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मलक्का की घेराबंदी: चीन की ‘दुखती रग’ पर भारत का हाथ, होर्मुज तो बस एक झांकी है

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Mar 26, 2026


डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लगभग बंद होने की कगार पर पहुंच गया है, लेकिन रणनीतिक विश्लेषक इसे महज एक ‘ट्रेलर’ मान रहे हैं। असली कहानी हजारों किलोमीटर दूर स्ट्रेट ऑफ मलक्का में छिपी है, जहां चीन की ऊर्जा और व्यापार की जीवनरेखा गुजरती है, और भारत की अंडमान-निकोबार द्वीप समूह की निकटता इसे बीजिंग के लिए रणनीतिक दबाव का सबसे बड़ा स्रोत बना सकती है।

होर्मुज संकट

वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथलईरान ने अमेरिकी-इजरायली हमलों के जवाब में होर्मुज को प्रभावी रूप से बंद कर रखा है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआए) के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में यहां से प्रतिदिन औसतन 20.9 मिलियन बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते थे, जो वैश्विक पेट्रोलियम खपत का करीब 20 फीसदी और समुद्री तेल व्यापार का एक चौथाई हिस्सा है।

युद्ध शुरू होने के बाद टैंकर ट्रैफिक लगभग ठप हो गया है। बीमा दरें आसमान छू रही हैं, तेल की कीमतें बढ़ी हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा है। ट्रंप प्रशासन ने ईरान को अल्टीमेटम दिया था, लेकिन अब बातचीत और देरी की खबरें आ रही हैं।

लेकिन चीन के लिए असली खतरा मलक्का है

होर्मुज संकट मध्य पूर्व तक सीमित है, लेकिन मलक्का जलडमरूमध्य चीन की सबसे बड़ी कमजोरी है। यह हिंद महासागर को प्रशांत से जोड़ता है और चीन के कुल तेल आयात का बड़ा हिस्सा (करीब 80 फीसदी) यहीं से गुजरता है। चीन इसे अपना ‘मलक्का डिलेमा’ कहता है।

भारत की भौगोलिक स्थिति यहां निर्णायक है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह मलक्का के पश्चिमी छोर से महज एक दिन की दूरी पर हैं। पोर्ट ब्लेयर और ग्रेट निकोबार से भारतीय नौसेना और वायुसेना निगरानी, दबाव और जरूरत पड़ने पर पहुंच रोकने की क्षमता रखती है।

ऑस्ट्रेलियाई डिफेंस फोर्स अकादमी में विजिटिंग फेलो डॉ. अशोक शर्मा कहते हैं कि भारत की ताकत पूरी तरह रोकने में नहीं, बल्कि अनिश्चितता और रणनीतिक दबाव पैदा करने में है।।

क्यों है यह भारत के लिए रणनीतिक लाभ?

  • यदि ताइवान पर चीन का हमला होता है या भारत-चीन गतिरोध समुद्री क्षेत्र में फैलता है, तो मलक्का रणनीतिक दबाव बिंदु बन जाएगा।
  • वैकल्पिक मार्ग (लोम्बोक या सुंडा) लंबे, महंगे और कम क्षमता वाले हैं।
  • भारत की निकटता उसे लंबे समय तक निगरानी और हस्तक्षेप की क्षमता देती है, जबकि चीन के लिए लॉजिस्टिक्स चुनौतीपूर्ण रहेंगे।

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