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पॉक्सो के मुकदमों के निस्तारण में आयी तेजी, 2025 में 109 प्रतिशत निपटान दर; रिपोर्ट में हुआ खुलासा

Byadmin

Jan 3, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। यौन शोषण का शिकार बच्चों को जल्द न्याय की उम्मीद जगी है क्योंकि बाल यौन शोषण के मुकदमों के निस्तारण में तेजी आयी है। पहली बार हुआ है कि 2025 में पॉक्सो के मुकदमों के निपटान की दर सौ फीसद से ज्यादा, 109 प्रतिशत रही।

यानी जितने मुकदमे दर्ज हुए उनसे ज्यादा निपटाए गए। ये एक सुखद स्थिति है लेकिन अगर देश भर में लंबित पॉक्सो के सभी मुकदमे चार वर्षों में खत्म करने हैं तो इसके लिए 600 अतिरिक्त विशेष पॉक्सो कोर्ट स्थापित करने की जरूरत है और इसमें लगभग 1977 करोड़ रुपये का खर्च आएगा।

हाल में आयी एक अध्ययन रिपोर्ट में इन बातों का खुलासा हुआ है। लंबित मुकदमों को देखा जाए तो न्यायपालिका की छवि तारीख पर तारीख की दिखाई देती है। अगर सिर्फ बाल यौन उत्पीड़न संरक्षण कानून (पॉक्सो) के मुकदमों पर नजर डालें तो 2023 तक देश भर में पॉक्सो के 262089 मुकदमे लंबित थे। लेकिन इसमें अब एक अहम बदलाव देखने को मिला है निपटाए गए मामलों की संख्या दर्ज मामलों से ज्यादा हो गई है।

निपटान दर 109 प्रतिशत

सेंटर फार लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज (सी-लैब) फार चिल्ड्रन की रिपोर्ट ”पेंडेन्सी टु प्रोटेक्शन एचीविंग द टिपिंग प्वाइंट टु जस्टिस फार चाइल्ड विक्टिम्स आफ सैक्सुअल एब्यूज ” के अनुसार वर्ष 2025 में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े 80320 मामले दर्ज हुए, जबकि 87754 मामले निपटाए गए। निपटान दर 109 प्रतिशत रही।

खास बात यह है कि 24 राज्यों में पॉक्सो के मुकदमों की निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक रही। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि चार साल में सभी लंबित पॉक्सो मुकदमे खत्म करने के लिए 600 अतिरिक्त विशेष पॉक्सो अदालतें स्थापित की जाएं। इसके लिए लगभग 1977 करोड़ रुपये का प्रविधान किया जाना चाहिए और इसमें निर्भया फंड का भी उपयोग किया जा सकता है।

रिपोर्ट कुछ गंभीर चिंताओं की ओर भी ध्यान खींचती है। जैसे कुल लंबित मामलों में लगभग आधे दो साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। दोषसिद्धि की दरों में भी लगातार उतार चढ़ाव बना हुआ है और अलग अलग राज्यों में स्थिति में बड़ा अंतर दिखाई देता है।

एनसीआरबी रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में पॉक्सो मामलों में दोषसिद्धि की दर 29 फीसदी रही जबकि पॉक्सो की त्वरित विशेष अदालतों में दोषसिद्धि दर 19 फीसद रही। यानी त्वरित विशेष अदालतों में दोषसिद्धि दर कम है जबकि पॉक्सो के केस सुन रही सामान्य विशेष अदालतों में ये दर ज्यादा है।

पॉक्सो के पांच साल से ज्यादा समय से लंबित मुकदमों में अकेले उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत है इसके बाद महाराष्ट्र 24 और पश्चिम बंगाल 11 प्रतिशत है। पांच साल से ज्यादा लंबित मामलों में लगभग तीन चौथाई अकेले इन्हीं तीन राज्यों में हैं।

इन आकड़ों के दूरगामी प्रभाव पर इंडिया चाइल्ड प्रोटेक्शन के निदेशक (शोध) पुरजीत प्रहराज कहते हैं कि जब न्यायिक व्यवस्था दर्ज मामलों से अधिक पॉक्सो मामलों का निपटारा करने लगती है, तब यह सिर्फ आंकड़ों की उपलब्धि नहीं होती, बल्कि यह उस भरोसे की वापसी होती है, जो बच्चों ने व्यवस्था पर खो दिया था।

इसलिए इस गति को बनाए रखना केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी है। ताकि हर बच्चे के लिए समय पर संवेदनशील और बाल-केंद्रित न्याय अपवाद नहीं, बल्कि हकीकत बने। रिपोर्ट के मुताबिक सात राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पॉक्सो केसों की निपटान दर 150 प्रतिशत से अधिक रही। वहीं अन्य सात राज्यों में 121 से 150 प्रतिशत के बीच रही, जबकि 10 राज्यों ने 100 से 120 प्रतिशत तक निस्तारण दर हासिल की।

काफी हद तक सफलता

इन 24 राज्यों ने न केवल 2025 में दर्ज केसों का निपटारा किया बल्कि पिछले लंबित मामलों को निपटाने में भी काफी हद तक सफलता पाई। रिपोर्ट में सिफारिश है कि लंबित मामलों को जल्दी निपटारे के लिए हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक बनाए रखे और जो राज्य पीछे हैं, उन्हें तकनीकी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए।

दोषसिद्धि और बरी होने की दरों की नियमित निगरानी हो। सुझाव है कि मामलों के बेहतर विश्लेषण और दस्तावेजों की शीघ्र उपलब्धता के लिए एआइ आधारित कानूनी शोध उपकरणों और दस्तावेजी प्रबंधन प्रणालियों का उपयोग किया जाए।ताकि न्याय प्रक्रिया और अदालती कार्यवाही तेज व प्रभावी हो सके। रिपोर्ट 2 दिसंबर तक उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है।

अभी देश में 790 विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट हैं जिनमें 400 सिर्फ पॉक्सो केस सुनती हैं जबकि बाकी में दुष्कर्म और पॉक्सो दोनों केस चलते हैं। इसके अलावा सामान्य विशेष अदालतों में भी पॉक्सो केस चलते हैं। पॉक्सो कानून कहता है एक वर्ष में केस का निपटारा हो जाना चाहिए जबकि ऐसा होता नहीं और ढेर लगता जाता है।

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