इमेज स्रोत, shrikant bangale
“यह एक रैकेट है. तथाकथित गोरक्षक किसानों की गायें लूटते हैं. इसमें गोरक्षा या गाय की सेवा जैसा कुछ भी नहीं है.”
यह कहना है महाराष्ट्र के एक युवा किसान दत्ता धागे का.
कुछ दिन पहले, दत्ता धागे और कई दूसरे किसानों ने संगमनेर तहसीलदार ऑफ़िस के बाहर अपनी गायें और बछड़े लेकर विरोध प्रदर्शन किया था.
वे महाराष्ट्र के गोहत्या प्रतिबंध क़ानून में संशोधन की मांग कर रहे हैं. इसी मांग को लेकर राज्य के संगमनेर, अहिल्यानगर, सोलापुर, बुलढाणा और लातूर सहित कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन किया गया.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
महाराष्ट्र में गोहत्या प्रतिबंध क़ानून को लागू हुए 10 साल हो गए हैं. लेकिन किसानों का आरोप है कि यह क़ानून उत्पीड़न की वजह बन गया है.
किसानों का आरोप है कि स्वघोषित ‘गोरक्षक’ इस क़ानून की आड़ में उनसे पैसे वसूलते हैं. किसानों और पशु व्यापारियों के मुताबिक़, मवेशियों को एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाते वक़्त उन्हें बीच सड़क पर रोक लिया जाता है.
किसानों का ग़ुस्सा राज्य के अधिकतर हिस्सों में विरोध प्रदर्शन के रूप में सामने आ रहा है.
क़ुरैशी मीट व्यापारियों ने इस कथित उत्पीड़न के ख़िलाफ़ हड़ताल शुरू की, अब किसान भी उनका साथ दे रहे हैं. किसानों का आरोप है कि ‘गोहत्या पर प्रतिबंध’ और तथाकथित गोरक्षक दोनों ही उन्हें तबाह कर रहे हैं.
‘बजरंग दल वाले ट्रक रोकते हैं’
इमेज स्रोत, shrikant bangale
जालना ज़िले के गेवराई बाज़ार में हर गुरुवार को एक बड़ा पशु बाज़ार लगता है. आसपास के गांवों से किसान और व्यापारी मवेशियों की ख़रीद-बिक्री के लिए गेवराई बाज़ार आते हैं.
यहां के किसानों और व्यापारियों की शिकायत है कि कथित गोरक्षकों के कारण मवेशियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना लगातार मुश्किल होता जा रहा है.
गेवराई बाज़ार के रहने वाले सुरेश लहाने कहते हैं, “क़ानून में कोई समस्या नहीं है. लेकिन लोग इसका ग़लत इस्तेमाल कर रहे हैं. कृषि के लिए मवेशियों के ट्रांसपोर्ट और व्यापार को नहीं रोकना चाहिए.”
इमेज स्रोत, shrikant bangale
गणपत भोसले एक पशु व्यापारी हैं. वह आरोप लगाते हैं, “अगर हम बाहर से पशु लाना चाहते हैं, तो बजरंग दल वाले हमारे ट्रक रोक देते हैं. वे हमारे किसानों और व्यापारियों को पकड़ लेते हैं.”
“वे हम पर आरोप लगाते हैं कि हम पशुओं को मारने के लिए ला रहे हैं. फिर वे हमसे पैसे वसूलते हैं. उन्हें एक हज़ार, दो हज़ार या यहां तक कि दस हज़ार रुपये तक देने पड़ते हैं.”
एक दूसरे व्यापारी ने बताया कि जब भैंस ले जाने वाला उनका ट्रक रोका गया था, तब उनसे 50 हज़ार रुपये वसूले गए थे.
बजरंग दल, जो विश्व हिंदू परिषद की एक युवा शाखा है, इन आरोपों से इनकार करता है.
विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता श्रीराज नायर ने कहा, “हमने सिर्फ़ पुलिस की मदद से पशु तस्करों को पकड़ा है. हमारे ख़िलाफ़ लगाए गए ये आरोप झूठे और निराधार हैं.”
क़ुरैशी समुदाय की हड़ताल
इमेज स्रोत, kiran sakale
महाराष्ट्र के कई ज़िलों में पिछले दो महीनों से क़ुरैशी समुदाय के लोग हड़ताल पर हैं. ये समुदाय पारंपरिक रूप से मांस के व्यापार से जुड़ा है.
गोरक्षकों के कथित उत्पीड़न के कारण क़ुरैशी समुदाय ने पशुओं की ख़रीद-फरोख़्त बंद करने का फ़ैसला किया है.
ऑल इंडिया जमीयतुल क़ुरैशी संगठन के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष जावेद क़ुरैशी आरोप लगाते हुए कहते हैं, “अगर पुलिस या प्रशासन हमें रोकता है तो हम समझ सकते हैं. लेकिन बाहरी लोग हमें पीटते हैं, पशु ज़ब्त करते हैं और उन्हें गोशालाओं में बंद कर देते हैं. यह ग़ैरक़ानूनी है और इसी कारण हम हड़ताल पर हैं.”
क्या बोले राजनेता?
इमेज स्रोत, kiran sakale
इस बीच, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने कुछ दिन पहले आश्वासन दिया था कि व्यापारियों और किसानों के ख़िलाफ़ अन्याय नहीं सहा जाएगा.
इसके बाद पुलिस ने एक सर्कुलर जारी किया. इसमें ये स्पष्ट किया गया कि सिर्फ़ पुलिस और अधिकारी ही मवेशियों के अवैध परिवहन में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे.
हालांकि, इस सर्कुलर में गोरक्षकों का कोई ज़िक्र नहीं है, न ही उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई का कोई आदेश है.
सोलापुर के सांगोला में किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान विधायक सदाभाऊ खोत ने कहा, “गोरक्षकों को हमारे मवेशी रोकने का क्या अधिकार है? क्या वे उन्हें चारा और पानी देते हैं? क्या वे गोबर साफ़ करते हैं? उन्हें गोरक्षा का गब्बर सिंह किसने बनाया? हम इस रैकेट का पर्दाफ़ाश करेंगे.”
किसानों की शिकायतों के बारे में जब राज्य के कृषि मंत्री दत्तात्रय भरणे से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, “मुझे अभी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. लेकिन जानकारी मिलते ही सरकार उचित निर्णय लेगी.”
क़ानून आने के बावजूद गायों की संख्या घटी
इमेज स्रोत, kiran sakale
महाराष्ट्र में 2015 में मवेशियों, यानी गाय, बैल, सांड और बछड़ों की हत्या पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था. तब सरकार ने कहा था कि इस क़ानून का मक़सद मवेशियों का संरक्षण है. लेकिन आंकड़े कुछ और ही तस्वीर पेश करते हैं.
- 2012 में महाराष्ट्र में गाय और बैलों की संख्या 1 करोड़ 54 लाख थी, 2019 में यह 10 प्रतिशत घटकर 1 करोड़ 39 लाख रह गई.
- 2012 की तुलना में 2019 में देसी गायों की संख्या में 20 प्रतिशत की कमी आई है.
- भैंसों, भेड़ों और बकरियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है.
- आज राज्यभर में 1.5 लाख से अधिक मवेशी सड़कों पर भटक रहे हैं.
निंबकर एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट की प्रमुख डॉ. चंदा निंबकर कहती हैं, “चूंकि मवेशियों की हत्या पर रोक है, इसलिए नर बछड़ों को भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जा रहा है. किसान उन्हें पाल नहीं सकते क्योंकि कोई बाज़ार नहीं है. इसलिए वे उन्हें छोड़ देते हैं.”
किसानों की आर्थिक स्थिति पर भी असर
इमेज स्रोत, shrikant bangale
फ़ूड कल्चर के एक्सपर्ट शाहू पाटोले बताते हैं, “किसानों के लिए मवेशी एटीएम जैसे थे. वे उन्हें बाज़ार ले जाते और तुरंत कैश मिल जाता. अब वह एटीएम बंद हो गया है. एक तरफ़ किसानों पर धर्म का दबाव है और दूसरी तरफ़ मवेशियों को बेचने पर पाबंदी है.”
कृषि अर्थशास्त्री श्रीकांत कुवलेकर कहते हैं, “बैल सिर्फ़ दो-तीन महीने खेती में काम आते हैं. बाकी समय वे बोझ बन जाते हैं. जब फ़सल की कीमत लागत से कम हो, तो किसान यह बोझ कैसे उठाएंगे?”
व्यापारी गणपत भोसले बताते हैं, “अनप्रोडक्टिव मवेशी की एक जोड़ी को पालने में सालाना क़रीब 40 हज़ार रुपये का ख़र्च आता है. यह कौन देगा?”
अब पशु बाज़ार पहले जैसे नहीं रहे
इमेज स्रोत, kiran sakale
कभी गेवराई पशु बाज़ार में एक हफ़्ते में एक करोड़ रुपये से लेकर डेढ़ करोड़ रुपये तक का लेन-देन होता था. अब यह घटकर मुश्किल से 10-15 लाख रुपये रह गया है.
भोसले कहते हैं, “बाज़ार अब पहले का सिर्फ़ 20 प्रतिशत रह गया है. कीमतें भी 30–40 प्रतिशत गिर चुकी हैं.”
विशेषज्ञ चेताते हैं कि अगर प्रतिबंधों में ढील नहीं दी गई, तो देशी गाय और बैल दस साल में विलुप्त हो सकते हैं और वे सिर्फ़ चिड़ियाघरों या इतिहास की किताबों में ही दिखेंगे.
किसान नेता राजू शेट्टी कहते हैं, “अगर प्रतिबंध सिर्फ़ देशी गायों पर होता तो संकट इतना गंभीर नहीं होता. अब तो बैल भी नहीं बिक सकते.”
सरकार से मदद की दरकार
इमेज स्रोत, kiran sakale
महाराष्ट्र के 75 लाख परिवार पशुपालन पर निर्भर हैं.
सरकार ने देशी गाय को ‘राजमाता-गोमाता’ घोषित किया है और गोशालाओं के लिए सब्सिडी का वादा किया है. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि किसानों से अपेक्षा करना कि वे अनप्रोडक्टिव मवेशियों को बिना मुआवज़े के पालते रहें, ये सही नहीं है.
किसान धागे कहते हैं, “हम अनप्रोडक्टिव मवेशियों का वध नहीं चाहते. लेकिन अगर सरकार चाहती है कि हम उन्हें पालें, तो सहयोग भी दे. हम टैक्स देते हैं तो बोझ सिर्फ़ किसानों पर क्यों?”
पशु बाज़ार कम हो रहे हैं, उससे जुड़े व्यापार बंद हो रहे हैं और कई परिवारों की रोज़ी-रोटी छिन रही है. किसान सवाल करते हैं, “अगर पूरा पेशा बंद करना ही विकास है, तो हम आगे नहीं, पीछे जा रहे हैं.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित