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बांग्लादेश के आम चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने पार्टी के अध्यक्ष तारिक़ रहमान को बधाई दी है.
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इसहाक डार ने भी कहा कि उनका देश बराबरी और सम्मान की बुनियाद पर बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है.
बांग्लादेश में बीएनपी की जीत पाकिस्तान के लिए अच्छी ख़बर मानी जा रही है. क्योंकि हाल के दिनों में पाकिस्तान ने बांग्लादेश के साथ अपने रिश्ते सुधारने की कोशिश की है.
माना जा रहा है कि बीएनपी सरकार का पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रवैया रहेगा. क्योंकि तारिक़ रहमान की मां और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का रुख़ पाकिस्तान के प्रति सकारात्मक रहा था.
बांग्लादेश में शेख़ हसीना की अवामी लीग की सरकार भारत समर्थक मानी जाती रही है. लेकिन एक युवा आंदोलन के बाद अगस्त 2024 में उनकी सरकार के पतन के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बिगड़ते दिखे.
शेख़ हसीना के भारत आकर शरण लेने के बाद बांग्लादेश में उनके विरोधियों का रुख़ भारत के प्रति कड़ा होता दिखा.
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस भारत से शेख़ हसीना को बांग्लादेश भेजने की मांग करते रहे हैं. इसे लेकर भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्तों में काफी तनातनी दिखी.
इसके साथ ही बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के लोगों पर हमले की भारत ने निंदा की. बांग्लादेश ने इसे अपने आंतरिक मामलों में दख़ल के तौर पर देखा.
पाकिस्तान और बांग्लादेश की नज़दीकी
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इस बीच, बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाओं के उभार में पाकिस्तान को उससे संबंध सुधारने के मौके दिखे.
शेख़ हसीना की सरकार के दौरान पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्ते अच्छे नहीं रहे थे. अवामी लीग सरकार में 1971 के युद्ध में बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी के ख़िलाफ़ साजिश करने के आरोप में कई पाकिस्तान और जमात समर्थकों को मौत की सजा दी गई थी.
लेकिन अगस्त 2024 में शेख़ हसीना सरकार के पतन के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश के रिश्तों में सरगर्मियां बढ़ने लगी.
साल 2024 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने यूनुस से दो बार मुलाक़ात की.
इन मुलाक़ातों के दौरान सैन्य और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने की कोशिश की गई.
सितंबर 2025 में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इसहाक डार ढाका पहुंचे थे.
इधर, मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार भी पाकिस्तान के साथ संबंधों को मजबूत करने की कोशिश कर रही थी.
दोनों देशों ने 1971 के युद्ध के बाद पहली बार प्रत्यक्ष व्यापार शुरू किया. दोनों देशों के बीच 14 साल बाद सीधी उड़ान सेवाएं भी बहाल की गईं.
2012 में सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए ढाका ने उड़ान सेवाएं बंद कर दी थीं.
पिछले एक वर्ष में दोनों देशों के बीच रक्षा मामलों पर भी बातचीत हुई.
विशेषज्ञों का मुताबिक़ पाकिस्तान बांग्लादेश में जारी राजनीतिक बदलाव का फ़ायदा उठाना चाहता है.
पाकिस्तान के लिए फ़ायदे की बात

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज का कहना है कि बीएनपी की सरकारों के दौरान बांग्लादेश के पाकिस्तान के साथ संबंध अच्छे रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी हिन्दी से कहा, ”1991 से 1996 और फिर 2001 से 2006 के बीच बांग्लादेश में बीएनपी की सरकार थी तो पाकिस्तान के साथ उसके कामकाजी रिश्ते अच्छे थे.”
उन्होंने कहा, ”पाकिस्तान में इस्लामी विचारधारा को काफी बढ़ावा मिलता है और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी भी ‘सॉफ्ट इस्लाम’ की बात करती है. अगर बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी की गठबंधन सरकार होती तो कट्टर इस्लाम को बढ़ावा मिलता. लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिखता. फिर भी बांग्लादेश में बीएनपी का आना पाकिस्तान के लिए अच्छी ख़बर है.”
पाकिस्तान के प्रति ख़ालिदा ज़िया के सहानुभूतिपूर्ण रवैए को भारत में कभी पसंद नहीं किया गया. अब अगर बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच संबंध अच्छे हुए तो भारत पर क्या असर पड़ेगा?
बीबीसी हिन्दी के इस सवाल के जवाब में संजय भारद्वाज ने कहा,” जब 2001 से 2006 के बीच ख़ालिदा ज़िया की सरकार थी तो बीएनपी का सारा कामकाज उसके अध्यक्ष के राजनीतिक दफ़्तर ‘हवा भवन’ से तारिक़ रहमान ही देखते थे. उस दौर में भी तारिक़ रहमान की नीति पाकिस्तान के प्रति नरम थी. भारत के साथ कामकाजी रिश्ते थे लेकिन उस दौरान बांग्लादेश और भारत का अच्छा तालमेल नहीं था.”
संजय भारद्वाज कहते हैं कि भारत समावेशी समाज और लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन बीएनपी की नीति में सेना का अहम रोल है. साथ ही इसके विचार के मूल में इस्लाम है. भारत लोकतांत्रिक, सेक्युलर और समावेशी बांग्लादेशी राष्ट्रवाद के पक्ष में खड़ा दिखा है. लेकिन बांग्लादेश में अब ये माहौल दिखेगा, इसकी उम्मीद कम ही है.
वो कहते हैं, ” बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी और इस्लामी तत्व मजबूत हुए हैं. इसलिए उसे संतुलित करने के लिए बांग्लादेश में तारिक़ सरकार को पाकिस्तान के साथ रिश्ते अच्छे रखने ही होंगे. भारत के साथ अवामी लीग की सरकार के दिनों जैसे संबंध नहीं रह पाएंगे. ये पाकिस्तान के लिए अच्छी ख़बर है.”
भारत की बीएनपी से नज़दीकी की कोशिश
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की ‘जीत’ पर पार्टी अध्यक्ष तारिक़ रहमान को बधाई दी है.
नरेंद्र मोदी ने तारिक़ रहमान से फ़ोन पर हुई बातचीत का हवाला देते हुए एक्स पर लिखा, ”तारिक़ रहमान से बात करके बहुत खुशी हुई. मैंने उन्हें बांग्लादेश चुनाव में शानदार जीत के लिए बधाई दी. मैंने दोनों देशों के लोगों की शांति, तरक्की और खुशहाली के लिए भारत की लगातार प्रतिबद्धता को दोहराया.”
वहीं तारिक़ रहमान ने भी कहा कि उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी से बात करके बहुत खुशी हुई.
बीएनपी की पोल कोऑर्डिनेशन कमेटी के चीफ़ नज़रुल इस्लाम ख़ान ने कहा, ”हम अपने नेता तारिक़ रहमान को बधाई देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद देते हैं. यह बहुत अच्छी बात है. एक लोकतांत्रिक देश को लोगों के फ़ैसले को मानना चाहिए.”
पीएम मोदी और तारिक़ का एक दूसरे की तारीफ़ से ऐसा लग रहा है कि पिछले दिनों भारत ने बीएनपी के साथ संबंध सुधारने की जो पहल शुरू की थी उसके नतीजे अच्छे रहे हैं.
इस साल जब तारिक़ रहमान की मां और बांग्लादेश की पूर्व पीएम ख़ालिदा ज़िया का निधन हुआ था तो भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ढाका पहुंचे थे.
उस समय अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना था कि बीएनपी अध्यक्ष को श्रद्धांजलि देने के लिए भारत के विदेश मंत्री और भारतीय सरकार का शोक संदेश भविष्य के संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर भारत के रुख़ का स्पष्ट संकेत है.
भारत यह मानकर बीएनपी के साथ संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है कि आगामी चुनावों में वह सत्ता में आ सकती है.
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भारत ने इस अवसर का उपयोग कर अंतरिम सरकार के साथ अपनी असहजता को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की थी.
पाकिस्तान के साथ बढ़ती क़रीबी पर शेख़ हसीना के बेटे ने क्या कहा था?
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बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के बेटे सजीब वाज़िद ने बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार से पाकिस्तान की बढ़ती क़रीबी को लेकर इंडियन एक्सप्रेस से कहा, था ”यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए. हमारी अवामी लीग सरकार ने भारत की पूर्वी सीमाओं को सभी आतंकवादी गतिविधियों से सुरक्षित रखा था. उससे पहले, बांग्लादेश का व्यापक रूप से भारत में विद्रोह फैलाने के लिए एक बेस के रूप में इस्तेमाल किया जाता था.”
उन्होंने कहा था, ”अब वही स्थिति फिर से लौटेगी. यूनुस सरकार ने देश में जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी दलों को खुली छूट दे दी है. बांग्लादेश में इस्लामी दलों को कभी भी पाँच प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले हैं. सभी प्रगतिशील और उदारवादी दलों पर प्रतिबंध लगाकर एक धांधलीपूर्ण चुनाव कराकर, यूनुस इस्लामी कट्टरपंथियों को सत्ता में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.”
शिव नादर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर और इंडियाज वर्ल्ड मैगज़ीन के संपादक हैपीमोन जैकब ने 22 दिसंबर को अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स में लिखा था, ” भारत के लिए बांग्लादेश के साथ तेज़ी से बिगड़ते संबंध तीनतरफ़ा चुनौती पेश कर रहे हैं. 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा पर असुरक्षा और घुसपैठ का ख़तरा बढ़ेगा. भारत-विरोधी ताक़तों की ओर से सीमा-पार ठिकाने स्थापित किए जाने का भी ख़तरा है.”
उन्होंने लिखा, “भारत और बांग्लादेश के बीच तनाव का पाकिस्तान और चीन फ़ायदा उठा रहे हैं. बांग्लादेश में पाकिस्तान की सक्रियता भी बढ़ी है. इस वर्ष जून में चीन के कुनमिंग में बांग्लादेश और पाकिस्तान के विदेश सचिवों के साथ चीन के उप विदेश मंत्री सुन वेइदोंग की त्रिपक्षीय बैठक ने भारत के लिए चिंता का संकेत दिया था. इसके बाद 2024 के अंत में पाकिस्तानी नौसेना के एक जहाज़ का बांग्लादेश के चटगाँव बंदरगाह पर अभूतपूर्व दौरा हुआ.”
पाकिस्तान के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक परवेज़ हुदभाई पिछले साल नवंबर में बांग्लादेश गए थे.
परवेज़ हुदभाई ने भी ऐसा महसूस किया कि बांग्लादेश में बांग्ला राष्ट्रवाद पर इस्लामिक राष्ट्रवाद हावी हो रहा है.
परवेज़ हुदभाई ने इस मामले में इसी साल फ़रवरी में बीबीसी के साथ बातचीत में कहा था, ”बांग्लादेश में एक बेचैनी है. अभी एक तरफ़ सेक्युलर नेशनलिज़्म है, जिसमें भाषायी पहचान की बात है. इस बात पर बांग्लादेश के लोग अरसे तक गर्व करते रहे हैं. दूसरी तरफ़ बांग्लादेश के भीतर मज़हबी ताक़त भी सिर उठा रही है. इनकी कोशिश है कि बांग्लादेश को इस्लामी रंग दिया जाए.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.