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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने बीते रविवार को बांग्लादेश के हिंदुओं से एकजुट होने और “लड़ने” की अपील की और उन्हें भारत और दुनिया भर के हिंदुओं के समर्थन का भरोसा दिलाया.
बांग्लादेश की स्थिति और भारत की सुरक्षा पर असर को लेकर पूछे गए सवाल पर भागवत ने दावा किया कि ‘इस बार बांग्लादेश के हिंदुओं ने मुश्किल हालात में भी न भागने का फ़ैसला किया है.’
भागवत ने यह बात मुंबई में संघ के 100 साल पूरे होने पर दिए गए एक व्याख्यान के बाद श्रोताओं के सवालों के जवाब देते हुए कही.
इसी कार्यक्रम में भागवत ने तीन बच्चे पैदान करने, सावरकर को भारत रत्न देने और विदेशी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ ज़्यादा सख़्त रुख़ अपनाने समेत कई मुद्दों पर बात की.
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बांग्लादेश में हिंदुओं को लेकर संघ प्रमुख ने ये पहली बार नहीं बोला है. बीते दिसंबर के अंत में कोलकाता में हुए एक सेमिनार में उन्होंने ‘बांग्लादेश में हिंदुओं को एकजुट’ रहने का आह्वान किया था.
उन्होंने कहा था, “वहाँ (बांग्लादेश में) हिंदू अल्पसंख्यक हैं और स्थिति काफी कठिन है. हालांकि यह मुश्किल है, लेकिन अधिकतम सुरक्षा के लिए वहाँ के हिंदुओं को एकजुट रहना होगा… और दुनिया भर के हिंदुओं को उनकी मदद करनी चाहिए.”
दरअसल बांग्लादेश में शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद से देश में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं और उनकी सुरक्षा को लेकर भारत सरकार ने भी कई बार अंतिरम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस से अपील की है.
हालांकि हर बार बांग्लादेश सरकार और प्रशासन ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का वादा किया और संगठित हमलों के आरोपों को ख़ारिज किया है.
बांग्लादेश में कुछ दिनों पहले छात्र नेता उस्मान हादी की गोली लगने से मौत के बाद अल्पसंख्यकों पर हमले और तेज़ हुए.
भागवत ने क्या कहा

बीते रविवार को मुंबई में हुए कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने कहा, “बांग्लादेश में अब भी 1.25 करोड़ हिंदू हैं. अगर वे एकजुट हो जाएं, तो वहां की राजनीतिक व्यवस्था का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए, अपनी सुरक्षा के लिए कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें एकजुट होना होगा. ख़ुशी की बात यह है कि इस बार उन्होंने तय किया कि वे भागेंगे नहीं, वहीं रहेंगे और लड़ेंगे. अब अगर वे लड़ने जा रहे हैं, तो एकता ज़रूरी होगी. जितनी जल्दी वे एकजुट होंगे, उतना बेहतर होगा. “
उन्होंने कहा, “बांग्लादेश में मौजूदा हिंदुओं की संख्या के साथ वे अपनी स्थिति में काफ़ी सुधार कर सकते हैं. इसमें, हम यहां अपनी सीमाओं के भीतर रहकर, और दुनिया भर के हिंदू अपने-अपने स्थानों से, उनके लिए जो कुछ भी कर सकते हैं, करेंगे. मैं आपको इसकी गारंटी दे सकता हूं…”
उन्होंने कहा, “लेकिन इसके लिए वहां समाज के अंदर एक बल खड़ा होना होगा…” साथ ही उन्होंने कहा कि इसका मक़सद ‘समाज में सजगता और सुरक्षा की तैयारी’ है, जिसके लिए सिविल डिफ़ेंस का कोर्स भी चलता है.
भागवत ने कहा, “संघ कार्यकर्ता भाषा के माध्यम से संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान करते हैं और अधिकारियों को इसकी सूचना देते हैं.” हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि कौन सी भाषा.
उन्होंने कहा कि पहचान और निर्वासन की प्रक्रिया धीरे-धीरे शुरू हो गई है और इसमें तेजी आएगी. उन्होंने विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन अभियान (एसआईआर) का हवाला दिया, जिसके तहत कुछ व्यक्तियों को की पहचाना की गई और मतदाता सूची से उनका नाम हटा दिया गया.
उन्होंने जनसंख्या असंतुलन के तीन मुख्य कारण बताए- धर्मांतरण, घुसपैठ और कम जन्म दर. और इसी के साथ ‘तीन बच्चे पैदा करने’ की बात कही. हालांकि इसे निजी पसंद का मामला भी बताया.
बांग्लादेश में इसी महीने आम चुनाव
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माना जा रहा है कि मोहन भागवत का बांग्लादेश के हिंदुओं को लेकर दिया गया वक्तव्य वहां इसी हफ़्ते होने वाले आम चुनावों के मद्देनज़र हो सकता है, हालांकि संघ वहां अल्पसंख्यकों ख़ासकर हिंदुओं पर हमले के मुद्दे को लगातार उठाता रहा है.
बांग्लादेश की कुल आबादी में अल्पसंख्यक समुदायों की हिस्सेदारी लगभग नौ फ़ीसदी है. हिंदू देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं जबकि मुसलमानों की आबादी लगभग 91 प्रतिशत है.
बांग्लादेश में इसी हफ़्ते आम चुनाव होने वाले हैं. मतदान गुरुवार, 12 फ़रवरी को सुबह 7:30 बजे से शुरू होगा.
चुनाव प्रचार का शोर अगले 48 घंटे में थम जाएगा और इसीलिए सभी प्रमुख पार्टियां अपना अंतिम ज़ोर लगा रही हैं.
लेकिन देश की प्रमुख पार्टियों में से शेख़ हसीना की अवामी लीग इस बार मैदान में नहीं है क्योंकि अंतरिम सरकार ने उसके चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा रखा है.
माना जाता है कि अवामी लीग का परम्परागत वोट 30 प्रतिशत है और इस चुनाव में पार्टी के न लड़ने से समर्थकों के बीच असमंजस है.
हालांकि आम चुनाव के दिन ही मतदाता जुलाई चार्टर पर आधारित संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी अपना वोट डालेंगे.
इस चार्टर में बांग्लादेश की संस्थाओं की भूमिका बताई गई है. इसमें ऊपरी और निचले सदन वाली यानी दो सदनों वाली संसद बनाने का सुझाव दिया गया है; और उन सुधारों की सूची दी गई है जिन्हें नई सरकार को लागू करना होगा.
अल्पसंख्यों के उत्पीड़न पर चिंता
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पिछले महीने ही बीबीसी संवाददाता जुगल पुरोहित की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार, बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बन रहा है.
बांग्लादेश के अंदर और बाहर-दोनों जगहों से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा बेहतर बनाने की मांगें लगातार उठ रही हैं. इनसे सरकार पर दबाव भी बना है.
बीते दिसंबर में एक हिंदू कपड़ा श्रमिक दीपू चंद्र दास को ईशनिंदा के आरोप में पीट पीट कर मार डाला गया था जिसके बाद बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने इस हत्या की निंदा की और परिवार को इंसाफ़ दिलाने का भरोसा दिलाया है. सरकार ने परिवार को आर्थिक मदद और कुछ दूसरी सहायता भी दी हैं.
प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस की ओर से जारी एक और बयान में कहा गया था कि इस तरह की किसी भी हिंसा की नए बांग्लादेश में कोई जगह नहीं है. दोषियों को बख़्शा नहीं जाएगा.
बीते दिसंबर में भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि स्वतंत्र स्रोतों से इकट्ठा की गई जानकारी के मुताबिक़, अंतरिम सरकार के दौरान अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ 2,900 से ज़्यादा हिंसा की घटनाएं हुईं. इनमें हत्या, आगज़नी और ज़मीन कब्ज़ा करने जैसी घटनाएं शामिल हैं.
विदेश मंत्रालय ने कहा कि इन घटनाओं को यह कहकर नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता कि इसे बढ़ा चढ़ाकर बताया जा रहा है या यह सिर्फ़ राजनीतिक हिंसा है.
लेकिन बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत के बयान को ख़ारिज करते हुए कहा, वह अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत से जुड़े अपराधों को लेकर गंभीर चिंता जताता है. इसमें भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े कुछ मामलों का भी ज़िक्र किया गया था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.