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भारत और पाकिस्तान की तरफ़ से लड़ने वाले दो सगे भाइयों की कहानी – विवेचना

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Feb 22, 2026


साहिबज़ादा यूनुस ख़ाँ (बाएं) और साहिबज़ादा याक़ूब ख़ाँ (दाएं)

इमेज स्रोत, Saman Ali Khan

इमेज कैप्शन, साहिबज़ादा यूनुस ख़ाँ (बाएं) और साहिबज़ादा याक़ूब ख़ाँ (दाएं)

सर अब्दुस समद ख़ाँ रामपुर रियासत के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. उनके सबसे बड़े बेटे यूनुस ख़ाँ पहले देहरादून के कर्नल ब्राउन स्कूल में पढ़े. उसके बाद वो भारतीय सैन्य अकादमी के लिए चुन लिए गए, जहाँ से उन्हें गढ़वाल राइफ़ल्स में कमीशन मिला.

सन 1920 में पैदा हुए उनके छोटे बेटे साहिबज़ादा याक़ूब ख़ाँ भी ब्रिटिश भारतीय सेना के लिए चुन लिए गए, जहाँ से उन्हें 1940 में 18वीं किंग एडवर्ड केवेलरी में कमीशन मिल गया.

उन दोनों ने दूसरे विश्व युद्ध में भाग लिया. दोनों को इंडियन जनरल सर्विस मेडल से सम्मानित किया गया.

याक़ूब दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की तरफ़ से लड़ने अफ़्रीका गए, जहाँ मिस्र और लीबिया की सीमा के निकट तोबरूक की लड़ाई के दौरान इटली की सेना ने उन्हें बंदी बना लिया.

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