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बांग्लादेश में दो साल में दूसरी बार नई सरकार चुनने की तैयारी हो रही है.
साल 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए विद्रोह ने बांग्लादेश में शेख़ हसीना की अवामी लीग सरकार को गिरा दिया था.
इसके बाद 12 फ़रवरी को क़रीब 13 करोड़ वोटर पहली बार राष्ट्रीय चुनाव में वोट देंगे.
यह चुनाव न सिर्फ़ बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि दक्षिण एशिया के लिए भी अहम है. इन चुनावों के नतीजों पर देश के व्यापारिक संबंध और राजनयिक रिश्ते निर्भर कर सकते हैं.
यहां हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि बांग्लादेश में चुनाव कैसे होगा और यह क्यों मायने रखता है.
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यह चुनाव क्यों महत्वपूर्ण है?
बांग्लादेश एक ऐसे चुनाव की ओर बढ़ रहा है जैसा देश ने बीते कई सालों में नहीं देखा है.
कई दशकों में यह पहली बार है कि बांग्लादेश की दो प्रमुख राजनीतिक हस्तियां, शेख़ हसीना और ख़ालिदा ज़िया चुनावों में नहीं होंगी.
बांग्लादेश में वोटर सिर्फ़ नई सरकार नहीं चुन रहे हैं. वे एक संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी वोट देंगे जो तय करेगा कि जुलाई चार्टर, जो एक बड़े संवैधानिक सुधारों का पैकेज है, लागू होगा या नहीं.
चुनाव में इस बात की भी परीक्षा होगी कि सालों की राजनीतिक उथल-पुथल और अस्थिरता से जूझ रहे देश में लोकतंत्र की बहाली संभव है या नहीं.
चुनाव मैदान में कौन-कौन हैं?
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बांग्लादेश की राजनीति पर कई दशकों से दो प्रमुख पार्टियों अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का दबदबा रहा है.
देश में अवामी लीग और उसके गठबंधन के सहयोगियों के किसी भी राजनीतिक गतिविधि पर प्रतिबंध लगाना, मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के शुरुआती फैसलों में से एक था.
बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने पार्टी का रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया, जिससे तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी चुनाव मैदान में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई.
वहीं अवामी लीग की ग़ैरमौजूदगी से बनी जगह जमात-ए-इस्लामी ने ली है, जो एक इस्लामी पार्टी है जिसे लंबे समय से चुनावी राजनीति से बाहर रखा गया था.
इन चुनावों में छात्र नेताओं की युवाओं पर केंद्रित नई पार्टी ‘नेशनल सिटिजन पार्टी’ (एनसीपी) ने भी जमात के साथ गठबंधन किया है.
हालांकि चुनावों में कुछ और छोटी पार्टियां भी हैं, लेकिन असली मुक़ाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच है.
वोटरों के अहम मुद्दे क्या हैं
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हालांकि देश में बढ़ती महंगाई, नौकरियाँ, भ्रष्टाचार और क़ानून-व्यवस्था जैसी रोज़मर्रा की चिंताएँ हावी हैं, लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि क्या नई सरकार राजनीतिक सुधार और लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुनिश्चित कर पाएगी.
सालों से देश में राजनीतिक हिंसा देखी गई है, जिसमें क्रूर कार्रवाई, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियाँ और विरोध करने वालों का अचानक गायब हो जाना शामिल है.
देश में पिछली सरकारों के दौरान हुए दुर्व्यवहारों के लिए जवाबदेही तय करने की माँग भी काफ़ी ज़्यादा है.
यहाँ भ्रष्टाचार एक और बड़ी समस्या है, ख़ासकर सरकारी दफ्तरों में.
वर्ल्ड बैंक ने नवंबर 2025 में एक प्रेस रिलीज़ में कहा कि बांग्लादेश में ग़रीबी बढ़ी है, और नौकरियाँ कम हैं, ख़ासकर महिलाओं के लिए.
18 से 37 साल की उम्र के 40 फ़ीसदी से ज़्यादा योग्य मतदाताओं के लिए रोज़गार और शारीरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दे उनकी उम्मीदों की सूची में सबसे ऊपर हैं.
देश के ज़्यादातर मतदाताओं के लिए यह चुनाव इस बारे में है कि क्या अगला नेतृत्व स्थिरता, निष्पक्षता और यह लोगों में यह भावना ला सकता है कि सरकार आम लोगों के लिए काम कर रही है.
बांग्लादेश की चुनावी प्रणाली कैसे काम करती है?
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बांग्लादेश ‘फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट’ सिस्टम से अपनी 300 सदस्यों वाली संसद का चुनाव करता है. इसमें एक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सांसद होता है.
इसमें जिस उम्मीदवार को सबसे ज़्यादा वोट मिलता है, जीत उसी की होती है. भले ही उसे कुल वोटों के 50 फ़ीसदी से कम वोट मिलें. सरकार बनाने के लिए संसद में साधारण बहुमत की ज़रूरत होती है.
इस साल पहली बार विदेश में रहने वाले बांग्लादेशी भी पोस्टल बैलेट से वोट दे सकते हैं.
देश के चुनाव आयोग ने आठ लाख से ज़्यादा बैलेट जारी किए हैं, जिन्हें 12 फरवरी की दोपहर तक संबंधित पीठासीन अधिकारी के पास पहुंचना है.
हालांकि इसमें देरी और छेड़छाड़ के बारे में चिंताएं जताई गई हैं.
लेकिन चुनाव आयोग ने पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए फेशियल रिकग्निशन और मोबाइल ऐप ट्रैकिंग जैसे सुरक्षा उपाय अपनाने का दावा किया है.
‘जुलाई चार्टर’ जनमत संग्रह क्या है और यह क्यों मायने रखता है?
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12 फरवरी को नई सरकार चुनने के साथ-साथ, मतदाता जुलाई चार्टर पर आधारित संवैधानिक जनमत संग्रह पर भी अपना वोट डालेंगे.
जुलाई चार्टर में बताया गया है कि बांग्लादेश पर कैसे शासन किया जाएगा.
इसका मक़सद कार्यपालिका में केंद्रित अधिकार को कम करना है. इसके साथ ही शासन की विभिन्न शाखाओं के बीच नियंत्रण और संतुलन को मज़बूत करना, और उस राजनीतिक प्रभुत्व को रोकना है जो हाल के दशकों में देश में दिखा है.
इस चार्टर में बांग्लादेश की संस्थाओं की भूमिका बताई गई है. इसमें ऊपरी और निचले सदन वाली यानी दो सदनों वाली संसद बनाने का सुझाव दिया गया है; और उन सुधारों की सूची दी गई है जिन्हें नई सरकार को लागू करना होगा.
अगर इस जनमत संग्रह में ‘हां’ वोट मिलते हैं तो नई संसद कानूनी रूप से 84 सुधारों के एक सेट को लागू करने के लिए बाध्य होगी.
अगर ‘नहीं’ वोट की जीत होती है, तो जुलाई चार्टर अगली सरकार पर बाध्यकारी नहीं होगा, और सुधार पूरी तरह से बहुमत वाली पार्टी की इच्छा पर निर्भर होगा.
क्या विश्वसनीयता और निष्पक्षता को लेकर चिंताएं हैं?
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बांग्लादेश के पिछले तीन राष्ट्रीय चुनाव काफी विवादों में रहे, जिनमें वोटिंग में धांधली के आरोप और हिंसा हुई. बीएनपी ने साल 2014 और 2024 में चुनावों का बहिष्कार किया था.
इस बार, अवामी लीग की ग़ैरमौजूदगी ने चुनावों में हर किसी को साथ लेकर चलने और प्रतिस्पर्धा पर सवाल खड़े किए हैं.
इस चुनाव में सोशल मीडिया एक मुख्य कैंपेन प्लेटफॉर्म के तौर पर उभरा है, जिसमें टिकटॉक, फेसबुक और यूट्यूब युवा वोटर्स को लुभाने का नया तरीका बन गए हैं.
एआई से बने कंटेंट की बाढ़ ने ग़लत जानकारी और मनगढ़ंत कहानियों के ज़रिए वोटर्स को गुमराह करने की चिंताओं को बढ़ा दिया है.
क्या चुनावों में हिंसा का ख़तरा है?
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लंबे समय से चली आ रही दुश्मनी और राजनीतिक ध्रुवीकरण के कारण बांग्लादेश में चुनावी हिंसा होती रही है.
साल 2026 के चुनावों से पहले भी यही पैटर्न देखने को मिला है, जिसमें पूरे देश में झड़पें, चुनाव प्रचार करने वालों को परेशान करना और मतदाताओं को डराने-धमकाने की ख़बरें सामने आई हैं.
पिछले कुछ हफ़्तों में कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मारे जाने की ख़बरें भी आई हैं, जिससे मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई है.
साल 2024 में जुलाई के विद्रोह के बाद देश में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं. इस दौरान लूटी गई सैकड़ों बंदूकें अभी भी बरामद नहीं हुई हैं, जिससे झड़पों में इन हथियारों के इस्तेमाल का ख़तरा बढ़ गया है.
यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि चुनाव आयोग ने जो सुरक्षा उपाय किए हैं, उन्हें ठीक से लागू किया जाता है या नहीं.
बांग्लादेश चुनाव का दक्षिण एशिया के लिए महत्व
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दक्षिण एशिया के देशों में राजनीति धर्म और पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है.
बांग्लादेश के चुनाव के नतीजे पूरे क्षेत्र में राजनीतिक माहौल को बदल सकते हैं, जिससे माइग्रेशन और सीमा सुरक्षा पर असर पड़ेगा.
यहां सरकार कौन बनाता है, इसके आधार पर भारत और पाकिस्तान के साथ उसके द्विपक्षीय संबंध बदल सकते हैं.
जब से शेख़ हसीना सत्ता से हटकर भारत में रह रही हैं, तब से भारत के साथ बांग्लादेश के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. लेकिन पाकिस्तान के साथ उसके संबंध हाल के समय में बेहतर हुए हैं.
साल 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश एक नया देश बना था, इसके बाद से दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण ही रहे थे.
बांग्लादेश अमेरिका और चीन के बीच एक ख़ामोश मुक़ाबले के केंद्र में भी है, जिसमें चीन बांग्लादेश को दक्षिण एशिया का प्रवेश द्वार और अपनी ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ योजना में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखता है.
दक्षिण एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते, बांग्लादेश की स्थिरता दक्षिण एशिया की कूटनीतिक तस्वीर को महत्वपूर्ण रूप से आकार दे सकती है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.