जेएनएन, बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने भरण-पोषण के संबंध में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि यदि कोई महिला बिना किसी वैध कारण के अपने पति से अलग रहने का निर्णय लेती है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होगी।
इस निर्णय में परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पत्नी को मासिक भरण-पोषण नहीं दिया जाना चाहिए।
यह फैसला वैवाहिक विवादों में कानूनी मानकों में बदलाव का संकेत देता है, जिसमें न्याय का आधार केवल वैवाहिक संबंध नहीं, बल्कि आचरण भी महत्वपूर्ण होगा। यह मामला 27 जनवरी को बिलासपुर निवासी की दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की एकल पीठ ने कहा कि जब पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा नौ के तहत वैवाहिक अधिकारों की बहाली की मांग की थी, तब पत्नी अपने अधिकारों के तहत वैवाहिक जीवन को पुन: आरंभ करने के लिए घर लौट सकती थी।
याचिकाकर्ता का विवाह फरवरी 2019 को हुआ था। कुछ दिनों बाद ही पत्नी ने दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए अक्टूबर 2020 में पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ महिला थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
याचिकाकर्ता ने नवंबर 2020 को जेएमएफसी कोर्ट में मामला दायर किया, जिसे मार्च 2021 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की, उसे भी खारिज कर दिया गया। इस दौरान वह माता-पिता के साथ रह रही थी और परिवार न्यायालय से गुजारा भत्ता की मांग की थी।