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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख़्वाजा आसिफ़ के एक बयान को इसराइल ने ‘शर्मनाक और निंदनीय’ बताया है.
ख़्वाजा आसिफ़ ने इसराइल को ‘मानवता के लिए धब्बा’ और ‘कैंसर राष्ट्र’ कह दिया था जिस पर इसराइल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. हालांकि शुक्रवार दोपहर को ख़्वाजा आसिफ़ ने वो पोस्ट हटा दी.
पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान युद्धविराम में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है.
अमेरिका और ईरान दोनों के ही प्रतिनिधियों की इस्लामाबाद में शनिवार को इस सिलसिले में बैठक होने वाली है. लेकिन इसराइल पाकिस्तान के रोल को लेकर असहज है.
गुरुवार को भारत में इसराइल के राजदूत ने कहा था कि पाकिस्तान पर ‘भरोसा नहीं किया जा सकता.’
पाकिस्तान ने अभी तक इसराइल को एक देश के रूप में मान्यता भी नहीं दी है. ऐसे में दोनों देशों में राजनयिक संबंध भी नहीं हैं.
ख़्वाजा आसिफ़ का बयान और इसराइल की प्रतिक्रिया
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गुरुवार को ख़्वाजा आसिफ़ ने एक्स पर लिखा, “इसराइल शैतान है और मानवता पर धब्बा है. जहां इस्लामाबाद में शांति की बातें हो रही हैं वहां वो लेबनान में जनसंहार कर रहा है. पहले वो ग़ज़ा में निर्दोष लोगों को मार रहा था और अब लेबनान में यही कर रहा है. उसका ख़ून ख़राबा बेरोक टोक जारी है. जिन लोगों ने यूरोपीय यहूदियों से छुटकारा पाने के लिए फ़लस्तीनियों की ज़मीन पर इस कैंसरनुमा देश को बनाया है वो जहन्नुम में जलें.”
इस पर इसराइल के विदेश मंत्री डिगियन सार ने एक्स पर लिखा, “इसराइल उस सरकार की ओर से आए इन खुले तौर पर यहूदी-विरोधी और झूठे ख़ूनी आरोपों को बेहद गंभीरता से देखता है, जो खुद को ‘शांति की मध्यस्थ’ बताती है. यहूदी राष्ट्र को ‘कैंसरग्रस्त’ कहना दरअसल उसके विनाश की मांग करने जैसा है. इसराइल उन आतंकियों के खिलाफ अपनी रक्षा करेगा, जो उसके ख़ात्मे की कसम खाते हैं.”

वहीं इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के ऑफ़िस की ओर से भी एक्स पर पोस्ट किया गया, “पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की ओर से इसराइल के ख़ात्मे की कामना करना बेहद आपत्तिजनक है. किसी भी सरकार से ख़ास कर उस सरकार से जो ख़ुद को शांति का मध्यस्थ बताती हो, उससे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती.”
युद्धविराम को लेकर पाकिस्तान और इसराइल में मतभेद
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इस युद्धविराम में इसराइल और पाकिस्तान के बीच लेबनान को लेकर मतभेद पहले दिन ही उभरकर सामने आ गए थे.
ईरान और पाकिस्तान दोनों का ही दावा है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम की शर्तों में लेबनान पर हमले ना करना भी शामिल है.
वो युद्धविराम के बाद भी इसराइल के लेबनान पर हो रहे हमलों को युद्धविराम समझौते का उल्लंघन बता रहे हैं. लेकिन इसराइल और अमेरिका दोनों ने ही कहा कि युद्धविराम में लेबनान शामिल नहीं है.

हालांकि इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने गुरुवार को कहा कि उन्होंने अपनी कैबिनेट से जितनी जल्दी हो सके लेबनान के साथ सीधे बातचीत शुरू करने को कहा है.
हिब्रू में एक्स पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा गया है कि उन्होंने लेबनान की ओर से बातचीत शुरू करने के लिए बार-बार और लगातार की जा रही अपीलों के मद्देनज़र अपने कैबिनेट से बुधवार को यह अनुरोध किया.
उन्होंने कहा कि इस बातचीत का केंद्र हिज़्बुल्लाह को निरस्त्र करना, इसराइल और लेबनान के बीच शांति संबंधों की स्थापना होगा.
इसराइल पाकिस्तान को लेकर असहज
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ईरान और अमेरिका के बीच हुए युद्धविराम की मध्यस्थता पाकिस्तान ने की. लेकिन इसराइल का कहना है कि पाकिस्तान एक भरोसेमंद प्लेयर नहीं है.
भारत में इसराइल के राजदूत रूवेन अज़ार ने एएनआई से बात करते हुए कहा, “हम पाकिस्तान को विश्वसनीय प्लेयर नहीं मानते. मेरा मानना है कि अमेरिका ने अपने कारणों से पाकिस्तान की मदद लेने का फ़ैसला किया है.”
अज़ार ने कहा, “हमने पहले भी देखा है कि अमेरिका ने कैसे क़तर और तुर्की जैसे देशों को इस्तेमाल करके हमास के साथ समझौता करने में फ़ायदा उठाया है. हमारे लिए यह बहुत ज़रूरी है कि जिस नतीजे पर पहुँचना चाहते हैं, उसमें हम अमेरिका के साथ तालमेल बनाए रखें.”
दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और फ़ील्ड मार्शल को युद्धविराम के प्रयासों के लिए धन्यवाद दिया था. अमेरिका ने भी पाकिस्तान की ओर से हुई मध्यस्थता की बात स्वीकारी थी.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने भी युद्धविराम का एलान होने पर अमेरिका और ईरान का शुक्रिया अदा किया था.
पाकिस्तान-इसराइल संबंध
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पाकिस्तान ने हाल के महीनों में इसराइल की लेबनान के अलावा ग़ज़ा में की गई कार्रवाइयों की कड़ी निंदा की और अलग फ़लस्तीनी राज्य की स्थापना की भी मांग की.
अमेरिका-इसराइल के ईरान पर मौजूदा हमलों को लेकर पाकिस्तान जहां अमेरिकी की आलोचना करने से बचता दिखा वहीं उसने इसराइली कार्रवाई की खुलकर आलोचना की और ईरान के साथ एकजुटता भी दिखाई.
लड़ाई की शुरुआत में ही ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की हमलों में मौत हो गई थी.
पाकिस्तान ख़ामेनेई की मौत पर सबसे पहले शोक जताने वाले और इन हमलों की निंदा करने वाले देशों में शामिल था.
पिछले साल जून में भी इसराइल ने ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए थे. तब भी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर इसराइल विरोधी प्रदर्शन हुए थे.
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इसके अलावा इसी साल फ़रवरी में इसराइल के पूर्व प्रधानमंत्री नेफ़्टाली बेनेट ने यरूशलम में कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ प्रेजिडेंट्स ऑफ मेजर अमेरिकन जूईश ऑर्गेनाइज़ेशन को संबोधित करते हुए कहा कि इस इलाक़े में एक नई धुरी बन रही है, जिसमें तुर्की, क़तर, मुस्लिम ब्रदरहुड और परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान शामिल हैं.
नेफ़्टाली ने कहा कि यह गठजोड़ इसराइल के ख़िलाफ़ शत्रुता को हवा दे रहा है और सऊदी अरब को भी प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है.
पाकिस्तान ने अभी तक इसराइल को एक देश के रूप में मान्यता नहीं दी है.
ऐसे में दोनों देशों में राजनयिक संबंध नहीं हैं. इसराइल को लेकर पाकिस्तान के भीतर आए दिन हिंसक विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं. पाकिस्तान का इसराइल से कोई विवाद या संघर्ष नहीं रहा है, तब भी उसने इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं किया है. पाकिस्तान ऐसा अरब देशों के साथ इस्लामिक एकता दिखाने के लिए करता है.
पाकिस्तान में इसराइल को दुश्मन के रूप में भले देखा जाता है लेकिन इसराइल में पाकिस्तान को लेकर सड़कों पर इस तरह का ग़ुस्सा देखने को नहीं मिलता है. 2018 में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भारत के दौरे पर आए थे.
इस दौरे में नेतन्याहू ने कहा था, ”इसराइल पाकिस्तान का दुश्मन नहीं है और पाकिस्तान को भी हमारा दुश्मन नहीं होना चाहिए.”
इसके बाद पाकिस्तान में दबे स्वर में इसराइल को लेकर फिर से विचार करने की बात कही गई लेकिन पाकिस्तानी सीनेट के तत्कालीन चेयरमैन रज़ा रब्बानी ने मुस्लिम वर्ल्ड को चेतावनी देते हुए कहा था, ‘भारत, इसराइल और अमेरिका के बीच उभरता गठजोड़ मुस्लिम दुनिया के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है.’
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित