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ब्लेंडेड विंग्स एयरोप्लेन का आइडिया नया नहीं है, यानी एक ऐसा जहाज़ जिसका धड़ (मध्य भाग) और जिसके डैने (विंग्स) अलग-अलग रहने के बजाए एक ही सांचे में मिले हुए हों.
लेकिन इस क्रांतिकारी डिज़ाइन को यात्री विमानों में इस्तेमाल करने की सोच अब सच में बदलने के क़रीब है.
मार्च 2025 में अमेरिका में इस तरह के एक छोटे रिमोट कंट्रोल जहाज़ ने पहली बार उड़ान भरी. उस जहाज़ का नाम ‘स्टीव’ रखा गया था.
यह बिना पायलट वाला रिमोट कंट्रोल जहाज़ केवल 16 सेकंड तक हवा में रह सका. लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह बात महत्वपूर्ण नहीं थी कि उसकी उड़ान केवल 16 सेकंड की थी.
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इस छोटी टेस्ट फ़्लाइट को इस सिलसिले की शुरुआती कड़ी बताया जा रहा है जिसके बारे में इस डिज़ाइन की आविष्कारक कंपनी ‘आउटबाउंड एयरोस्पेस’ को उम्मीद है कि यह 2030 के दशक में ब्लेंडेड विंग्स वाला एक क्रांतिकारी जहाज़ बना पाएगी जिसमें 200 से 300 लोग उड़ान भर सकेंगे.
इस जहाज़ को ‘ओलंपिक’ नाम दिया जा चुका है जिसके डैनों का फैलाव 171 फ़ीट (52 मीटर) होगा.
हवाई जहाज़ के डैनों और धड़ को आपस में जोड़कर उड़ान के दौरान हवा का प्रतिरोध कम करने का विचार 100 साल से भी ज़्यादा पुराना है.
साल 1942 में दुनिया का पहला ब्लेंडेड विंग्स वाला जहाज़ बनाया गया था जो अपनी पहली उड़ान के बाद गिरकर नष्ट हो गया था.
इसके बाद यह टेक्नोलॉजी अधिकतर अमेरिकी सेना के बमवर्षक विमानों तक सीमित रही. लेकिन अब एविएशन इंडस्ट्री को कार्बन उत्सर्जन कम करने की जल्द ज़रूरत है जिससे लगता है कि ब्लेंडेड यात्री विमान को बाज़ार में लाने का वक़्त आ गया है.
मगर क्या ‘आउटबाउंड एयरोस्पेस’ जैसी नई कंपनियां इस डिज़ाइन को व्यावहारिक रूप देने में आने वाली चुनौतियों को हल कर पाएंगी?
‘स्टीव’ की उड़ान का मक़सद यह साबित करना है कि यह कंपनी अपने नए डिज़ाइन और आधुनिक मैन्युफ़ैक्चरिंग टेक्नोलॉजी की मदद से मध्यम आकार के यात्री विमान ‘एयरबस’ और ‘बोइंग’ जैसे जहाज़ बनाने वाली पारंपरिक कंपनियों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी और कम लागत से तैयार कर सकती है.
आउटबाउंड एयरोस्पेस का क्या कहना है?
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बोइंग के पूर्व इंजीनियर और ‘आउटबाउंड एयरोस्पेस’ के सह संस्थापक और चीफ़ टेक्नोलॉजी ऑफ़िसर जैक आर्मेंटा कहते हैं कि उनकी कंपनी ने केवल 12 महीने में एक नए आइडिया को अपनाकर इसका व्यावहारिक रूप दिखाने वाला जहाज़ बनाने तक का सफ़र तय किया है.
उन्होंने बताया, “इस नई तरह के जहाज़ को बनाने के लिए जब हमने फ़ैक्टरी का दरवाज़ा खोला तो उसके ठीक नौ महीने बाद उसने पहली बार उड़ान भरी है.”
अब इस नई टेक्नोलॉजी से बना जहाज़ एक कार्गो ड्रोन की तरह नई भूमिका अदा कर रहा है.
उन्होंने कहा, “अमेरिकी रक्षा विभाग और दूसरे नागरिक विमानन संस्थान ‘स्टीव’ में दिलचस्पी ले रहे हैं क्योंकि इसमें बड़ा कार्गो कंपार्टमेंट है और यह पारंपरिक डिज़ाइनों से सस्ता साबित हो सकता है. इसलिए यह हमारा पहला कमर्शियल प्रोडक्ट बनने जा रहा है.”
‘आउटबाउंड’ कंपनी के बिज़नेस डेवलपमेंट डायरेक्टर एरॉन बोइसिन कहते हैं, “हम समझते हैं कि हम जहाज़ बनाने के लिए ज़रूरी वक़्त और लागत में बड़ी हद तक कमी ला सकते हैं लेकिन यह प्रोजेक्ट अभी महंगा है. हमें दस साल इंतज़ार करने के बजाय जल्द से जल्द इसे आमदनी हासिल करने के लायक़ बनाना होगा.”
हालांकि निवेशक उनके प्रोजेक्ट की कामयाबी के बारे में ऊहापोह के शिकार हैं लेकिन ‘आउटबाउंड’ कंपनी को अब तक लगभग दस लाख डॉलर का शुरुआती पूंजी निवेश मिल चुका है. यह वह पहली पूंजी होती है जो किसी नई कंपनी को अपने आइडिया को हक़ीक़त में बदलने के लिए दी जाती है.
इससे उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए पांच स्थाई कर्मचारी और कुछ अस्थाई स्टाफ़र की भर्ती करने में मदद मिली है.
इस दौड़ में शामिल हैं और कंपनियां
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‘आउटबाउंड’ कंपनी इस तरह के जहाज़ बनाने की दौड़ में अकेले नहीं है. कम से कम दो और नई कंपनियां भी पहले से ब्लेंडेड विंग्स वाला यात्री विमान बनाने की दौड़ में शामिल हैं.
विश्लेषक बिल स्वीटमैन के अनुसार यह एक ऐसा लक्ष्य है जो लंबे समय से बस सपना ही समझा जाता रहा है.
2030 के दशक में जिस ‘ओलंपिक’ जहाज़ को बनाने की तैयारी है, उसका संभावित ढांचा अभी एयरबस और बोइंग के पारंपरिक ट्यूब और विंग वाले जहाज़ से बिल्कुल अलग दिखाई देता है. इन जहाज़ों को कई बार ‘फ़्लाइंग विंग्स’ कहा जाता है और यह पारंपरिक जहाज़ों की तुलना में ज़्यादा प्रभावी ढंग से एयरोडायनेमिक्स या हवा से अनुकूलता देते हैं.
अगर कोई कंपनी सही ब्लेंडेड पंखों वाला डिज़ाइन तैयार कर ले तो ‘नासा’ के शोध के अनुसार ऐसा जहाज़ 50 फ़ीसद तक कम ईंधन इस्तेमाल करेगा और इसी हद तक कार्बन उत्सर्जन में कमी ला सकता है. इसके अलावा यह शोर कम कर सकता है और 40 फ़ीसद अधिक फैला हुआ केबिन दे सकता है.
‘नासा’ का यह भी कहना है कि इससे नए एयर रूट्स भी बन सकते हैं. हालांकि खिड़कियों के पास वाली सीटें कम होंगी लेकिन कुछ और बड़े दरवाज़े लगाए जा सकते हैं जो यात्रियों की लाइन को कम करेंगे और फ़र्स्ट क्लास, बिज़नेस और इकोनॉमी के लिए अलग केबिन भी बनाए जा सकेंगे.
इस क्रांतिकारी सोच के समर्थकों के बड़े सपने हैं. वह उम्मीद करते हैं कि ‘आउटबाउंड’, ‘जेट ज़ीरो’ और ‘नाउटिलस’ जैसी कंपनियां हवाई यात्रा के क्षेत्र में ‘एयरबस’ और ‘बोइंग’ के वर्चस्व को तोड़कर नए डिज़ाइन लाएंगी क्योंकि इन दोनों बड़ी कंपनियों के एकाधिकार को उड्डयन उद्योग में नए प्रयोग करने की राह में रुकावट समझा जाता है.
कैलिफ़ोर्निया के लॉन्ग बीच की जेट ज़ीरो कंपनी इस दौड़ में शामिल सबसे प्रमुख कंपनियों में गिनी जाती है. इसे अमेरिकी वायुसेना की तरफ़ से 235 मिलियन डॉलर की फ़ंडिंग मिली है जबकि यूनाइटेड एयरलाइंस और अलास्का एयरलाइंस ने भी अपने ज़ेड 4 जहाज़ की तैयारी के लिए पूंजी निवेश किया है.
इसके अलावा यूनाइटेड एयरलाइंस ने एक समझौता किया है जिसके तहत अगर एयरलाइंस की ज़रूरतों को पूरा करे तो वह ज़ेड 4 जहाज़ की 200 यूनिट तक ख़रीद सकती है.
जेट ज़ीरो ने ज़ेड 4 की तैयारी के लिए बीएई और नॉर्थ्रोप ग्रूमन जैसी मशहूर विमानन कंपनियों और प्रैट ऐंड व्हिटनी जैसी इंजन बनाने वाली कंपनी के साथ साझेदारी की है. कंपनी पहले ही अपना छोटे पैमाने का ‘पाथ फ़ाइंडर-1’ जहाज़ उड़ा चुकी है और क्रिटिकल डिज़ाइन रिव्यू पूरी कर चुकी है जो यह जांचने की एक प्रक्रिया है कि क्या डिज़ाइन व्यावहारिक काम के लिए तैयार है.
जून 2025 में पेरिस एयरशो से ठीक पहले जेट ज़ीरो ने ऐलान किया था कि उसने ज़ेड 4 जहाज़ की तैयारी के लिए अपनी फ़ैक्ट्री की जगह चुन ली है. यह फैक्ट्री नॉर्थ कैरोलाइना के शहर ग्रीन्सबोरो में होगी. यह बिल्कुल उस फ़ैक्ट्री के पास होगी जहां एक और नई एविएशन कंपनी ‘बूम’ अपना सुपरसोनिक यात्री विमान बना रही है जिसे यूनाइटेड एयरलाइंस ख़रीदने का इरादा रखती है.
जेट ज़ीरो का प्रोजेक्ट यह है कि सन 2027 तक पूरे साइज़ के जहाज़ की टेस्ट फ़्लाइट शुरू कर दी जाए.
क्या अन्य कंपनियों से चिंतित है आउटबाउंड
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आउटबाउंड एयरोस्पेस के एरॉन बोइसिन अपने प्रतिद्वंद्वियों की तेज़ लगने वाली प्रगति से परेशान नहीं हैं.
वह कहते हैं, “जेट ज़ीरो का प्रचार और उसे मिले शुरुआती ऑर्डर हम सभी के लिए फ़ायदेमंद हैं क्योंकि इससे ब्लेंडेड डैनों वाले जहाज़ों पर एयरलाइंस और उद्योग में बात होने लगी है. इसका मतलब यह भी है कि वह सर्टिफ़िकेशन और प्रचार-प्रसार के दो बड़े ख़र्च पहले बर्दाश्त करेंगे और हमें यह बोझ कुछ हद तक कम उठाना पड़ेगा.”
जहाज़ों के डिज़ाइनर ब्लेंडेड डैनों वाले जहाज़ बनाने का सपना हवाई जहाज़ बनने के शुरुआती दिनों से देखते आए हैं.
विश्लेषक बिल स्वीटमैन का कहना है कि इस वक़्त उसमें बहुत दिलचस्पी पाई जा रही है क्योंकि निवेशक और टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञ पुराने उद्योगों को बदलने की दौड़ में शामिल हैं और अब उनका अगला लक्ष्य एविएशन है.
उनके अनुसार आधुनिक मटीरियल्स, कंप्यूटर पर आधारित डिज़ाइन (सीएडी) और थ्रीडी एयरोडायनेमिक्स ने इस नई दिलचस्पी को बढ़ावा दिया है.
वह कहते हैं, “कई लोग चाहते हैं कि एयरबस और बोइंग के सामने कोई नई कंपनी उभरे, लेकिन असली समस्या यह है कि ऐसे जहाज़ों की तैयारी पर आने वाली लागत बहुत अधिक है और एक नई व्यावसायिक हवाई जहाज़ कंपनी शुरू करना बहुत बड़ा काम है.”
हालांकि उन्हें इन प्रोजेक्ट्स में एयरलाइंस के समर्थन के असली असर के बारे में शक है, चाहे अब तक की फ़ंडिंग कितनी ही ज़्यादा क्यों न हो.
स्वीटमैन का कहना है, “एयरलाइंस इस वक़्त जितना पैसा लगा रही हैं, वह उनके लिए सोफ़े के पीछे गिरे सिक्के उठाने जैसा है. उनके ऑर्डर केवल तभी कारगर होंगे जब यह नई कंपनियां ज़रूरी शर्तें पूरी करें. यह ज़्यादातर उनके प्रचार का असर है. यानी वह दिखा रही हैं कि वह भविष्य के लिए पर्यावरण-अनुकूल सोच रखती हैं.”
उसके बावजूद वह मानते हैं कि छोटे पैमाने के डेमॉन्स्ट्रेटर जहाज़ से शुरू करके पूरी साइज़ के डेमॉन्स्ट्रेटर तक जाना एक अच्छा क़दम है.
उनका कहना है कि यह “नए डिज़ाइन में भरोसा पैदा करेगा, लेकिन आप इतने कम टेस्ट्स के साथ प्रोडक्शन लाइन शुरू नहीं कर सकते.”
कब उड़ा था दुनिया का पहला ब्लेंडेड विंग्स जहाज़
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दुनिया का पहला ब्लेंडेड विंग्स जहाज़, जो 1924 में उड़ा था, उसका नाम ‘वेस्टलैंड ड्रेडनॉट’ था.
यह रूसी आविष्कारक निकोलस वोयवोडस्की के आधुनिक विचारों पर आधारित आठ सीटों वाला विमान था, जो अपनी पहली उड़ान में असंतुलन और नियंत्रण खोने के कारण गिरकर नष्ट हो गया था. इस कोशिश में पायलट गंभीर रूप से घायल हुआ और इस प्रोजेक्ट को छोड़ दिया गया था.
इसके बाद से ब्लेंडेड पंखों वाले डिज़ाइन की पेचीदगी की वजह से यह फ़ॉर्मेट ज़्यादातर सैन्य विमानों तक सीमित रहा. इस संदर्भ में रॉकवेल बी1-बी लांसर और नॉर्थ्रॉप का नया बी-21 रेडर का नाम लिया जा सकता है.
स्वीटमैन के अनुसार, “ब्लेंडेड जहाज़ों का बहुत सटीक डिज़ाइन बनाना मुश्किल है क्योंकि उनके आसपास हवा के बहाव का पैटर्न बहुत पेचीदा होता है. लेकिन बॉम्बर जहाज़ों के लिए यह कुछ आसान होता है, क्योंकि उनमें दबाव वाले बड़े केबिन नहीं होते. यही बात एयर रिफ़्यूलिंग टैंकरों के लिए लागू होती है.”
पिछले 30 वर्षों में नासा, बोइंग, एयरबस, चीनी विमान निर्माता कंपनी कोमैक और कनेडियन बिज़नेस जेट निर्माता ‘बॉम्बार्डियर’ ने भी ऐसे जहाज़ों के डिज़ाइन पर शोध किया है.
इन टीमों ने आमतौर पर ‘स्टीव’ जैसे छोटे टेस्ट प्लेन बनाकर हवा की सुरंगों (विंड टनल्स) में उनका परीक्षण किया और फिर व्यावहारिक उड़ानें भरीं.
अभी के डिज़ाइनों के ज़्यादातर सुझाव 1988 में नासा की ओर से जारी उस आमंत्रण से आए जिसमें क्रांतिकारी विमानों के विचार मांगे गए थे.
जवाब देने वाली एक टीम में रॉबर्ट ली बेक भी शामिल थे, जो बाद में बोइंग के ब्लेंडेड विंग प्रोग्राम्स के सह-आविष्कारक और प्रोजेक्ट मैनेजर बने. उनकी टीम के काम ने एक आधुनिक विचार वाले विमान को जन्म दिया, जिसे बाद में रिमोट कंट्रोल मॉडल ‘बोइंग/नासा-एक्स’ के नाम से बनाया गया.
इसे सन 2007 में टाइम मैगज़ीन ने साल के सबसे अच्छे आविष्कारों में शामिल किया. हालांकि एक्स-48 साइज़ में छोटा था, लेकिन इसे एक फ़ुल साइज़ के जहाज़ की तरह उड़ने के लिए डिज़ाइन किया गया था.
दो एक्स-48 जहाज़ों ने छह साल के दौरान 120 उड़ानों का एक असाधारण सिलसिला पूरा किया. इन उड़ानों में यह जांचा गया कि ऐसे विमान इंजन बंद होने या रुक जाने की स्थिति में कैसे रहते हैं. साथ ही ईंधन की खपत और शोर में कमी के नए तरीक़े भी आज़माए गए.
हालांकि एक्स-48 ने जिस क्रांति का वादा किया था, वह अभी तक सच नहीं हो सकी है.
नासा के एक्स-48 ने आगे की राह आसान बनाई
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बिल स्वीटमैन कहते हैं, “उस ज़माने में बॉब ली बेक ब्लेंडेड पंखों वाले विमानों की व्यावहारिक समस्याओं को हल करने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे थे. शायद उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इन विमानों में दबाव सहने वाला यात्रियों का केबिन कैसे बनाया जाए.”
वह अपनी बात समझाते हुए कहते हैं, “दबाव सहने वाले ढांचे आमतौर पर गोल होते हैं, क्योंकि सपाट सतहें अधिक दबाव में टूट-फूट का शिकार हो जाती हैं. इससे अगर डिज़ाइन अधिक ‘डिब्बानुमा’ हो तो संरचनात्मक जटिलताएं बढ़ जाती हैं. फिर इसमें आरामदेह और बड़े से केबिन का डिज़ाइन शामिल करना एक और मुश्किल काम था.”
जब मैकडॉनेल डग्लस को बोइंग ने ख़रीद लिया तो ली बेक ने यह सोचना शुरू किया कि बोइंग का अगला नया जहाज़ 787 के बजाय एक ब्लेंडेड पंखों वाला डिज़ाइन होना चाहिए. लेकिन फिर सिएटल से एक ‘शोध की लहर’ उठी जिसके बाद इस विचार को छोड़ दिया गया.
आउटबाउंड का ‘स्टीव’ जानबूझकर एक्स-48 के बराबर आकार और अनुपात में बनाया गया है.
बोइसिन कहते हैं कि एक्स-48 प्रोग्राम ने यह साबित कर दिया था कि आधुनिक फ़्लाइट कंट्रोल सिस्टम ब्लेंडेड पंखों वाले डिज़ाइन को प्रभावी ढंग से संभाल सकते हैं. हालांकि यह अब भी बनाने में महंगा था क्योंकि डिज़ाइन की पेचीदगी बहुत ज़्यादा थी.
आर्मेंटा का कहना है, “हमने ‘स्टीव’ को बनाया और उड़ाया, जो कि एक्स-48 के बराबर क्षमता रखता है, लेकिन इस प्रोग्राम के बजट के एक हिस्से में, और केवल नौ महीनों में.”
वह यह मानते हैं कि जब ‘आउटबाउंड’ के क्रांतिकारी प्रोजेक्ट को निवेशकों के सामने पेश करते हैं तो कभी-कभी वह अपने ऊपर हमला महसूस करते हैं. लेकिन बोइसिन कहते हैं कि उनकी टीम ‘दिल से यक़ीन रखती है’ कि यह एक क्रांतिकारी नया जहाज़ है. वह कहते हैं कि ‘ओलंपिक’ जैसे जहाज़ को कामयाबी से तैयार करने और पेश करने का अकेला तरीक़ा यह है कि वह बोइंग 2.0 या एयरबस 2.0 न बनें.
वह कहते हैं, “हम अभी की व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं. हमने तय किया है कि कामयाबी के साथ पूरी तरह से नया जहाज़ बनाने के लिए हम यह देखेंगे कि हम किन चीज़ों को आउटसोर्स करते हैं और किन्हें कंपनी के अंदर तैयार करते हैं.”
इसी मक़सद के लिए उन्होंने आधुनिक थ्रीडी प्रिंटिंग का इस्तेमाल किया ताकि अपने पुर्ज़े ख़ुद तैयार कर सकें और यह साबित कर सकें कि वह कार्बन फ़ाइबर से एक उड़ने योग्य डेमॉन्स्ट्रेटर विमान ‘किसी भी दूसरे से कहीं कम लागत में’ बना सकते हैं.
स्वीटमैन कहते हैं, “मेरा ख़्याल है कि यह क़ाबिल-ए-तारीफ़ और ईमानदार कोशिशें हैं. लेकिन मैं इनमें एक तरह का हवा महल बनाने जैसा जज़्बा देखता हूं”
वह कहते हैं कि आप ज़रूर आशावादी हो सकते हैं, लेकिन “सच्चाई यह है कि आपको रुकावटें देखनी होंगी, यह हिसाब लगाना होगा कि ऐसा जहाज़ बनाने के लिए कितनी पूंजी की ज़रूरत होगी जिससे किसी एयरलाइन को पेश किया जा सके. यह भी बताना होगा कि इसे कैसे तैयार करना है और वह कैसे मुनाफ़े के साथ बेचा जाए.”
अब आउटबाउंड एयरोस्पेस ‘स्टीव’ को ‘गेट वे’ ड्रोन में बदलने पर काम कर रही है ताकि वह इसे बेचकर कुछ आमदनी हासिल कर सके.
इसके बाद उनके प्रोजेक्ट में एक दोगुने पंखों वाला बेहतर मॉडल, एक लंबी दूरी का बिज़नेस जेट ‘ओलंपिक’ और फिर 2040 के दशक तक एक इससे भी बड़ा यात्री विमान बनाना शामिल है. लेकिन इस मंज़िल तक पहुंचने से पहले अनगिनत चुनौतियां सामने होंगी.
बोइसिन के अनुसार, “सिएटल में एयरोस्पेस इंजीनियरों, मैनेजरों और विशेषज्ञों की एक बड़ी संख्या मौजूद है जो सच कहूं तो वे सब किसी नई चीज़ के लिए बेताब हैं और यही वजह है कि हम यहां तक पहुंचे हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.