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‘पीएम सूर्य घर योजना’ पर संकट के बादल, बैंकों की बेरुखी और डिस्कॉम के चलते धीमी पड़ी रफ्तार

Byadmin

Feb 17, 2026


रॉयटर, मुंबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ वर्तमान में अपनी राह में बड़ी चुनौतियों का सामना कर रही है। भारी सब्सिडी और सरकार के कड़े रुख के बावजूद, बैंकों की ऋण देने में अनिच्छा और राज्य बिजली वितरण कंपनियों (डिस्काम्स) के सीमित सहयोग के कारण यह योजना लक्ष्य से पिछड़ती दिख रही है।

ऋण संबंधी बाधाएं और आंकड़ों का गणित फरवरी 2024 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य मार्च 2025 तक 40 लाख आवासीय छतों पर सौर पैनल स्थापित करना था, जिसमें लागत का 40 प्रतिशत तक सब्सिडी के रूप में देने का प्रविधान है।

हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में आवासीय इंस्टालेशन की संख्या मात्र 23.6 लाख तक ही पहुंच पाई है, जो निर्धारित लक्ष्य से काफी कम है। योजना के पोर्टल पर आए आवेदनों की स्थिति और भी चिंताजनक है। लगभग 60 प्रतिशत आवेदनों को अभी तक मंजूरी नहीं मिली है, जबकि सात प्रतिशत आवेदन सिरे से खारिज कर दिए गए हैं।

‘क्लाइमेट ट्रेंड्स’ की ऊर्जा विश्लेषक श्रेया जय के अनुसार, ”बैंकों की ऋण देने में हिचकिचाहट और राज्यों का उदासीन रवैया कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के भारत के प्रयासों को पटरी से उतार सकता है।”

बैंकों की सुरक्षा और वेंडरों की शिकायतें बैंकों का तर्क है कि वे सार्वजनिक धन की सुरक्षा के लिए दस्तावेजों की गहन जांच कर रहे हैं। एक प्रमुख सरकारी बैंक के अधिकारी ने बताया कि ऋण डूबने की स्थिति में सौर पैनलों को जब्त करना उनके लिए किसी काम का नहीं होगा।

बैंक की कार्यप्रणाली पर सवाल

वहीं, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में वेंडर और एसोसिएशन बैंक की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। राजस्थान रिन्यूएबल एनर्जी एसोसिएशन के अनुसार, बैंक दो लाख रुपये से कम के ऋणों के लिए भी कोलैटरल (गारंटी) मांग रहे हैं, जो योजना के दिशा-निर्देशों के विरुद्ध है। ओडिशा के वेंडरों का कहना है कि बिजली बिलों के पुराने बकाया या जमीन के रिकार्ड पूर्वजों के नाम पर होने जैसे छोटे कारणों से आवेदनों को खारिज किया जा रहा है।

हालांकि, वित्तीय सेवा विभाग का कहना है कि उन्होंने फीडबैक के आधार पर सह-आवेदक जोड़ने और दस्तावेजों के सरलीकरण जैसे कदम उठाए हैं।

राज्यों की झिझक-

राजस्व हानि का डर योजना की धीमी गति का एक मुख्य कारण राज्य संचालित प्रतिष्ठानों का रवैया भी है। दरअसल, जब संपन्न घर ग्रिड के बजाय सौर ऊर्जा पर निर्भर हो जाते हैं, तो डिस्काम्स को उच्च टैरिफ वाले ग्राहकों से होने वाले राजस्व का नुकसान होता है। रिस्टैड एनर्जी के विश्लेषक नितेश शानबाग कहते हैं, ”’अमीर परिवार ग्रिड से हट रहे हैं, जिससे डिस्काम्स पर वित्तीय बोझ बढ़ रहा है।”’ यह स्थिति 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता के भारत के लक्ष्य के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है, जिससे देश की कोयले पर निर्भरता बनी रहने की आशंका है।

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