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“लव मैरिज करने वालों और उनका समर्थन करने वालों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया जाएगा.”
ये बयान मध्य प्रदेश के रतलाम ज़िले के पंचेवा गांव में एलान कर रहे अरुण सांखला का था. इस दौरान गांव के सरपंच और पंच भी मौजूद थे और वे इस एलान से सहमत भी थे.
लगभग चार हज़ार लोगों की आबादी वाले पंचेवा गांव में पिछले कुछ महीनों में कई युवा जोड़ों ने प्रेम विवाह किया और इनमें से ज़्यादातर अंतरजातीय शादियां थीं.
गांव में इन शादियों को लेकर कई सवाल थे. 22 जनवरी को गांव के अलग-अलग व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर जनसभा करने की बात वायरल होने लगी और 23 तारीख़ की शाम गांव के अंदर बने राम मंदिर के सामने सैकड़ों लोग जमा हो गए.
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ज़िला कलेक्टर मीशा सिंह ने इस मामले में कार्रवाई करने और पीड़ित पक्ष की मदद करने की बात कही है.
क्या है पूरा मामला?
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पंचेवा गांव में लोग अलग-अलग समूहों में इस एलान पर चर्चा करते नज़र आए.
इस बारे में जिन लोगों से बात हुई उनमें से ज़्यादातर ग्रामीणों का कहना था, “23 तारीख़ को सुनाया गया फ़ैसला बिल्कुल सही है. घर से लड़का-लड़की भागकर शादी करेंगे तो मां-बाप की क्या इज़्ज़त रह जाएगी?”
गांव में पिछले एक साल में 6-7 प्रेम विवाह हुए हैं. 18 जनवरी को गांव में एक अंतरजातीय जोड़े ने प्रेम विवाह के लिए घर छोड़ दिया. इसके पांच दिन बाद 23 तारीख़ को ग्रामीणों ने सभा की और प्रेम विवाह पर रोक लगाने और प्रेम विवाह करने वालों और उनका समर्थन करने वालों का बहिष्कार करने के लिए मीटिंग रखी.
गांव में छोटे-बड़े लगभग 7-8 मंदिर हैं, जहां 23 तारीख़ को प्रेम विवाह रोकने की मीटिंग की घोषणा करवाई गई. इसी मीटिंग के बाद अरुण सांखला ने सबकी सहमति से लिए गए फ़ैसले को सुनाते हुए प्रेम विवाह करने वालों के बहिष्कार का फ़रमान सुना दिया.
इस बहिष्कार के तहत गांव में संबंधित लोगों को दूध, चाय और राशन जैसी ज़रूरी चीज़ें न देने की बात कही गई. मंदिर में प्रवेश पर रोक का भी एलान हुआ.
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इस फ़रमान की ज़द में आए आठ महीने पहले शादी करने वाले दीनदयाल जाट और मनीषा पाटीदार.
दोनों बालिग़ हैं और पिछले छह साल से एक-दूसरे को जानते हैं.
दीनदयाल कहते हैं, “हम लोग छह साल पहले गांव के एक मेले में मिले थे. फिर धीरे-धीरे फ़ोन पर बात होने लगी. जब हम लोग शादी की उम्र में पहुंचे तो हमने भागकर कोर्ट में शादी कर ली.”
शादी के बाद दोनों ने गांव छोड़ दिया और लगभग 25 किलोमीटर दूर नामली में रहने लगे.
दीनदयाल बताते हैं, “मैंने सुबह फ़ेसबुक पर एक वीडियो वायरल होते देखा. उसमें मेरा और मेरे चाचा का भी नाम था और हमारा बहिष्कार करने का भी आदेश था. मैंने अपने चाचा को फ़ोन किया तो उन्होंने सारी कहानी बताई.”
वह कहते हैं, “मैं तो तब से ही यह सोच रहा हूं कि जिस शादी को कोर्ट ने वैध माना, जिस पर पुलिस की सहमति रही. जिसमें हम दोनों ख़ुश हैं और जिस शादी का अधिकार हमें संविधान ने दिया, उसका बहिष्कार करने का हक़ गांव वालों को किसने दिया?”
प्रशासन ने क्या बताया?
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रतलाम की ज़िला कलेक्टर मीशा सिंह और पुलिस अधीक्षक अमित कुमार दोनों ने ही इस घटना को निंदनीय और नागरिक स्वतंत्रता के हनन का मामला बताया.
ज़िला कलेक्टर मीशा सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, “फ़िलहाल अरुण सांखला और पांच अन्य ग्रामीणों से 25 हज़ार का बॉन्ड इस शर्त के साथ भरवाया गया है कि अगर अगले छह महीने में इनके ख़िलाफ़ कोई शिकायत आती है तो इन्हें सीधा जेल भेजा जाएगा.”
पुलिस अधीक्षक अमित कुमार कहते हैं, “कुछ कपल्स ने शादी की थी जिसके बाद गांव के कुछ लोगों ने एक जनसभा की और सामाजिक बहिष्कार की बात कही, जिसका वीडियो हमारे पास आया था. हमने इसमें प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की है. देखिए यह सिविल लिबर्टी (नागरिक स्वतंत्रता) का मामला है इसलिए हमने इलाके़ में पुलिस पैट्रोलिंग भी बढ़ा दी है ताकि नागरिकों के बीच विश्वास बनाया जा सके.”
हालांकि दीनदयाल और उनके परिवार का कहना है कि पुलिस और प्रशासन ने उनकी अब तक कोई मदद नहीं की है.
प्रेम विवाह का समर्थन करने वाले भी परेशान
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इस बहिष्कार की मार सिर्फ़ दीनदयाल और मनीषा तक सीमित नहीं रही. दीनदयाल के चाचा निर्मल जाट ने इस शादी का समर्थन किया था. इसके बाद उन्हें भी गांव से अलग-थलग कर दिया गया.
निर्मल जाट कहते हैं, “श्रीमान मैं तो फ़रमान जारी होने के बाद से गांव नहीं गया हूं. मुझे डर है कि अगर लौटा तो मेरे साथ मारपीट हो सकती है. गांव वालों ने यह भी कहा कि जो कोई परिवार की मदद करेगा उसके साथ भी हिंसा होगी.”
दीनदयाल बताते हैं कि 24 जनवरी से उनका परिवार गांव से बाहर ही रह रहा है.
बीबीसी की टीम भी जब 30 जनवरी को पंचेवा गांव पहुंची तो निर्मल जाट के घर पर ताला लगा था. ग्रामीणों से बात करने पर पता चला कि डर सिर्फ़ बहिष्कार का नहीं बल्कि हिंसा का भी था.
गांव के सरपंच ने क्या कहा?
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गांव के सरपंच योगेश मीणा का कहना है कि पिछले एक साल में पंचेवा में छह से सात प्रेम विवाह हुए हैं. उनके मुताबिक़ ज़्यादातर मामलों में लड़के और लड़की ने घर से भागकर शादी की.
सरपंच का दावा है कि “इससे गांव का माहौल बिगड़ रहा था और इसी वजह से लोगों ने बैठकर फ़ैसला लिया.”
उनका कहना है, “देखिए यह फ़ैसला किसी एक परिवार के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि गांव की सामाजिक व्यवस्था को बचाने के लिए लिया गया. यहां कई मामले हुए जब लड़के और लड़कियों ने भाग कर शादी कर ली.”
वायरल वीडियो में दिखने वाले पंच अरुण सांखला कहते हैं, “यह क़दम बच्चों को माता-पिता की अनुमति के बिना शादी करने से रोकने के लिए था ताकि परिवारों को दुख न हो. बच्चे ऐसी शादियां करते हैं और फिर वापस आकर उसी गांव में अपने मां-बाप के सामने रहते हैं, ऐसे में परिजनों को कितना दुख होता है. इसको रोकने के लिए ऐसा फ़ैसला सुनाया गया था.”
हालांकि, अब प्रशासनिक दख़ल के बाद अरुण सांखला का कहना है, “हमारे यहां सभी अधिकारी और प्रशासनिक लोग आए थे जिनसे बातचीत में हमने कहा कि गांव में कोई नियम लागू नहीं किया जा रहा और न ही हम किसी का बहिष्कार करेंगे.”
अंतरजातीय शादी है असल मुद्दा
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दीनदयाल पंचायत की इन दलीलों से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि असल वजह उनकी अंतरजातीय शादी है. वह जाट समाज से हैं जबकि मनीषा पाटीदार समाज से आती हैं.
दीनदयाल कहते हैं कि गांव की बैठक में यही सवाल उठाया गया कि जाट समाज के लड़के ने पाटीदार समाज की लड़की से शादी कैसे कर ली.
दीनदयाल ने कहा, “हम दोनों अलग जातियों से हैं इसलिए इतना बहिष्कार हो रहा है. अगर एक ही जाति में होते तो ऐसा नहीं होता.”
वहीं, मनीषा ने दीनदयाल की ओर देखते हुए कहा, “प्रेम विवाह में कुछ भी ग़लत नहीं है. लेकिन यह बात सही है कि इस विवाद के चलते शादी के बाद की ज़िंदगी उम्मीद से कहीं ज़्यादा कठिन हो गई.”
दीनदयाल का कहना है, “मुझे यह अंदाज़ा नहीं था कि शादी के बाद न सरकार मेरे साथ खड़ी होगी और न ही पुलिस. मुझे लगा था कि कानून से हमें सुरक्षा मिलेगी लेकिन बहिष्कार और धमकियों के बीच अभी तो असहाय ही हैं, कानून की कोई मदद नहीं मिली है.”
जो लोग परिवार के साथ खड़े हुए उनके लिए भी हालात आसान नहीं हैं. निर्मल जाट कहते हैं कि बहिष्कार सिर्फ़ सामाजिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है. मज़दूरी और रोज़गार पर भी असर पड़ा है.
हालांकि जब हमने परिवार के सुरक्षा न मिलने के आरोपों पर पुलिस से बात की तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में अभी पूरी जानकारी नहीं है और एक टीम हालात का जायज़ा ले रही है.
ग्रामीण अपना फ़ैसला वापस लेने के बारे में कह रहे हैं जबकि दीनदयाल और उनके परिवार को इस बात का भरोसा नहीं है कि बहिष्कार का फ़ैसला और धमकियां पूरी तरह ख़त्म हो चुके हैं.
दीनदयाल कहते हैं कि वह अपने गांव लौटना चाहते हैं. उनके चाचा निर्मल जाट भी वही ज़िंदगी जीना चाहते हैं जो पहले थी.
लेकिन उनके मन में अब भी एक सवाल है, “अगर इस मामले में सख़्त कार्रवाई नहीं हुई तो आगे कोई भी प्रेम विवाह करने की हिम्मत कैसे करेगा. ऐसे में तो दो लोग जो एक-दूसरे से प्रेम करते हैं वो बिछड़ जाएंगे और शायद ऐसे में जीना भी पसंद न करें.”
वह कहते हैं कि ये डर सिर्फ़ उनका नहीं बल्कि उन जैसे तमाम लोगों का है जो अपनी मर्ज़ी से अपनी पसंद के पार्टनर के साथ ज़िंदगी जीना चाहते हैं और जिन्हें अब यह डर सता रहा है कि उस फ़ैसले की क़ीमत पूरा परिवार चुकाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.