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31 दिसंबर को रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था कि पिछले साल की शुरुआत में बायपास सर्जरी के बाद उन्होंने एक भारतीय राजनयिक से मुलाक़ात की थी.
रहमान के अनुसार, अन्य देशों के राजनयिकों ने उनसे खुले तौर पर शिष्टाचार मुलाक़ातें कीं लेकिन भारतीय अधिकारी ने इस बैठक को गोपनीय रखने का अनुरोध किया था.
रहमान के इस इंटरव्यू के बाद बांग्लादेश के मीडिया में ख़बर चलने लगी कि जमात-ए इस्लामी प्रमुख की भारतीय राजनयिक से एक गोपनीय मुलाक़ात हुई थी.
बांग्लादेश में अगले महीने चुनाव हैं और जमात-ए इस्लामी एक अहम ताक़त के रूप में उभरती दिख रही है.
कहा जा रहा है कि जमात की पहचान भारत विरोधी गुट के रूप में है, ऐसे में गोपनीय बैठक की हेडलाइन उनकी राजनीति के उलट जा रही थी.
इसी को देखते हुए जमात प्रमुख ने गुरुवार को अपने फ़ेसबुक अकाउंट से एक पोस्ट लिखकर इंटरव्यू पर स्पष्टीकरण जारी किया है.
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शफ़ीक़ुर रहमान ने लिखा है, ”बुधवार को इंटरनेशनल मीडिया रॉयटर्स को दिए एक इंटरव्यू में मुझसे पूछा गया, “इंडिया आपका पड़ोसी देश है, तो क्या आपका कोई संपर्क है, क्या आपकी उनसे कोई बातचीत या मुलाक़ात होती है?”
”इसके जवाब में मैंने कहा- जब मैं पिछले साल बीमार पड़ने के बाद इलाज कराकर घर लौटा, तो देश-विदेश से बहुत से लोग मुझसे मिलने आए थे. जैसे दूसरे देशों के सम्मानित डिप्लोमैट आए थे, वैसे ही इंडियन डिप्लोमैट भी मुझसे मिलने मेरे घर आए थे.”
उन्होंने लिखा, ”दूसरों की तरह, मैंने उनसे भी बात की. उनसे बातचीत के दौरान, हमने उन्हें बताया कि यहाँ आए सभी डिप्लोमैट से मिलने की जानकारी दी है. हम इस मीटिंग की भी जानकारी देंगे. तब उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि मैं इसे सार्वजनिक ना करूँ. हमने कहा, जब भी भविष्य में दोनों देशों के हितों से जुड़े मामलों पर आपसे कोई मीटिंग होगी, तो वह सार्वजनिक ज़रूर की जाएगी.”
”यहां कुछ भी गोपनीय नहीं है. मुझे हैरानी है कि हमारे कुछ मीडिया आउटलेट्स ने रिपोर्ट किया है कि जमात अमीर ने इंडिया के साथ गोपनीय बैठक की थी. मैं ऐसी रिपोर्टों की कड़ी निंदा करता हूँ और संबंधित लोगों से आग्रह करता हूं कि वे भविष्य में बिना सच्चाई जाने ऐसी गुमराह करने वाली ख़बरें देने से बचें.”
रहमान ने रॉयटर्स से क्या कहा?
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रॉयटर्स ने लिखा है कि भारत जब संभावित अगली सरकार बनाने वाले दलों से संपर्क बढ़ा रहा है, तब रहमान ने पुष्टि की कि इस वर्ष की शुरुआत में उनकी बाईपास सर्जरी के बाद एक भारतीय राजनयिक से मुलाक़ात हुई थी.
रहमान के अनुसार, अन्य देशों के राजनयिकों की तरह खुले तौर पर शिष्टाचार भेंट करने के बजाय, भारतीय अधिकारी ने इस बैठक को गोपनीय रखने का अनुरोध किया था.
रॉयटर्स के मुताबिक़ रहमान ने इसकी वजह पूछते हुए भारतीय अधिकारी से कथित रूप से कहा था, ”कई राजनयिक मुझसे मिले और इन मुलाक़ातों को सार्वजनिक किया गया. इसमें समस्या कहां है? हमें सब कुछ सार्वजनिक रखना चाहिए. रिश्तों के विकास का कोई और दूसरा विकल्प नहीं है.”

रॉयटर्स ने लिखा है, ”भारत के विदेश मंत्रालय ने इस बैठक या इसे गोपनीय रखने के अनुरोध पर टिप्पणी के लिए भेजे गए सवालों का तत्काल जवाब नहीं दिया.”
रॉयटर्स के मुताबिक़ भारत सरकार के एक सूत्र ने विभिन्न दलों से संपर्क की पुष्टि की और भारत के विदेश मंत्री ने बुधवार को ढाका का दौरा कर बीएनपी प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की. ख़ालिदा ज़िया का मंगलवार को निधन हो गया था.
पाकिस्तान के साथ जमात की ऐतिहासिक निकटता के बारे में पूछे जाने पर रहमान ने कहा, “हम सभी के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हैं. हम कभी किसी एक देश की ओर झुकने में रुचि नहीं रखते बल्कि हम सभी का सम्मान करते हैं और देशों के बीच संतुलित संबंध चाहते हैं.”
शेख़ हसीना के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी अहम सियासी ताक़त बनकर उभरती दिख रही है.
पाकिस्तान जमात-इस्लामी और बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी विचारधारा के स्तर पर लगभग एक जैसे हैं. दोनों बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध पर सवाल उठाते रहे हैं.
बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी मुक्ति युद्ध में भारत की भूमिका पर सवाल उठाता रहा है.
शेख़ हसीना के सत्ता से जाने के बाद बांग्लादेश में मुक्ति युद्ध की ऐतिहासिक विरासत पर हमले भी शुरू हो गए. बांग्लादेश के संस्थापक शेख़ मुजीब-उर रहमान के घर पर हमला किया गया.
भारत को लेकर कैसा है जमात का रुख़
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बांग्लादेश जमात-ए इस्लामी मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार का समर्थन कर रहा है.
इस साल फ़रवरी में बांग्लादेश की न्यूज़ वेबसाइट ‘प्रथम आलो’ को दिए इंटरव्यू में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, ”1971 में हमारा रुख़ सिद्धांत से जुड़ा था. हम भारत के फ़ायदे के लिए स्वतंत्र देश नहीं चाहते थे. हम चाहते थे कि पाकिस्तानी हमें मताधिकार देने के लिए मजबूर हो. अगर यह संभव नहीं होता, तो कई देशों ने गुरिल्ला युद्ध के ज़रिए आज़ादी हासिल की है.”
शफ़ीक़ुर रहमान ने कहा था, “अगर हमें किसी के ज़रिए या किसी के पक्ष में आज़ादी मिलती तो यह एक बोझ हटाकर दूसरे बोझ के तले दबने की तरह होता. पिछले 53 सालों से बांग्लादेश के लिए क्या यह सच नहीं हुआ है? हमें यह क्यों सुनने के लिए मिलना चाहिए कि कोई ख़ास देश किसी ख़ास पार्टी को पसंद नहीं करता है. कोई ख़ास देश अगर नहीं चाहता है तो कोई ख़ास पार्टी सत्ता में नहीं आ पाती है. क्या स्वतंत्र देश का यही तेवर होता है? बांग्लादेश के युवा अब ये सब सुनना नहीं पसंद करते हैं.”
एक समय प्रतिबंधित रही बांग्लादेश की इस्लामी पार्टी फ़रवरी में होने वाले संसदीय चुनाव में अब तक का अपना सबसे मज़बूत प्रदर्शन करने की तैयारी में है.
जमात ने शेख़ हसीना के विरोध में बनी नेशनल सिटिज़न पार्टी (एनसीपी) से गठबंधन किया है.
एनसीपी और जमात दोनों का रुख़ भारत को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं रहा है. कहा जा रहा है कि अगर यह गठबंधन सत्ता में आता है तो भारत के लिए तालमेल बैठाना आसान नहीं होगा.
रॉयटर्स ने लिखा है, जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बाद दूसरे स्थान पर रह सकती है. 17.5 करोड़ की मुख्यतः मुस्लिम आबादी वाले इस देश में जमात-ए इस्लामी की मुख्यधारा की राजनीति में वापसी मानी जा रही है.
जमात ने 2001 से 2006 के बीच बीएनपी के साथ जूनियर गठबंधन साझेदार के रूप में सत्ता में भागीदारी की थी और वह दोबारा बीएनपी के साथ काम करने के लिए भी तैयार है.
रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में जमात प्रमुख ने कहा, “हम कम से कम पांच वर्षों तक एक स्थिर राष्ट्र देखना चाहते हैं. अगर पार्टियां एक साथ आती हैं, तो हम मिलकर सरकार चलाएंगे.”
यह बयान ऐसे समय आया है, जब पार्टी ने जेन-ज़ी समर्थित एक दल के साथ गठजोड़ कर राजनीतिक हलचल पैदा की है.
जमात शरीया क़ानून के तहत इस्लामी शासन की वकालत करती है लेकिन उसने अपने पारंपरिक रूढ़िवादी आधार से आगे समर्थन बढ़ाने की कोशिश की है.
रहमान ने कहा कि किसी भी सरकार के लिए भ्रष्टाचार-विरोधी एजेंडा साझा होना चाहिए.
उन्होंने यह भी कहा कि 12 फ़रवरी के चुनाव में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी से ही प्रधानमंत्री आएगा. अगर जमात सबसे ज़्यादा सीटें जीतती है, तो पार्टी यह तय करेगी कि क्या वह स्वयं प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.
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जमात का फिर से उभार अगस्त 2024 में युवा नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद लंबे समय से प्रधानमंत्री रहीं शेख़ हसीना के सत्ता से हटने के बाद हुआ है.
शेख़ हसीना की अवामी लीग पार्टी अब चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित है.
हसीना जमात की कट्टर आलोचक थीं और उनके कार्यकाल के दौरान, 1971 में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कथित युद्ध अपराधों के लिए जमात के कई नेताओं को मृत्युदंड दिया गया था.जमात ने बांग्लादेश के मुक्तियुद्ध का विरोध किया था.
2013 में जमात के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. नोबेल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने अगस्त 2024 में पार्टी पर लगे सभी प्रतिबंध हटा दिए थे.
रहमान ने कहा कि ढाका से भागने के बाद शेख़ हसीना का भारत में बने रहना चिंता का विषय है, क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते दशकों के सबसे सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.