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इमेज कैप्शन, भारत और चीन के बीच साल 2025 में द्विपक्षीय व्यापार 155 बिलियन डॉलर का रहा, जो बीते साल से 12% अधिक था….में
भारत और चीन का द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा है. भारत में चीन के राजदूत शू फ़ेइहोंग ने मंगलवार को कहा कि भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार 2025 में 155 अरब अमेरिकी डॉलर के ‘रिकॉर्ड उच्च स्तर’ पर पहुंचा है. यह पिछले साल की तुलना में 12 प्रतिशत से अधिक रहा.
चीनी नव वर्ष के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में राजदूत शू फ़ेइहोंग ने कहा कि बीते साल अगस्त में तियानजिन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक सफल मुलाक़ात हुई. इसी के परिणामस्वरूप दोनों देशों के रिश्ते और बेहतर हुए हैं.
उन्होंने आगे कहा, “चीन भारत के ब्रिक्स की अध्यक्षता करने का समर्थन करता है. चीन ‘ग्लोबल साउथ’ के विकास को आगे बढ़ाने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है.”
चीन की ओर से द्विपक्षीय व्यापार में रिकॉर्ड बढ़ोतरी की जानकारी तब सामने आई है, जब भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील हो रही है.
हालांकि, चीन इस ट्रेड डील को टिकाऊ नहीं मानता है. लेकिन विश्लेषक कहते हैं कि इस ट्रेड डील का सीधा-सीधा नुक़सान चीन को हो सकता है. मगर इससे चीन-भारत के द्विपक्षीय व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने वाला.
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भारत-अमेरिका की ट्रेड डील पर चीन की क्या प्रतिक्रिया रही?
बीबीसी मॉनिटरिंग के मुताबिक़, चीन के सरकारी मीडिया ने भारत और अमेरिका की ट्रेड डील की सफलता पर सवाल उठाए हैं. साथ ही रूस से तेल न ख़रीदने की संभावना पर भी संशय जताया. उन्होंने कहा कि क्या भारत सच में रूस से तेल ख़रीदना बंद कर देगा.
चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने सिंघुआ यूनिवर्सिटी के क़ियान फ़ेंग का हवाला देते हुए लिखा कि अमेरिका और भारत के नेताओं के बयानों के लहजे में काफ़ी अंतर है.
क़ियान फ़ेंग ने कहा कि रूस और भारत के बीच पुराना और स्थिर रिश्ता है इसलिए भारत अचानक रूस से तेल ख़रीदना पूरी तरह बंद कर दे, यह असल में संभव नहीं लगता.
विशेषज्ञों का दावा है कि अमेरिका के साथ समझौता होने के बाद भी भारत पिछले सालों की तरह रूसी तेल ख़रीदना जारी रखेगा, वो प्रतिबंधों से बचने के लिए “शैडो फ़्लीट” (छिपे हुए जहाज़ों) का इस्तेमाल कर सकता है.
शंघाई के वित्तीय अख़बार यिकाई ने अपनी हेडलाइन में सवाल उठाया क्या अमेरिका और भारत का ‘बड़ा समझौता’ भरोसेमंद है? इस लेख में कहा गया कि यह सफल लगने वाला समझौता काफ़ी आलोचना झेल रहा है. ख़ासकर इस बात पर कि क्या भारत ट्रंप के दावे के मुताबिक़, 500 अरब डॉलर के अमेरिकी ऊर्जा, टेक्नोलॉजी, कृषि और अन्य सामान ख़रीद पाएगा जबकि पिछले साल भारत ने अमेरिका से सिर्फ़ 41.5 अरब डॉलर का ही सामान ख़रीदा था.
चीन को काउंटर करने के लिए अमेरिका ने डील की?
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इमेज कैप्शन, विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत से ट्रेड डील करने का एक कारण यह भी है कि अमेरिका चीन को काउंटर करना चाहता है
अमेरिका ने 2026 की नेशनल डिफ़ेंस स्ट्रेटेजी में चीन को मुख्य ‘प्रतिद्वंद्वी ख़तरा’ बताया था. चीन ही एकमात्र ऐसा देश है जो न सिर्फ़ चाहता है, बल्कि ताक़त भी रखता है कि दुनिया के मौजूदा व्यवस्था को पूरी तरह बदल दे.
इस स्ट्रेटेजी के मुताबिक़, “इंडो-पैसिफ़िक क्षेत्र में चीन को टक्कर देने के लिए हम सामना करने की बजाय अपनी ताक़त बढ़ाकर उसे रोकेंगे. दुनिया भर के सहयोगी देशों और साझेदारों के साथ मिलकर बोझ बराबर बांटेंगे.”
इसमें कहा गया है, “हमारा मक़सद चीन को हराना, दबाना या अपमानित करना नहीं है. हम सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि चीन या कोई और हमें या हमारे सहयोगी देशों पर हावी न हो सके. इंडो-पैसिफ़िक में शक्ति का संतुलन बना रहे, ताकि सबको शांति मिले.”
इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर डिफ़ेंस एंड सिक्योरिटी के एक लेख में कहा गया है कि 2000 के दशक के शुरुआती सालों में अमेरिका ने भारत को इतनी ताक़त दी, जिसका इस्तेमाल चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए किया जा सके. इसके एवज़ में भारत ने भी अमेरिका से अपने संबंध मज़बूत और स्थिर बनाए. लेकिन ट्रंप के टैरिफ़, क्वाड (भारत, ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका) के काम में रुकावट और पाकिस्तान को लेकर मिले-जुले संकेतों ने पुरानी रणनीति को मुश्किल में डाल दिया था.
“अमेरिका को लगता था कि भारत किसी भी हाल में चीन से बेहतर रिश्ते स्थापित नहीं करेगा. लेकिन यह धारणा ग़लत साबित हुई. ट्रंप के कड़े क़दमों के जवाब में भारत ने तुरंत अपना जोखिम कम किया. उसने चीन के साथ सीमित राजनयिक रास्ते फिर से खोले. इससे अमेरिका और यूरोप के देशों को संदेश मिला.”
विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन को काउंटर करने के लिए भी अमेरिका के लिए भारत से डील करना ज़रूरी था. काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशंस के डिस्टिंग्विश्ड फ़ेलो केनेथ आई जस्टर का कहना है, “अमेरिका के लिए भारत इंडो-पैसिफ़िक इलाक़े में एक बहुत अहम साझेदार है. साथ ही भारत क्वाड ग्रुप (ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका) का एक महत्वपूर्ण सदस्य है, जो इस क्षेत्र में चीन के ख़िलाफ़ संतुलन बनाए रखने में मदद करता है.”
विशेषज्ञों के इतर अमेरिका के नेता भी ट्रेड डील को चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के तौर पर देख रहे हैं.
अमेरिकी सीनेट फ़ॉरेन रिलेशंस कमेटी के चेयरमैन जिम रिस्क ने एक्स पर पोस्ट में कहा, “बहुत ख़ुशी हुई कि दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे बड़े लोकतंत्र वाले देश भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार की रुकावटें कम करने पर सहमति जताई है. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के ‘ग़लत प्रभाव’ का मुक़ाबला करने में भारत एक अहम साझेदार है.”
चीन को भारत-अमेरिका ट्रेड डील से क्या नुक़सान?
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इमेज कैप्शन, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि अब चीन प्लस वन रणनीति पूरी तरह काम करेगी
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट बताती है, “अमेरिका भारत को अपना साथी और चीन के ख़िलाफ बैलेंस बनाने वाला देश मानता है. अमेरिका अब वैश्विक व्यापार के नियम बदलना चाहता है. अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ हुए व्यापार समझौते से वैश्विक व्यापार की तस्वीर भारत के पक्ष में झुकी हुई नज़र आ रही है. पश्चिम के बड़े बाज़ार चीन के सामान पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी और दूसरे प्रतिबंध लगाकर रोक लगा रहे हैं. इससे भारत को फ़ायदा मिल रहा है.”
भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा, “अब चीज़ें बदलेंगी. चीन प्लस वन रणनीति पूरी तरह काम करेगी, यानी कंपनियां चीन के अलावा भारत में भी निवेश बढ़ाएंगी.”
चीन प्लस वन ऐसी व्यावसायिक नीति है जिसके तहत कंपनियां चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए प्रोडक्शन और मैन्युफ़ैक्चरिंग को चीन के साथ-साथ अन्य देशों (जैसे भारत, वियतनाम, मलेशिया) में भी विस्तारित कर रही हैं. ऐसा होने पर चीन की अर्थव्यवस्था को सीधा झटका लगेगा.
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के फ़ाउंडर अजय श्रीवास्तव का कहना है, “भले अमेरिका इस डील के ज़रिये चीन को काउंटर करने की सोच रहा हो, लेकिन भारत को इस बात पर ध्यान देना होगा कि वह अमेरिका के हाथों इस्तेमाल न हो. अगर अमेरिका यह चाहता है कि भारत उनके कहे अनुसार किसी देश से संबंध रखे, तो यह उसकी ग़लतफ़हमी हो सकती है. इसके इतर, जो सामान चीन हमें सस्ते दामों पर भेजता है, वह अमेरिका बमुश्किल ही और कम दामों में भेज पाए.”
मार्केट एक्सपर्ट अजय बग्गा का मानना है कि ट्रेड डील से भारत-चीन का द्विपक्षीय व्यापार तो प्रभावित नहीं होगा, लेकिन यह बात तय है कि चीन प्लस वन रणनीति को हवा मिलेगी. चीन पर अमेरिका ने 34% टैरिफ़ लगाया है, जबकि भारत पर यह अब 18% ही रह गया है. लिहाज़ा, कई कंपनियों का भारत की ओर रुझान होगा ताकि उनके सामान को अमेरिका में आसानी से कम टैरिफ़ पर एंट्री मिले.”
भारत ने अपने बजट में भी ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में रेयर अर्थ कॉरिडोर बनाने का एलान किया है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फ़ैसला चीन के लिए झटका हो सकता है, क्योंकि रेयर अर्थ का सबसे बड़ा भंडार चीन के पास है.
अजय बग्गा भी आगे कहते हैं, “अमेरिका ने क्रिटिकल मिनरल्स से जुड़ी बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर को आमंत्रित किया है. वह भी ऐसे समय पर जब अमेरिका ने प्रोजेक्ट वॉल्ट नाम से ज़रूरी मिनरल्स का कमर्शियल स्टॉक बनाने के लिए पहल शुरू की है, जिसका बजट 12 बिलियन डॉलर है. वे चीन का सप्लाई चेन पर से एकाधिकार तोड़ना चाहते हैं. इसमें भारत उनकी मदद कर सकता है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.