेकिन इस बीच बलूचिस्तान के लोगों की समस्याओं को नहीं सुना जा रहा, उनका हल नहीं निकाला जा रहा और यह संघर्ष बढ़ता जा रहा है. यह पाकिस्तान के लिए भी चिंता का विषय है.”
पाकिस्तानी लेखिका और डिफेंस एक्सपर्ट आयशा सिद्दीका का कहना है, “बलूचिस्तान में हुए हमले एक चेतावनी की तरह लिए जा सकते हैं. बाहर के निवेशकों से यहां के लोग ख़ुश नहीं हैं. जबकि दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान इस इलाक़े को शांत करे और अपना कंट्रोल बनाए रखे.”
क्या पाकिस्तानी आर्मी बलूचिस्तान को नियंत्रित करने में असफल रही है? इसके जवाब में आयशा सिद्दीका कहती हैं कि फ़िलहाल पाकिस्तान ने पूरी फ़ोर्स का इस्तेमाल नहीं किया है, लिहाज़ा यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के नियंत्रण से बाहर होने जा रहा है.
पाकिस्तान का आरोप और भारत का जवाब
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पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में हो रही हिंसा में भारत का हाथ होने की बात कही थी. पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नक़वी ने शनिवार देर रात क्वेटा में बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री सरफ़राज़ बुगती के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस की.
इसमें नक़वी ने कहा, “इन हमलों के पीछे भारत का हाथ है. मैं आपको विश्वास के साथ कह सकता हूं कि भारत ने इन आतंकवादियों के साथ मिलकर इन हमलों की योजना बनाई थी.”
उन्होंने कहा, “इस समय यह बेहद ज़रूरी है कि दुनिया को पता चले कि आतंकवाद के पीछे मुख्य देश भारत है, जो न केवल आतंकवादियों को आर्थिक सहायता देता है, बल्कि उनकी योजना और रणनीति में भी उनका समर्थन करता है.”
पाकिस्तान सशस्त्र बलों का आधिकारिक मीडिया और जनसंपर्क विंग इंटर-सर्विसेज़ पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) का आरोप है कि ये हमले ‘भारत प्रायोजित सगंठन’ द्वारा किए गए थे, पाकिस्तान की सेना इसके लिए बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी का नाम लेती है.
भारत ने पाकिस्तान के आरोपों को सिरे से ख़ारिज किया है. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस तरह के आरोप लगाना पाकिस्तान की पुरानी रणनीति है, ताकि वह ख़ुद की आंतरिक नाकामियों से ध्यान भटका सके.”
उन्होंने आगे कहा, “हर बार हिंसा की घटना होने पर बेबुनियाद दावे दोहराने के बजाय, उसे इस क्षेत्र में अपने लोगों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए. दमन, क्रूरता और मानवाधिकारों के उल्लंघन का उसका इतिहास जगज़ाहिर है.”
चीन के लिए कितना अहम है बलूचिस्तान?
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पाकिस्तान के पड़ोसी देश चीन की बलूचिस्तान में बहुत पहले से दिलचस्पी रही है. यहां पर चीन की कई महत्वाकांक्षी परियोजनाएं चल रही हैं. चीन की सबसे बड़ी परियोजना चाइना-पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) है, जिसका अक्सर बलूचिस्तान में विरोध होता रहता है. चीन यहां खनन परियोजनाओं में भी शामिल है, जिससे उसे मोटा मुनाफ़ा होता है.
इटालियन इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल पॉलिटिकल स्टडीज़ (आईएसपीआई) के मुताबिक़, चीन ने दस साल पहले पाकिस्तान पर सीपीईसी प्रोजेक्ट के ज़रिए 62 अरब डॉलर का बड़ा दांव लगाया था, लेकिन बलूचिस्तान में बढ़ती हुई अस्थिरता चीन के लिए चिंता का कारण बन रही है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “हाल के सालों में चीन ने पाकिस्तान में अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए सीपीईसी के ज़रिए बहुत ज़्यादा आर्थिक निवेश किया है. चीन का मुख्य मक़सद है कि ग्वादर पोर्ट (बलूचिस्तान में) तक पहुंच बनाकर अरब सागर तक सीधी पकड़ बनाना. ऐसा इसलिए ताकि वहां सड़कें, बंदरगाह और अन्य प्रोजेक्ट्स बनाकर सामान आसानी से ले जाया जा सके.”
इसके अलावा, चीन सीपीईसी को अपने बड़े- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) से जोड़ना चाहता है. इसके तहत अब पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान में भी खनन (माइनिंग) और सड़क-इंफ़्रास्ट्रक्चर के प्रोजेक्ट शुरू करने की कोशिश हो रही है.
चीन को लगता है कि अब अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते सीपीईसी को और आगे बढ़ाया जा सकता है. इससे कनेक्टिविटी बेहतर होगी और भविष्य में वहां के खनिज संसाधनों का फ़ायदा भी उठाया जा सकेगा.
सीपीईसी के तहत 3000 किलोमीटर लंबी सड़कें और रेल लाइनें बननी थीं. लेकिन एशिया टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि 2025 तक सिर्फ़ 27 अरब डॉलर (लगभग 40%) का ही काम पूरा हुआ. बाकी काम धीमा है. ख़ासकर बलूचिस्तान प्रांत में सबसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं. इनमें ग्वादर ईस्ट बे एक्सप्रेसवे और 1320 मेगावाट बिजली वाला हब कोल पावर प्रोजेक्ट शामिल हैं.
आईएसपीआई की रिपोर्ट कहती है, “बलूचिस्तान में बीएलए के बार-बार होने वाले हमलों की वजह से सीपीईसी के बड़े प्रोजेक्ट्स में तरक़्क़ी नहीं हो पा रही है. ख़ास तौर पर ग्वादर पोर्ट, जो सीपीईसी का सबसे मुख्य प्रोजेक्ट है, वह बहुत प्रभावित हो रहा है. हालात इतने नाज़ुक हैं कि ग्वादर में सीपीईसी के पैसे से बने नए एयरपोर्ट का उद्घाटन भी ऑनलाइन ही हुआ. बड़े-बड़े अधिकारी भी वहां नहीं गए, क्योंकि उनकी जान को ख़तरा था.”
लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की वेबसाइट पर प्रकाशित हुए एक ब्लॉग में कहा गया है, “बलूचिस्तान में बढ़ते तनाव और चीन विरोधी भावनाओं के बीच इस्लामाबाद और बीजिंग को बहुत समझदारी से अपनी रणनीति बनानी होगी. सिर्फ़ सेना और बल प्रयोग से काम नहीं चलेगा. इसके बजाय स्थानीय लोगों से खुली बातचीत करनी होगी, उनकी शिकायतों को सच्चाई से सुनना और ठीक करना होगा. साथ ही विकास का फ़ायदा सबको बराबर मिले, ऐसा प्रयास करना होगा.”
इसमें कहा गया है, “अगर ऐसा नहीं हुआ तो सीपीईसी दोनों देशों की तरक़्क़ी का प्रतीक बनने के बजाय झगड़ों और संघर्ष का बड़ा कारण बन सकता है. इससे पाकिस्तान-चीन के रिश्ते ख़राब हो सकते हैं.”
अमेरिका की बलूचिस्तान में क्यों दिलचस्पी है?
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बलूचिस्तान में छाई हुई अशांति से अमेरिका का चिंतित होना भी स्वाभाविक है. हाल के महीनों में बलूचिस्तान के खनिजों में अमेरिका की रुचि बढ़ी है.
रिस्क इंटेलिजेंस की एक रिपोर्ट कहती है कि सितंबर 2025 में अमेरिका ने बलूचिस्तान में अपनी दिलचस्पी बढ़ाई. वहां अमेरिकी कंपनी यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स ने पाकिस्तान सरकार के साथ एक समझौता किया. इस समझौते के तहत अमेरिका बलूचिस्तान के महत्वपूर्ण खनिजों में 500 मिलियन डॉलर का निवेश करेगा.
अक्तूबर 2025 में इस सौदे के तहत खनिजों की पहली खेप अमेरिका भेजी गई. इन खनिजों को आसानी से बाहर भेजने के लिए पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के पासनी बंदरगाह को विकसित करने का प्रस्ताव दिया है. यह बंदरगाह खनिजों के निर्यात के लिए एक ख़ास रास्ता दे सकता है. अमेरिका पाकिस्तान के साथ मिलकर बलूचिस्तान के क़ीमती खनिज निकाल रहा है और उनका व्यापार बढ़ा रहा है.
इसके इतर, अमेरिका ने दिसंबर 2025 में बलूचिस्तान के चग़ाई ज़िले में रेको दिक इलाक़े में खनन परियोजनाओं के लिए 1.25 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी. इस्लामाबाद में अमेरिका के चार्ज डी’अफ़ेयर्स नताली बेकर ने कहा था, “यह पैसा आने वाले सालों में अमेरिका से 2 अरब डॉलर तक की अच्छी क्वालिटी की माइनिंग मशीनरी और सर्विसेज़ लाने में मदद करेगा. इससे अमेरिका में लगभग 6000 नौकरियां और बलूचिस्तान में 7500 नौकरियां बनेंगी.”
ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल अफ़ेयर्स की एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर श्राबना बरुआ कहती हैं, “हाल के हमलों की टाइमिंग का विश्लेषण होना ज़रूरी है. अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ डील की है और ईरान भी संघर्ष के दौर से गुज़र रहा है. बीएलए के कार्यकर्ता मानते हैं कि ईरान में भी बलूचिस्तान का हिस्सा है, इसलिए हो सकता है कि उन्होंने सोच-समझकर यह वक़्त चुना हो.”
बलूचिस्तान में हो रहे हमले अब अमेरिका के लिए भी चिंता के तौर पर देखे जा रहे हैं. वॉशिंगटन डीसी स्थित थिंक टैंक विल्सन सेंटर के निदेशक माइकल कुगलमैन ने एक्स पर लिखा, “बलूचिस्तान में हुए हमले उन सभी लोगों के लिए एक चेतावनी होनी चाहिए, जिनमें व्हाइट हाउस के अधिकारी भी शामिल हैं, जो पाकिस्तान के महत्वपूर्ण खनिज भंडारों में निवेश करने के इच्छुक हैं. इनमें से कई भंडार बलूचिस्तान के भीतर स्थित हैं, जहां हमले हुए हैं. बीएलए की प्रमुख शिकायतों में से एक यही है कि स्थानीय संसाधनों का बाहरी दोहन हो रहा है.”
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सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने एक्स पर लिखा, “पाकिस्तान ने ट्रंप को बताया था कि बलूचिस्तान अमेरिकी कंपनियों के लिए माइनिंग का अच्छा इलाका है. लेकिन यह झूठ था. क्योंकि वहां शांति सिर्फ़ कहने से नहीं आती, उसे बनाना पड़ता है. कोई बड़ा माइनिंग प्रोजेक्ट शुरू करने के लिए बहुत सारी फ़ौज, भारी सुरक्षा, कंट्रोल्ड रास्ते और राजनीतिक गारंटी चाहिए, जो पाकिस्तान की सरकार दे नहीं सकती.”
उन्होंने आगे लिखा, “पाकिस्तान एक तरफ़ बलूचिस्तान को खनिजों का ख़ज़ाना बताकर बेच रहा है, लेकिन दूसरी तरफ़ वहां फ़ौज से कंट्रोल करके इसे आंतरिक कॉलोनी की तरह चला रहा है. इससे बग़ावत और बढ़ती जा रही है. ताज़ा हमला इसी बात को साबित करता है.”
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज ने बलूचिस्तान में अमेरिका की दिलचस्पी को लेकर एक अलग दृष्टिकोण दिया. वह कहते हैं कि यह बात तो स्पष्ट है कि बलूचिस्तान में बढ़ते हमले अमेरिका और चीन को आर्थिक झटका दे सकते हैं, लेकिन कहानी महज़ इतनी नहीं है.
“अमेरिका इस इलाक़े में आर्थिक मुनाफ़े के इतर भी फ़ायदा देख रहा है. वह संघर्ष वाले इलाक़ों में हमेशा से अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा है. इसके अलावा, बलूचिस्तान में पूरी तरह चीन का दख़ल न हो, इसको मद्देनज़र रखते हुए भी क़दम उठा रहा है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.