जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए वैश्विक उथल-पुथल के दौर में देश की अर्थव्यवस्था की विकास की रफ्तार जारी रहने का भरोसा जताया है। राष्ट्रपति ने कहा कि विश्व-पटल पर अनिश्चितता के बावजूद भारत में निरंतर आर्थिक विकास हो रहा है। भारत निकट भविष्य में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थ-व्यवस्था बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
वर्तमान वैश्विक स्थिति के संदर्भ में राष्ट्रपति ने आत्म निर्भरता और स्वदेशी के मूलमंत्र पर जोर देते हुए कहा कि हम विश्व-स्तरीय इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में निवेश करके अपनी आर्थिक संरचना का उच्च-स्तर पर पुनर्निर्माण कर रहे हैं। देश की आर्थिक दिशा में परिवर्तन के लिए सरकार द्वारा उठाए कदमों की चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने जीएसटी टैक्स व्यवस्था में हुए ताजा सुधार का उल्लेख किया और कहा कि इस निर्णय से अर्थव्यवस्था को और अधिक शक्ति मिलेगी।
जीएसटी स्वतंत्रता के बाद देश के आर्थिक एकीकरण का दिशा में सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है। श्रम सुधार के क्षेत्र में चार ‘लेबर कोड’ से श्रमिक और उद्यमी दोनों को लाभ मिलेगा तथा विकास को भी गति मिलेगी। अनेक अनावश्यक नियमों को निरस्त कई कंप्लायंस को को समाप्त किया गया है तथा जनहित में व्यवस्थाओं को सरल बनाया गया है। टेक्नॉलॉजी के माध्यम से लाभार्थियों को सुविधाओं के साथ सीधे जोड़ा जा रहा है। रोजमर्रा के जीवन को बेहतर बनाने के लक्ष्य के साथ इज ऑफ लिविंग को प्राथमिकता दी जा रही है।
राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार और जन-सामान्य के बीच की दूरी को निरंतर कम किया जा रहा है। पिछले दशक के दौरान राष्ट्रीय लक्ष्यों को जनभागीदारी के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास किया गया है। महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियानों को जन-आंदोलन का रूप दिया गया है। डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को बहुत बड़े पैमाने पर अपनाया जाना इसका नमूना है और आज विश्व के आधे से अधिक डिजिटल लेनदेन भारत में होते हैं।
अपने संबोधन में उन्होंने देश के विकास तथा सुरक्षा में अहम भूमिका निभाने वाले किसानों, युवाओं तथा जवानों की भूमिकाओं की प्रशंसा भी की। कहा देश में स्टार्ट-अप्स की प्रभावशाली सफलता का प्रमुख श्रेय युवा उद्यमियों को जाता है और उन्हें विश्वास है कि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण में युवा-शक्ति की प्रमुख भूमिका रहेगी।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन के दौरान महात्मा गांधी, सरदार पटेल, नेती सुभाषचंद्र बोस, बाबा साहब आंबेडकर, रवींद्र नाथ टैगोर, बकिंमचद्र चट्टोपाध्याय, सुब्रणयम भारती, महर्षि अरविद, नारायण गुरू, बिरसा मुंडा जैसे महान स्वतंत्रता सेनानियों तथा विभूतियों का अलग-अलग संदर्भ में उल्लेख किया मगर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का कोई जिक्र नहीं किया।
हाल के दौर में संविधान खतरे में होने के दावों के परिप्रेक्ष्य में इसका उल्लेख किए बिना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा भारत का संविधान अब आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। संविधान को भारतीय भाषाओं में पढ़ने और समझने से देशवासियों में संवैधानिक राष्ट्रीयता का प्रसार होगा तथा आत्म-गौरव की भावना मजबूत होगी।
राष्ट्रपति ने कहा कि 26 जनवरी 1950 के दिन से ही हम अपने गणतंत्र को संवैधानिक आदर्शों की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। हमारा संविधान विश्व इतिहास में आज तक के सबसे बड़े गणराज्य का आधार-ग्रंथ है। संविधान में निहित न्याय, स्वतन्त्रता, समता और बंधुता के आदर्श हमारे गणतंत्र को परिभाषित करते हैं। संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीयता की भावना तथा देश की एकता को संवैधानिक प्रावधानों का सु²ढ़ आधार प्रदान किया है।
‘राष्ट्रीय मतदाता दिवस’ की चर्चा करते हुए कहा कि हमारे मतदाता, बाबा साहब आंबेडकर की सोच के अनुरूप अपनी राजनैतिक जागरूकता का परिचय दे रहे हैं। मतदान में महिलाओं की बढ़ती हुई भागीदारी हमारे गणतंत्र का एक शक्तिशाली आयाम है। राष्ट्रपति ने ऑपरेशन सिंदूर के द्वारा आतंकवाद के ठिकानों पर सटीक प्रहार का जिक्र करते हुए कहा कि सुरक्षा के क्षेत्र में हमारी आत्मनिर्भरता से ऑपरेशन सिंदूर की ऐतिहासिक सफलता को शक्ति मिली।
पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इस जुड़े क्षेत्रों में भारत ने विश्व समुदाय का मार्गदर्शन किया है। प्रकृति के साथ समन्वित जीवन-शैली भारत की सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रही है। दुनिया में जारी टकराव की ओर इशारा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि पूरे विश्व में शांतिपूर्ण व्यवस्था स्थापित होने से ही मानवता का भविष्य सुरक्षित रह सकता है और अनेक क्षेत्रों में व्याप्त अशांति के वातावरण में भारत द्वारा विश्व-शांति की पैरोकारी कर रहा है।
राष्ट्रपति ने इस क्रम में यह भी कहा कि देश के मानस पटल से गुलामी की मानसिकता के अवशेषों से मुक्त होने का समयबद्ध संकल्प किया गया है। भारतीय ज्ञान परंपरा में दर्शन, चिकित्सा, खगोल विज्ञान, गणित, साहित्य तथा कला की महान विरासत उपलब्ध है।