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भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम ट्रेड डील में भारत की ओर से कई खाद्य और कृषि उत्पादों पर टैरिफ़ ख़त्म करने की ख़बर के बीच किसान संगठनों ने विरोध दर्ज कराया है.
किसान संगठनों के मंच संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने इस ट्रेड डील को भारत सरकार का ‘पूर्ण आत्मसमर्पण’ करार देते हुए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के ‘तत्काल इस्तीफ़े’ की मांग की है.
उधर, ट्रेड डील की सहमति को लेकर जारी संयुक्त बयान साझा करते हुए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने एक्स पर लिखा कि ‘संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों में’ भारतीय किसानों के हितों की रक्षा की गई है.
जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार को कहा कि ‘हमारे लिए किसान सर्वोपरि है. आदरणीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में किसान हित सुरक्षित रखे गए हैं.’
विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने सरकार पर इस ट्रेड डील के ज़रिए लोगों से ‘विश्वासघात’ करने के आरोप लगाए हैं.
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि ‘ट्रंप की इस ट्रेड डील से भारत अमेरिका का डंपिंग ग्राउंड बन गया है.’

पवन खेड़ा ने कहा, “इस ट्रेड डील के अनुसार 5 साल में हमें 500 अरब डॉलर का आयात अमेरिका से करना है. यानि भारत को अपना आयात 3 गुना बढ़ाना पड़ेगा. हमें हर साल अमेरिका से 40-42 अरब डॉलर के आयत को 100 अरब डॉलर करना होगा. सवाल है कि हम अमेरिका से क्या सामान ख़रीदेंगे, इसका जवाब पीयूष गोयल के पास नहीं है.”
विपक्ष के आरोप पर कृषि मंत्री ने क्या कहा?
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पीयूष गोयल ने एक्स पर जारी बयान में स्पष्ट किया, “मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, दूध, पनीर, इथेनॉल (ईंधन), तंबाकू, कुछ सब्जियां, मांस आदि समेत संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों की पूरी तरह सुरक्षा की गई है.”
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डेयरी और कृषि उत्पादों की लंबी सूची गिनाई है जिन्हें इस डील में सुरक्षा प्रदान की गई है.
चौहान ने कहा, “पीएम मोदी ने कहा था कि वह देश को झुकने नहीं देंगे और किसानों के हितों को कोई नुक़सान नहीं होने देंगे. इस व्यापार समझौते में इन दोनों बातों का ध्यान रखा गया है…”
उन्होंने कहा, “अगर हम कृषि और कृषि उत्पादों को देखें, तो भारतीय किसानों को नुक़सान पहुंचाने वाला कोई भी उत्पाद शामिल नहीं किया गया है. ऐसे सभी उत्पादों को व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है.”

शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, अनाज, पोल्ट्री, डेयरी, केले, स्ट्रॉबेरी, चेरी, सिटरस फ़्रूट्स, हरी मटर, काबुली चना, मूंग, तिलहन, इथेनॉल, तंबाकू जैसे उत्पादों पर कोई टैरिफ में छूट नहीं दी गई है…हमारी मुख्य फसलों, फलों और डेयरी उत्पादन के लिए अमेरिका के लिए कोई द्वार नहीं खोला गया है.”
“भारत में कोई भी लिक्विड, पाउडर, क्रीम, दही, छाछ, मक्खन, घी, बटर ऑयल, पनीर या चीज़ आयात नहीं किया जाएगा…हमारे मसाले सुरक्षित हैं. भारत से कई कृषि उत्पाद अमेरिका को ज़ीरो ड्यूटी पर निर्यात किए जाएंगे. लेकिन अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाज़ार में यह छूट नहीं दी गई है.”
उन्होंने दावा किया कि ‘अमेरिका ने कई कृषि उत्पादों पर टैरिफ 50% से घटाकर 0% कर दिया है, जिनमें मसाले, चाय, कॉफ़ी, नारियल, सुपारी, काजू, एवकाडो, केला, आम, कीवी, पपीता, अनानास जैसे उत्पाद शामिल हैं.’
एक्सपर्ट का क्या है कहना
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अमेरिका भारत ट्रेड डील की शर्तों को लेकर कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का मानना है कि अमेरिकी कृषि उत्पादों को पहली बार भारतीय बाज़ार में वो जगह मिलेगी, जो अब तक नहीं मिल पाई थी.
बीबीसी न्यूज़ हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि ‘जगजीवन राम जब कृषि मंत्री थे तब अमेरिकी कृषि उत्पाद की लॉबी का दबाव था कि भारत बाज़ार खोले. दशकों तक डब्ल्यूटीओ में भी भारत पर दबाव रहा है कि वो अपना कृषि बाज़ार खोले.’
वो कहते हैं, “अभी तक भारत ने किसानों के हितों का बचाव किया है, ये बात सही है लेकिन ये समझ नहीं आता कि अमेरिकी कृषि मंत्री ने क्यों कहा कि इस समझौते से दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार खुल गया है और अमेरिकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इससे नकदी बढ़ेगी.”
हालांकि पहले से ही माना जा रहा था कि भारत को ट्रेड वार्ता में अमेरिका को कुछ तो रियायतें देनी पड़ेंगी. बीते कुछ महीनों में भारत सरकार ने कुछ ऐसे क़दम उठाए भी जैसे कपास के आयात पर टैरिफ़ को घटना आदि.
लेकिन देवेंद्र शर्मा का कहना है, “अंतरिम समझौते के ढांचे पर जो सहमति बनी है उसमें भारत अगले पांच साल में 500 अरब डॉलर का आयात ख़रीदेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका को भारत के साथ व्यापार घाटा हो रहा है. इसमें भारत की क्या ग़लती है?”
भारत और अमेरिका के बीच कृषि व्यापार आठ अरब डॉलर का है, जिसमें भारत चावल, झींगा और मसाले निर्यात करता है और अमेरिका मेवे, सेब और दालें भेजता है.
अमेरिकी कृषि मंत्री ब्रुक रोलिंस का कहना है कि भारत के साथ अमेरिकी कृषि व्यापार घाटा 1.3 अरब डॉलर का है और इस ट्रेड डील से यह घाटा कम होने की उम्मीद है.’
अमेरिका पहले से ही भारत के साथ अपने 45 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने के लिए मक्का, सोयाबीन और कपास के बड़े कृषि निर्यात के लिए दरवाज़े खोले जाने की मांग करता रहा है.
देवेंद्र शर्मा इस डील पर आपत्ति जताते हैं, “ये रेसिप्रोकल टैरिफ़ कैसे है, एक तरफ़ शून्य प्रतिशत है और दूसरी तरफ़ 18 प्रतिशत है.”
वो कहते हैं, “अमेरिकी सरकार अपने यहां सालाना प्रति किसान औसतन 64,000 डॉलर (लगभग 60 लाख रुपये) की सब्सिडी देती है. जबकि भारत में प्रति किसान ये सब्सिडी 64 डॉलर के आस पास है.”
कपास का उदाहरण
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देवेंद्र शर्मा कपास का उदाहरण देकर बताते हैं कि कैसे भारत और अमेरिकी किसानों के बीच की प्रतिद्वंद्विता में कहीं लेवल प्लेइंग फ़ील्ड नहीं है.
वो कहते हैं, “अमेरिका में कपास उत्पादक किसान आठ हज़ार हैं, जबकि भारत में 98 लाख कपास उत्पादक किसान हैं. अमेरिका में कपास के खेतों का आकार औसतन 600 हेक्टेयर है. हमारे यहां एक से तीन एकड़ है.”
“अमेरिका अपने कपास किसानों को हर साल एक लाख डॉलर (क़रीब 90 लाख रुपये) की सब्सिडी देता है. हमारे यहां कपास किसान को मात्र 27 डॉलर की सब्सिडी मिलती है.”
उन्होंने कहा, “बीते अक्तूबर, नवंबर, दिसंबर में भारत ने अमेरिका से कपास के आयात पर शुल्क को 11 प्रतिशत से शून्य कर दिया. इन तीन महीने में कपास की 30 लाख बेल्स (गांठ) आयात की गई, जोकि ज़रूरत से कहीं अधिक है.”
वो कहते हैं, “आपूर्ति अधिक होने से भारतीय कपास उत्पादक किसानों को 1000 से 1500 रुपये कम दाम मिले. ये सिर्फ तीन महीने की बात है. आगे क्या होगा इससे अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है.”
किसान संगठनों की दलील
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बयान के अनुसार, “डेयरी उत्पाद पहले ही यूके, न्यूज़ीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौतों का हिस्सा हैं और सार्वजनिक हुई ताजा जानकारी ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिया है कि वाणिज्य मंत्री जानबूझकर झूठ बोल रहे हैं.”
एसकेएम की दलीलः-
- मक्का को ड्राइड डिस्टिल्ड ग्रेन (डीडीजी) के रूप में और ज्वार के साथ पशु आहार के तौर पर बेचा जाएगा. इससे पशु आहार बाज़ार पर अमेरिकी कंपनियों का एकाधिकार हो जाएगा.
- अमेरिका पहले से ही मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलें भारत को निर्यात कर रहा है.
- अमेरिकी गेहूं 18.50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से निर्यात हो रहा है, अगर इसे भारतीय बाज़ारों के लिए खोला गया तो भारतीय किसान तबाह हो जाएंगे.
- जीएम खाद्य पदार्थों और जीएम बीजों के आयात को खुली छूट मिलने से प्राकृतिक उर्वरता नष्ट होगी और अनाज, दलहन और तिलहन को भी नुक़सान पहुंचाएगी.
- सोयाबीन तेल आयात के निशाने पर है. एथनॉल का भी मुक्त आयात होगा.
- अमेरिका 18% शुल्क और भारत शून्य शुल्क लगा रहा है यह मुक्त व्यापार नहीं है. भारत पर 2023-24 में टैरिफ़ शून्य से 3% और फिर 18% हो गया है, जबकि अमेरिकी कृषि उत्पादों पर हमारे शुल्क जो 30% से 150% तक थे, अब शून्य कर दिए गए हैं. इससे भारतीय कृषि बाज़ार अमेरिकी मल्टीनेशनल कंपनियों के फंदे में फंस जाएगा.
एसकेएम ने प्रधानमंत्री से भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर न करने की मांग की है और ऐसा न करने पर देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की चेतावनी दी है.
मंच ने आगामी 12 फ़रवरी को ट्रेड यूनियनों की ओर से बुलाई गई आम हड़ताल में शामिल होने का आह्वान किया है.