जेएनएन, जगदलपुर। बस्तर के घने जंगल कभी माओवादियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना और ताकत का प्रतीक थे, अब उनके खिलाफ ही जाल बन चुके हैं। डिस्टि्रक्ट रिजर्व गार्ड (डीआरजी) और बस्तर फाइटर्स ने गुरिल्ला युद्ध की उसी रणनीति को पलट दिया, जिस पर कभी माओवादियों का वर्चस्व था।
स्थानीय आदिवासियों और आत्मसमर्पित माओवादियों से बने इन बलों ने जंगल की हर चाल-रास्ते, ठिकाने और नेटवर्क को समझते हुए माओवादियों को लगातार कमजोर किया है।
इसी रणनीतिक बढ़त का असर है कि माओवादी संगठन लगभग सिमट गया है। शीर्ष नेतृत्व पर सटीक हमलों में महासचिव बसव राजू, गुड्सा उसेंडी और कोसा जैसे बड़े नामों का अंत हुआ, जिससे संगठन की रीढ़ टूट गई।
तकनीक, खुफिया तंत्र और स्थानीय सहयोग के दम पर अब जंगल में सुरक्षाबलों की पकड़ मजबूत हो चुकी है। वर्ष 2015 में गठित डीआरजी और वर्ष 2021 में बने बस्तर फाइटर्स आज माओवादी विरोधी अभियान की रीढ़ हैं।
स्थानीय युवाओं के साथ लगभग 200 आत्मसमर्पित माओवादी भी इन बलों में शामिल किए गए, जिनकी अंदरूनी जानकारी ने अभियानों को सटीक बनाया। स्थानीय भाषा, भूगोल और रणनीति की समझ ने सुरक्षा बलों को निर्णायक बढ़त दिलाई है।
कड़ा प्रशिक्षण, लंबी लड़ाई की तैयारीअसम, मिजोरम, तेलंगाना समेत विभिन्न स्थानों पर प्रशिक्षण के साथ इन बलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रे¨नग भी दी गई है। जवान 60-70 किलो वजन लेकर कई दिनों तक जंगल में आपरेशन करने में सक्षम हैं। लगातार अभ्यास और अनुशासन ने इन्हें गुरिल्ला युद्ध में बेहद दक्ष बना दिया है।
डीआरजी और बस्तर फाइटर्स की सफलता का आधार स्थानीय भागीदारी और अन्य सुरक्षाबलों के साथ मजबूत समन्वय है। एसटीएफ, कोबरा, सीआरपीएफ, बीएसएफ, आइटीबीपी और अन्य बलों के साथ संयुक्त अभियानों ने माओवादियों के प्रभाव को तेजी से कम किया है।-सुंदरराज पी. , आइजीपी बस्तर