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बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद से ही कई इलाक़ों में ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ चल रहा है.
पटना, नालंदा, सीतामढ़ी, दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर, बेगूसराय, सारण, समस्तीपुर, गया समेत राज्य के कई ज़िलों में प्रशासन यह अभियान चला रहा है.
कड़ाके की सर्दी के बीच कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां कई दशकों से बसे लोगों के घर ढहा दिए गए हैं और दुकानें भी गिरा दी गईं. वहीं, प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई अदालत के आदेश पर हो रही है.
बिहार सरकार के गृह मामलों के मंत्री सम्राट चौधरी ने इस संदर्भ में विधानसभा में कहा, “बिहार में न्यायालय ने ज़िला प्रशासन को निर्देश दिया है कि सभी जगह अतिक्रमण हटाया जाए. इसके बाद यह कार्रवाई हो रही है. और अगर कोई माफ़िया है तो कार्रवाई होगी ही, चाहे वह ज़मीन, बालू या शराब माफ़िया हो.”
हालांकि बिहार में ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ के तहत जो कार्रवाई चल रही है, उसमें कई दलित बस्तियां भी शामिल हैं जहां कई भूमिहीन परिवार दशकों से रह रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी की टीम नालंदा और दरभंगा की ऐसी दो बस्तियों में गई जहां ‘अतिक्रमण हटाओ अभियान’ के तहत घर तोड़े गए थे. उजाड़े गए कुछ लोगों को वैकल्पिक ज़मीन के पट्टे दिए हैं, लेकिन उससे लोग नाख़ुश हैं.
‘मेरा घर टूट गया और बहन की शादी भी’
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नालंदा के शिवनंदन नगर की छोटी कुमारी का रो-रोकर बुरा हाल है. उनके घर की बैठक को बीते साल 26 नवंबर को प्रशासन के बुलडोज़र ने गिरा दिया था. इसके बाद बाक़ी कमरों में दरारें पड़ गई हैं.
इस ठंड में परिवार के पास सोने के लिए सिर्फ़ एक कमरा बचा है.
छोटी कहती हैं, “प्रशासन ज़बरदस्ती घर में घुस गया था. हम लोग आतंकवादी थे जो हाथ पकड़-पकड़ कर बाहर निकाल रहा था? 6 कमरे टूट गए. मेरे पापा और भैया बनाए थे. बहन की शादी फ़रवरी में होने वाली थी, उसके लिए सारा सामान ख़रीदा गया था. अब इसी वजह से रुक गई. लड़के वालों ने कहा कि आप लोग ग़ैर-मजरूआ ज़मीन (सरकारी ज़मीन) पर रहते हैं, आपका घर नहीं है तो शादी कैसी?”
शिवनंदन नगर में कई दशकों से कई महादलित परिवार कलकैला तालाब के किनारे बसे हुए हैं. इनमें से ज़्यादातर पासवान समुदाय के लोग हैं.
पटना हाईकोर्ट में सीताराम प्रसाद नाम के एक व्यक्ति ने पीआईएल दाख़िल की थी, जिसके मुताबिक़ इन परिवारों ने 20 एकड़ में फैले कलकैला तालाब पर अतिक्रमण कर रखा है. इस तालाब के पानी से कई गांवों के किसानों को खेती के लिए पानी मिलता है.
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पटना हाईकोर्ट ने 2023 में शिवनंदन नगर में बसे लोगों को अतिक्रमणकारी मानते हुए प्रशासन को उन्हें यहां से हटाने का आदेश दिया था.
इलाके़ के अंचलाधिकारी मनोज कुमार प्रसाद बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहते हैं, “प्रशासन ने यहां 100 परिवारों की एक लिस्ट के साथ घर ख़ाली करने का नोटिस लगाया था. अभी ठंड को देखते हुए सिर्फ़ 8 लोगों के घर पर बुलडोज़र चलाया गया है. ये आठ सरकारी लाभ ले रहे थे. यानी उन्हें सरकारी सेवा में रहने के बाद पेंशन मिल रही थी. साल 2025 से पहले भी यहां एक बार अतिक्रमण अभियान चला था जिसमें 14 घर तोड़े गए थे.”
ऐसे ही एक पेंशनर बिहार पुलिस से रिटायर हुए रामविलास पासवान हैं. उनके घर पर बुलडोज़र चला है.
बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में वह कहते हैं, “रिटायर हुए, पेंशन मिली तो इसी से घर बनाया था. हम माफ़िया थे कि हमारा घर तोड़ा गया? हमको मेडल मिला है. हमारी सच्चाई की कोई मान्यता नहीं. रिटायरमेंट के बाद जितना पैसा घर बनाने में लगा है, उतना सरकार पैसा हमें वापस कर दे. मकान तोड़ने से पहले सरकार ने कोई नोटिस भी नहीं दिया.”
सरकारी मदद से बने थे गिराए जाने वाले कई घर
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शिवनंदन नगर में जिन घरों को तोड़ने का नोटिस लगा है, उनमें से कई घरों को इंदिरा आवास योजना के तहत राशि मिली थी. साथ ही कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें साल 2016 में शुरू हुई प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत भी सहायता मिली है.
चिंता देवी और उनके पति ईंट भट्ठा मज़दूर हैं.
वह बताती हैं, “इंदिरा आवास दिया, बिजली दिया, नल दिया. अब सब देकर घर तोड़ा जा रहा है. हमारे साथ सरकार ऐसा क्यों कर रही है? हम लोग भट्ठा पर कमाने वाले लोग हैं. रात को नींद नहीं आती, ऐसा लगता है फिर से बुलडोज़र आ जाएगा.”
राजो देवी का घर खेत से सटा है. वह बताती हैं कि बुलडोज़र खेत के रास्ते आया और घर तोड़ दिया. राजो ने अपने घर के टूटे हुए हिस्से को ईंट से ढक दिया है. वह बताती हैं, “इंदिरा आवास मिला तो क़र्ज़ लेकर घर बनाया. सरकार भी हम ग़रीबों ने ही बनाई है लेकिन सरकार ने ग़रीबों का भला नहीं किया.”
इसमें कई परिवार ऐसे हैं जिन्होंने पहले इंदिरा आवास से मिली सहायता से घर का कुछ हिस्सा पक्का बनवाया और बाद में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिली सहायता राशि से घर का कुछ हिस्सा बनवाया.
कारू पासवान की पत्नी सुनीता देवी का कहना है कि उन्हें भी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 40,000 रुपये की पहली किश्त मिली थी.
प्रधानमंत्री आवास योजना में लाभार्थियों को एक लाख 20 हज़ार रुपये की मदद किश्तों में मिलती है.
कारू पासवान बताते हैं, “सरकार के आदमी आए और खाली खाता और आधार कार्ड लिया. उसके बाद पत्नी के खाते में 40,000 रुपये मिले थे. उससे हमने घर का कुछ हिस्सा बनवाया. बाद में कोई पैसा नहीं मिला. हम लोगों को इसका कोई काग़ज़ भी नहीं मिला और सरकार ने किश्त भी रोक दी. अब तो जो घर बना है, उसी के बचे रहने पर आफ़त है.”
शिवनंदन नगर में पूजा देवी, रेणु देवी सहित कई लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत योजना राशि की पहली किश्त मिली है.
‘रात कंबल ओढ़कर गुज़ारते हैं’
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नालंदा के शिवनंदन नगर की तरह ही दरभंगा के लाल शाहपुर में भी महादलितों की बस्ती पर हाईकोर्ट के आदेश के बाद बुलडोज़र चला है.
यह 200 परिवारों की बस्ती है जो कई दशकों से यहां रहते आए हैं. यहां कई लोगों ने अपने टूटे हुए घरों को पन्नी से ढक रखा है तो कइयों ने टूटी ईंटों से ही दीवारों को ढकने की कोशिश की है. रात गहराते ही इन ईंटों से सर्द हवा अंदर जाती है.
बस्ती में घुसते ही गुस्साई कमलमुखी देवी कहती हैं, “सरकार की मर्ज़ी है तो लोगों को ज़हर खिलाकर मार दे. बात ख़त्म. इतना दुख देना ठीक नहीं है. रात में पन्नी टांगकर गुज़ारा करते हैं. लोग सब कंबल ओढ़कर बैठे रहते हैं. पाला देह पर गिरता है, लगता है कब सुबह होगी. गर्मी तो है नहीं कि सड़क पर सो जाएं. कोई ज़मीन भी नहीं है, हमारे पास कि वहां जाकर बस जाएं.”
उनके पास बैठी सुशीला देवी को इंदिरा आवास का लाभ मिला है.
वह कहती हैं, “हम लोग यहां आज से नहीं हैं. हमारी ददिया सास, अपनी सास यहीं रहती थीं. मेरे बच्चे सब यहीं रहते हैं. खुले में खाना बनाते हैं और रात में चूल्हा बुझाकर पन्नी टांगकर सो जाते हैं. हम लोगों को कोई नोटिस नहीं मिला. एकदम से सरकार का बुलडोज़र आया और घर तोड़ दिया. हम लोग मज़दूर आदमी हैं फिर कैसे बनाएंगे घर?”
बीबीसी ने जब इस संबंध में दरभंगा के ज़िलाधिकारी कौशल कुमार से बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने बातचीत से इनकार करते हुए सिर्फ़ इतना कहा, “यह कार्रवाई न्यायालय के आदेश पर हो रही है.”
‘मेरा नाम बुलडोज़र बाबा नहीं, सम्राट चौधरी है’
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सरकार बनने के बाद विपक्ष इस मुद्दे पर हमलावर है. राजद विधायक कुमार सर्वजीत ने जब इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया, “दलितों और ग़रीबों की बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं और मीडिया वालों ने सम्राट चौधरी को बुलडोज़र बाबा कहना शुरू कर दिया है.”
इसके जवाब में राज्य के गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने कहा, “मेरा नाम बुलडोज़र बाबा नहीं, सम्राट चौधरी है. इतना स्पष्ट जान लीजिए. अतिक्रमण हटाने की यह कार्रवाई न्यायालय के आदेश पर हो रही है. मोदी जी के नेतृत्व में 60 लाख परिवारों को पक्का मकान मिला है.”
हालांकि गृह मंत्री के इस स्पष्टीकरण, टाइमिंग और बुलडोज़र एक्शन के तौर-तरीके़ पर कई सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल खड़े किए हैं.
मानवाधिकार के लिए काम करने वाली संस्था पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने इसकी निंदा की है.
पीयूसीएल बिहार यूनिट के महासचिव सरफ़राज़ बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “यह असंवैधानिक और जन-विरोधी प्रक्रिया है. बदकिस्मती से हमारी सरकारें वेलफे़यर स्टेट से दूर होती जा रही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण हटाने की पूरी मानक प्रक्रिया तय कर रखी है. नोटिस देना, सुनवाई, वैकल्पिक स्थान देना, वीडियो रिकॉर्डिंग, पंच रिपोर्ट बनाना और आदेश में विध्वंस एकमात्र विकल्प क्यों है, यह लिखा जाना चाहिए. लेकिन बिहार में इस मानक प्रक्रिया को कहीं फ़ॉलो नहीं किया गया.”
अखिल भारतीय खेत एवं ग्रामीण मज़दूर सभा (खेग्रामस) इस मुद्दे को लेकर सड़कों पर आंदोलनरत है.
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इसके राष्ट्रीय महासचिव धीरेन्द्र झा बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, “यह अतिक्रमण विरोधी अभियान नहीं है. बल्कि ये दलित ग़रीब उजाड़ो अभियान है. सरकार बिहार में दशकों से बसे ऐसे ग़रीबों को खदेड़कर उसका लैंड बैंक बनाना चाहती है. ताकि इस लैंड बैंक का कॉरपोरेट के हित में इस्तेमाल हो.”
“हम लोग यह मांग करते रहे हैं कि जो जहां बसे हैं उसका भौतिक सर्वेक्षण कराया जाए. इसके बाद जिन परिवारों को आप पर्चा पीपीएच एक्ट के तहत दे सकते हैं, उन परिवारों को पर्चा दीजिए. जिन परिवारों को आप नहीं दे सकते, उन परिवारों का क्लस्टर हर पंचायत में बना दीजिए और फिर उन्हें बसाइए.”
राज्य सरकार, उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए लैंड बैंक बनाना चाहती है और पिछले साल दिसंबर में बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत ने इस संदर्भ में सभी प्रमंडलीय आयुक्तों को पत्र भी लिखा था.
इस बीच बिहार में अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण मंत्री लखेन्द्र कुमार रौशन ने कहा है कि राज्य में जो भी भूमिहीन हैं, उन्हें मुख्यमंत्री समग्र विकास योजना के तहत चिह्नित कर सरकार की ओर से पर्चा वितरित किया जा रहा है.
लेकिन शिवनंदन नगर और लाल शाहपुर में प्रशासन ने उजाड़े गए कुछ लोगों को जो वैकल्पिक ज़मीन के पट्टे दिए हैं, उससे लोग नाख़ुश हैं. दोनों ही जगह स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार जिस जगह ज़मीन दे रही है, वहां बारिश के वक़्त पानी भर जाने का ख़तरा है.
वैकल्पिक ज़मीन से नाख़ुश लोग
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लाल शाहपुर की रेणु देवी कहती हैं, “यहां तो सड़क है. सारे साधन हैं. लेकिन वहां तो कुछ नहीं है, अगर किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो तो कैसे जाएंगे? न दुकान और न बाज़ार-हाट का साधन. सरकार हमें यहीं घर दे दे.”
मोहन पासवान इसमें जोड़ते हैं, “यहां से तीन किलोमीटर दूर चौर है. उसमें कैसे घर बनाकर रहेंगे? बारिश होगी तो तुरंत पानी भर जाएगा.”
शिवनंदन नगर में भी लोगों के बीच इसको लेकर ग़ुस्सा है.
ग़ुस्से में सुलोचना देवी कहती हैं, “नदी में सरकार ज़मीन दे रही है तो क्या हम नदी में जाकर रहेंगे? क्यों दी हमें कॉलोनी (इंदिरा आवास), ग़रीब को उजाड़ने के लिए? सरकार ने पहले बसाया और अब उजाड़ रही है.”
साल 2023 में बिहार में हुए जातिगत सर्वेक्षण के मुताबिक़, राज्य में सिर्फ़ 36 फ़ीसदी परिवारों के पास दो या दो से ज़्यादा कमरों का पक्का मकान है, 22 फ़ीसदी के पास एक कमरे का पक्का मकान, 26 फ़ीसदी टीन छत वाले, 14 फ़ीसदी के पास झोपड़ी और 0.24 प्रतिशत आवासहीन हैं. इस आवासीय स्थिति में भी सबसे ज़्यादा हाशिए पर अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय के लोग हैं.
बिहार पहला राज्य था जहां आज़ादी के बाद बिहार प्रिविलेज पर्सन होमस्टेड टेनेंसी एक्ट (पीपीएच) बनाकर ज़मींदारों की ज़मीन पर बसे मज़दूरों को ज़मीन का अधिकार दिया गया था. बाद में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने भूमि सुधार के लिए साल 2006 में बंदोपाध्याय समिति बनाई थी लेकिन इस समिति की अनुशंसाएं लागू नहीं हुईं.
साल 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने अपने घोषणा पत्र में ग़रीबों के लिए ‘पंचामृत गारंटी’ का वादा किया है, जिनमें 50 लाख नए पक्के मकानों का भी वादा है. लेकिन फ़िलहाल तो प्रशासन की कार्रवाई के बाद कई लोग कड़ाके की सर्दी में पन्नी टांगकर जीने को मजबूर हैं.
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