इमेज स्रोत, Charan Kaur Dhesi/Humber Boxing Network/Insta
इंग्लैंड के हल शहर में एक शांत जिम के दरवाज़े पर 13 साल की एक लड़की अपने छोटे भाई के बॉक्सिंग सेशन के शुरू होने का इंतज़ार कर रही थी.
उसके पास न ही ग्लव्स थे और न इसमें शामिल होने का कोई इरादा था.
आठ साल के बाद चरण कौर ढेसी अब एक प्रोफ़ेशनल बॉक्सर और चर्चित शख़्सियत हैं. 21 साल की उम्र में प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग में उतरने वालीं वह ब्रिटेन की पहली सिख महिला प्रो बॉक्सर हैं. उन्होंने खेल के क्षेत्र और अपने समुदाय में एक नई राह दिखाई है.
उन्होंने बीबीसी स्पोर्ट से कहा, “मैंने इतिहास रचा है और अभी तो बस शुरुआत की है.”
हालांकि, उनकी यह यात्रा आसान नहीं रही है. बॉक्सिंग को एक पुरुष प्रधान खेल माना जाता है.
ऐसे में ब्रिटेन में एक दक्षिण एशियाई महिला होने के नाते ढेसी को शक, सांस्कृतिक विरोध और आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा.
लेकिन हर मुक्के के साथ उन्होंने उनकी क्षमताओं पर शक करने वाले हर शख़्स को अपना समर्थक बना लिया.
वह कहती हैं, “मेरे समुदाय की पहली महिला होने के नाते यह मेरे लिए बहुत दबाव वाला काम था. लेकिन आप क्या कह सकते हैं? हीरा भी तो दबाव में ही निखरता है.”
इंग्लैंड की टीम तक का सफ़र
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दो भाइयों के साथ पली-बढ़ीं ढेसी का परिवार खेलों से प्यार करता था. उनके पिता पढ़ाई से ज़्यादा शारीरिक गतिविधियों को महत्व देते थे.
वह कहती हैं, “मेरे माता-पिता ने कभी मेरी पढ़ाई पर ज़ोर नहीं दिया, जिसे लोग अजीब समझते हैं. वह हमेशा बॉक्सिंग के लिए प्रेरित करते थे.”
ढेसी कहती हैं, “मेरे दो भाई हैं. मेरे पिता ने हम तीनों को ही खेलों में ध्यान देने को कहा.”
लेकिन बॉक्सिंग शुरुआत में उनकी योजना में शामिल नहीं था. ढेसी ने असल में कराटे से ट्रेनिंग शुरू की थी और उन्हें बॉक्सिंग का पता तब चला जब उनके भाई ने एक स्थानीय जिम जॉइन किया.
वह कहती हैं, “मुझे शुरुआत में बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि बॉक्सिंग क्या होती है. यह तो मेरे छोटे भाई की इच्छा थी. मैं उसके साथ जिम गई और बस दरवाज़े पर खड़ी थी, तभी कोच मुझे खेल में शामिल होने के लिए कहने लगे.”
ढेसी ने शुरुआत में उन्हें मना किया, लेकिन बाद में मौक़ा आज़माया और उन्हें कुछ अलग ही महसूस हुआ.
वह कहती हैं, “मैंने एक दिन ट्राई किया और सभी कोच कहने लगे कि मैं कितनी अच्छी हूं. उसी दिन से मैंने इसे जारी रखा. फिर मुझे इंग्लैंड टीम के लिए भी चुना गया.”
पंजाबी और सिख समुदाय को गर्व
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उस दिन से ढेसी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. यूथ अमेचर खिलाड़ी के तौर पर उन्होंने तीन राष्ट्रीय, एक यूरोपियन सिल्वर मेडल और तीन इंटरनेशनल क्राउन्स पुरस्कार जीते.
लेकिन उनके लिए यह केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं था. ढेसी प्रोफ़ेशनल बॉक्सिंग में उतरकर रूढ़ियों को तोड़ना चाहती थीं.
हालांकि, प्रोफ़ेशनल बनने के बाद उन्हें नई चुनौतियों और अपने ही समुदाय की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.
वह कहती हैं, “मुझसे पूछा गया, ‘अगर तुम्हें चोट लग गई तो तुमसे कौन शादी करेगा?’ ‘क्या तुम्हें किचन में नहीं रहना चाहिए’. इस तरह की बातें काफ़ी नकारात्मक थीं. यहां तक कि यह सवाल भी किया गया, ‘तुम्हारा प्लान बी क्या है?'”
वह कहती हैं, “लेकिन मेरा प्लान ए बॉक्सिंग है और मेरा प्लान बी भी बॉक्सिंग ही है.”
मई में ढेसी ने इन सवालों का जवाब अपने मुक्कों से दिया जब अपने पहले ही प्रोफ़ेशनल मुक़ाबले में उन्होंने नॉकआउट से जीत हासिल की. इसके बाद यह क्लिप और उनकी कहानी वायरल हो गई.
वह कहती हैं, “अचानक वही लोग, जो मेरी क्षमता पर शक कर रहे थे, मेरी तारीफ़ करने लगे कि मैंने पंजाबी और सिख समुदाय को गौरवान्वित किया है.”
“ये वही लोग हैं जो तब साथ नहीं होते जब आप मेहनत कर रहे होते हैं. लेकिन अब वही सीधे मेरे पास आ रहे हैं. उन्हें एहसास हो गया है कि मैंने रिंग में शानदार प्रदर्शन किया है और यह मज़ाक नहीं है. बॉक्सिंग ही मेरी ज़िंदगी है.”
अब भी हैं चुनौतियां
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ढेसी की कामयाबी भले ही सुर्ख़ियों में रही हों, लेकिन उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी अब भी संघर्ष से भरी है. स्पॉन्सरशिप न होने की वजह से उनके पूरे करियर का ख़र्च अब भी उनके माता-पिता उठा रहे हैं.
वह कहती हैं, “मैं काम नहीं करती क्योंकि मेरा पूरा ध्यान ट्रेनिंग पर है. इसलिए यह मुश्किल है. मेरे ट्रेनिंग और बेहतर किट के कई मौक़े चूक रहे हैं और मैं उतना बाहर नहीं जा पा रही हूं जितना जाना चाहिए.”
लेकिन उनके लिए बॉक्सिंग कभी सिर्फ़ बेल्ट या इनामी रक़म तक सीमित नहीं रही. बल्कि यह अपनी जड़ों पर गर्व दिखाने और दूसरों के लिए रास्ता खोलने का एक ज़रिया रही है.
वह कहती हैं, “कई सिख लड़कियां बॉक्सिंग में आना चाहती हैं. कई बार इवेंट्स में वे मुझसे मिलती हैं और पूछती हैं कि डर को कैसे दूर किया जाए. तब मैं कहती हूं, ‘सुनो लड़कियों, मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊंगी और पूरा सहयोग दूंगी’.”
“सच में, अगर कोई लड़की मुझसे मदद मांगे, चाहे वह लंदन में हो या कहीं और, मैं वहां जाऊंगी. यही मेरी चाहत है. मैं चाहती हूं कि ज़्यादा से ज़्यादा सिख लड़कियां बॉक्सिंग में आएं, और सिख लड़के भी.”
एक दिन वह मिडलैंड्स में अपना ख़ुद का जिम खोलने का सपना देखती हैं, जहां खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दी जा सके.
अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए चाहे जो रिंग के अंदर हों या बाहर उनके लिए उनका संदेश साफ़ है.
वह कहती हैं, “बस इसे कर ही डालो. आप जो चाहें, कर सकते हैं. जब तक आप ख़ुद पर विश्वास रखते हैं, वही सबसे अहम है. दूसरे क्या सोचते हैं इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.