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मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित पोर्ट सिटी चटगाँव में पले-बढ़े. अपने पिता के नौ बच्चों में यूनुस तीसरे बच्चे थे.
वह बॉय स्काउट्स में सक्रिय थे और किशोरावस्था में जापान, अमेरिका और यूरोप सहित दूर-दराज़ स्थानों पर अंतरराष्ट्रीय जैम्बोरी में भाग लेने के लिए यात्रा की.
उन्हें वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए फुलब्राइट स्कॉलरशिप मिली थी, जहाँ उन्होंने 1971 में अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की और मिडिल टेनेसी स्टेट यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाया भी.
1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, यूनुस ने नए देश को आधिकारिक मान्यता दिलाने के लिए अमेरिकी सरकार से पैरवी की और बांग्लादेशी प्रवासी समुदाय के लिए एक न्यूज़लेटर चलाने में मदद की.
यूनुस 1972 में बांग्लादेश लौटे. वे स्वतंत्रता सेनानी और शेख़ हसीना के पिता शेख़ मुजीब-उर रहमान के नेतृत्व में नए देश के निर्माण में भाग लेने के लिए उत्सुक थे.
उन्होंने पहले सरकार के योजना आयोग में भूमिका निभाई, उसके बाद अपने गृह नगर की यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाने लौट आए.
मोहम्मद यूनुस ने 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के एक साल बाद अगस्त 2007 में नागरिक शक्ति नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई थी. लेकिन यह पार्टी चल नहीं पाई.
30 नवंबर 2007 को अमेरिकी अख़बार वाल स्ट्रीट जर्नल ने मोहम्मद यूनुस से पूछा था कि उनकी पार्टी आगे क्यों नहीं बढ़ पाई?
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यूनुस की पार्टी बनने के साथ ही बिखर गई
इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर यूनुस ने कहा था, ”नोबेल मिलने के बाद मुझ पर राजनीति में आने और शासन को सुधारने का जबरदस्त दबाव था. मैंने सोचा कि मैं यह करूँगा लेकिन जब मैंने शुरुआत की तो मुझे लगा कि यह वैसा राजनीतिक दल नहीं बन पाएगा जैसा मैं बनाना चाहता था.”
”मैं अपनी पार्टी में साफ़-सुथरी छवि वाले लोगों को लाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन जिन लोगों से मैंने संपर्क किया, उन्होंने एक-एक कर कहा, “नहीं, मैं राजनीति में नहीं आना चाहता,” और शामिल होने से मना कर दिया. जिन लोगों ने पार्टी में आने में रुचि दिखाई, वे वही लोग थे जिन्हें हम सरकार से हटाना चाहते थे. इसलिए मैंने वहीं रुकने का फ़ैसला किया.”
मोहम्मद यूनुस के पार्टी बनाने के फ़ैसले से बांग्लादेश की दोनों अहम सियासी दल ख़ुश नहीं थे.
तब अवामी लीग की प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने कहा था, “राजनीति में अचानक आने वाले नए लोग ख़तरनाक तत्व होते हैं और उन्हें संदेह की नज़र से देखा जाना चाहिए.”.

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता और बेगम ख़ालिदा ज़िया की सरकार में क़ानून मंत्री रहे मौदूद अहमद ने अधिक सावधानी बरती थी.
मौदूद ने कहा था, “उनका राजनीति में स्वागत है. मैं उनकी सफलता की कामना करता हूँ लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि अगर वह इसमें न पड़ते तो बेहतर होता.”
जब शेख़ हसीना 2009 में सत्ता में आईं, तो वह यूनुस की आलोचक बन गईं. हालाँकि इससे पहले हसीना उनकी समर्थक रही थीं.
हसीना की सरकार ने यूनुस और ग्रामीण बैंक के ख़िलाफ़ कई जाँचें शुरू कीं.
हसीना ने यूनुस को “ख़ून चूसने वाला” कहा और उन पर आरोप लगाया कि वह ग़रीब ग्रामीण महिलाओं से क़र्ज़ वसूली के लिए बल और अन्य तरीक़ों का इस्तेमाल करते हैं.
लेकिन जुलाई 2024 में शेख़ हसीना के ख़िलाफ़ विद्रोह की शुरुआत हुई और अगस्त की शुरुआत में ही उन्हें जान बचाकर भारत आना पड़ा.
हसीना के बाद छात्र आंदोलनकारियों ने मोहम्मद यूनुस को यूरोप से बुलाया और उन्हें अंतरिम सरकार की ज़िम्मेदारी दे दी.
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यूनुस के शासन में भारत से तनातनी
शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद मोहम्मद यूनुस ने क़रीब 18 महीनों तक अंतरिम सरकार की ज़िम्मेदारी संभाली और इस दौरान भारत के साथ संबंध बद से बदतर होते गए.
मोहम्मद यूनुस भारत से ख़राब होते संबंधों को लेकर कहते थे कि इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं है.
पिछले साल सितंबर में एशिया सोसाइटी के साथ बातचीत में मोहम्मद यूनुस ने कहा था, ”इस समय भारत के साथ हमारी समस्याएँ हैं क्योंकि उन्हें छात्रों का विद्रोह पसंद नहीं आया. भारत पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को शरण दे रहा है. हसीना ने ही सभी समस्याएँ पैदा की हैं. इससे भारत और बांग्लादेश के बीच काफ़ी तनाव बढ़ा है.”
दूसरी तरफ़ भारत कहता रहा कि मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार अल्पसंख्यकों को सुरक्षा नहीं दे पा रही है और कट्टरपंथियों को बढ़ावा दे रही है.
मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश नेशलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी का समर्थन हासिल था.
यूनुस की अंतरिम सरकार ने ही जमात से प्रतिबंध ख़त्म किया और चुनाव लड़ने की इजाज़त दी.
यूनुस की सरकार में ही ख़ालिदा ज़िया जेल से बाहर आईं और उनके बेटे तारिक़ रहमान भी 17 सालों बाद लंदन से ढाका वापस आए.
अभी जब तारिक़ रहमान प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरकार में भी मोहम्मद यूनुस के ख़ास रहे रिटायर्ड डिप्लोमैट ख़लीलुर रहमान को विदेश मंत्री बनाया गया.
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार में ख़लीलुर रहमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे.
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मोहम्मद यूनुस को लेकर इतनी तल्ख़ी क्यों?
ऐसे में सवाल उठता है कि तारिक़ रहमान के साथ जो उदारता भारत दिखा रहा है, वैसी उदारता मोहम्मद यूनुस के साथ क्यों नहीं दिखाई दी?
यही सवाल थिंक टैंक अनंता सेंटर की सीईओ इंद्राणी बागची से पूछा तो उन्होंने जवाब में कहा, ”मोहम्मद यूनुस के साथ सख़्ती से भारत को कुछ हासिल तो नहीं हुआ. तारिक़ रहमान के मामले में भारत ने पूरी तरह से यूटर्न लिया है. लेकिन यूनुस जिस तरीक़े से बांग्लादेश को आगे बढ़ा रहे थे, उससे स्पष्ट था कि वह भारत के हितों के ख़िलाफ़ काम कर रहे थे.”
”मिसाल के तौर पर 2024 के दिसंबर महीने में पाकिस्तान का एक मालवाहक पोत कराची से बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चटगांव बंदरगाह पहुँचा था. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच यह पहला समुद्री संपर्क हुआ था. ऐसा तो बीएनपी की सरकार में भी नहीं हुआ था.”
इंद्राणी बागची कहती हैं, ”पूरा चुनाव देख लीजिए तो मोहम्मद यूनुस के समर्थन वाली एनसीपी (नेशनल सिटिजन पार्टी) भारत के सेवन सिस्टर्स को लेकर क्या बोल रही थी. मुस्तफ़िज़ुर रहमान को जब आईपीएल से हटाया गया तो बीएनपी से लेकर जमात तक ने कुछ नहीं कहा लेकिन मोहम्मद यूनुस ने बिल्कुल ही अतिवादी लाइन ली.”

”टी-20 वर्ल्ड कप भारत में होने के कारण बांग्लादेश ने टूर्नामेंट नहीं खेलने का फ़ैसला किया. बांग्लादेश सेना के शीर्ष के अधिकारी पाकिस्तान का दौरा करने लगे. यानी मोहम्मद यूनुस की लाइन बिल्कुल अलग दिख रही थी.”
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा को लगता है कि ये सारी चीज़ें भले थीं लेकिन भारत को बड़े पड़ोसी होने के नाते बड़ा दिल दिखाना चाहिए था और स्थिति को संभालने की कोशिश करनी चाहिए थी.
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ”पिछले 18 महीनों में दोनों देशों के संबंधों को बहुत नुक़सान हुआ है. न केवल सरकार के लेवल पर संवाद और संपर्क टूटा बल्कि सिविल सोसाइटी के लेवल पर भी संपर्क कमज़ोर पड़ा. दूसरी तरफ़ चीन और पाकिस्तान ने सरकार के साथ सिविल सोसाइटी के स्तर पर भी बांग्लादेश के साथ संपर्क को मज़बूत किया है.”
”हमारे लिए बांग्लादेश बहुत अहम है. केवल चिकन नेक सिलिगुड़ी से आप लुक ईस्ट पॉलिसी पर नहीं चल सकते हैं. अविभाजित भारत वाला रूट आपको बांग्लादेश ही दे सकता है. भारत को थोड़ा त्याग करना चाहिए, बांग्लादेश हमसे 23 गुना छोटा है.”
भारत की एक शिकायत रहती थी कि मोहम्मद यूनुस अल्पसंख्यकों को सुरक्षा नहीं दे रहे हैं और उनके शासन में हमले बढ़े हैं. मोहम्मद यूनुस से भारत की इस शिकायत को प्रोफ़ेसर लामा बहुत उचित नहीं मानते हैं.
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बांग्लादेश में भारत की व्यक्ति केंद्रित नीति?
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ”आप किस मोरल ग्राउंड पर कह रहे थे कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं. क्या भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले नहीं हो रहे हैं? आप जब ख़ुद को उदार और सेक्युलर लोकतंत्र बनाएंगे तभी दूसरे को भी उपदेश देने का नैतिक साहस रखते हैं. आप बांग्लादेश से सेक्युलर राजनीति की उम्मीद करें और भारत में हिन्दुत्व की राजनीति करें, ये तो दोहरा मानदंड है.”
इंद्राणी बागची भी मानती हैं कि भारत की ऐसी उम्मीदों में ‘पाखंड’ ज़्यादा था.
वह कहती हैं कि बीएनपी भी तभी तक भारत के हितों को सुरक्षित रखेगी जब भारत की घरेलू राजनीति में धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा.
प्रोफ़ेसर लामा कहते हैं, ”बांग्लादेश में जो भी सरकार होगी वो जनादेश की उपेक्षा कर काम नहीं करेगी. मसलन जुलाई 2024 में मोहम्मद यूनुस को लाने वाले नौजवान शेख़ हसीना विरोधी थे तो आप ये उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग अंतरिम सरकार नहीं करेगी. मोहम्मद यूनुस वही काम कर रहे थे जो उनके साथ का लोकप्रिय जनसमर्थन चाहता था. भारत को इसका ध्यान रखते हुए रास्ता निकालना चाहिए था.”

हालांकि इंद्राणी बागची बांग्लादेश के मामले में भारत की नीति में निरंतरता देखती हैं. वह कहती हैं, ”आप ये कह सकते हैं कि भारत ने बांग्लादेश में व्यक्ति केंद्रित नीति ज़्यादा चलाई. लेकिन शेख़ हसीना की मांग होती थी कि भारत विपक्ष से बहुत संपर्क ना रखे.”
”ऐसे में मुश्किलें आती हैं. इसके बावजूद आप देखिए कि शेख़ हसीना ने जब बीएनपी को चुनाव नहीं लड़ने दिया तो भारत ने कुछ नहीं कहा था और जब इस चुनाव में अवामी लीग पर प्रतिबंध लगा दिया गया तब भी भारत ने कुछ नहीं कहा.”
पिछले साल 26 से 29 मार्च तक मोहम्मद यूनुस चीन के दौरे पर थे. इस दौरे को भी भारत में अलग नज़रिए से देखा गया.
लेकिन बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रेस सेक्रेटरी शफ़ीक़ुल आलम ने तब कहा था कि मोहम्मद यूनुस पहले भारत का दौरा करना चाहते थे लेकिन नई दिल्ली से कोई जवाब नहीं आया था.
क्या भारत ने मोहम्मद यूनुस की मांग की उपेक्षा की? इस सवाल के जवाब में इंद्राणी बागची कहती हैं, ”भले प्रोफ़ेसर यूनुस ने भारत आने का प्रस्ताव भेजा होगा लेकिन तब तक चीज़ें बहुत बिगड़ गई थीं. मोहम्मद यूनुस की सरकार से कई आक्रामक बयान आ चुके थे, जिनसे दोनों देशों के संबंधों में असहजता बढ़ गई थी.”
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