डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। 26 जनवरी 1950 की सुबह कोई आम सुबह नहीं थी। आसमान में कोहरा छाया था, हवा भी सर्द थी, लेकिन उसी दिन इतिहास के पन्नों पर भारत का सुनहरा ‘सूर्योदय’ दर्ज हुआ। आजादी के ठीक 2 साल 5 महीने 11 दिन बाद उस सुबह सिर्फ संविधान लागू नहीं हुआ था, बल्कि देश की पहचान से जुड़े नाम, नोट, मुहर, ध्वज और प्रतीक भी बदल गए थे।
उस दिन सरकारी दफ्तरों और अदालतों की मुहरों से ब्रिटिश राज का ठप्पा मिटा दिया गया। सेना के नाम से ‘रॉयल’ शब्द हटाया गया। वर्दियों से ब्रिटिश क्राउन उतार दिया गया।
नोटों पर छपी महारानी की तस्वीर इतिहास बन गई। ‘By Order of His Majesty the King…’ वाले लेटरहेड अब किसी काम के नहीं रहे। ‘God Save the queen’ के गीत भी धीरे-धीरे भुला दिए गए।

धीरे-धीरे भारतीय सेना की वर्दी, सरकारी दस्तावेजों, मुहरों और नोटों पर अशोक स्तंभ चमकने लगा। ब्रिटिश फ्लैग यूनियन जैक की जगह देशभर में तिरंगा लहराने लगा। लेटरहेड पर पहली बार ‘Government of India’ लिखा गया। राष्ट्रगान के रूप में ‘जन गण मन’ और राष्ट्रगीत के रूप में ‘वंदे मातरम्’ को अपनाया गया।
संविधान, अशोक स्तंभ, ‘सत्यमेव जयते’ और तिरंगा, यह केवल बदलाव नहीं थे, बल्कि यह घोषणा थी कि अब भारत एक नागरिकों का गणराज्य है। अब यहां किसी व्यक्ति का आदेश नहीं, बल्कि संविधान का शासन चलेगा।
सवाल से शुरू हुआ था बदलाव
भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद तो हो गया था, लेकिन सेना की वर्दी, मुद्रा, मुहर, ध्वज और सरकारी दस्तावेज अब भी औपनिवेशिक अतीत की छाप ढो रहे थे। आजादी के तुरंत बाद एक संविधान सभा में अब सवाल उठा कि क्या आजाद भारत ‘रॉयल क्राउन’ के प्रतीक से भी चलेगा?
जवाब आया- नहीं। रॉयल क्राउन, यूनियन जैक और औपनिवेशिक प्रतीक (Colonial Symbol) स्वतंत्र भारत में नहीं रहेंगे। भारत के अपने स्वदेशी और सभ्यतागत प्रतीक होने चाहिए।
खैर, देश की पहचान बदलने में समय लगा। करीब ढाई साल इस बात को तय करने में लगे कि नए भारत का चेहरा ‘ताज’ होगा या ‘अशोक स्तंभ’।

सरदार वल्लभभाई पटेल का मानना था
किसी भी राष्ट्र के प्रतीक जनता के आत्म गौरव का आधार होते हैं। अगर हम आजादी से पहले के प्रतीकों के साथ देश चलाएंगे तो जनता के मन से दासता नहीं जाएगी।
राष्ट्रीय प्रतीक के लिए किन नामों का मिला था प्रस्ताव?
देश की पहचान बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। फिर बहस शुरू हुई कि रॉयल क्राउन बैज को किस प्रतीक से बदला जाए। कुछ नेता धार्मिक प्रतीक जैसे- धर्मचक्र, गाय, देवी-देवता की तस्वीर और ओम (ॐ) चाहते थे तो कुछ आधुनिक प्रतीक जैसे- फैक्ट्री, ग्लोब, जनता की आकृत(कुछ लोगों की भीड़), हाथ मिलाने (Handshake) और बिजली व डैम का प्रस्ताव दिया।
पंडित नेहरू, सरदार पटेल और डॉ. भीम राव अंबेडकर जैसे नेताओं ने इन सभी सुझावों को खारिज कर दिया। कहा कि राष्ट्रीय प्रतीक ऐसा हो, जो स्वदेशी, सभ्यता और धर्मनिरपेक्षता को दर्शाए।
नेहरू का कहना था-
राष्ट्रीय प्रतीक के लिए कुछ ऐसा चाहिए तो भारत की प्राचीन संस्कृति और आधुनिक लोकतंत्र दोनों को दर्शा सके।
अंबेडकर का कहना था-
राष्ट्रीय प्रतीक धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक चेतना वाला होना चाहिए। धार्मिक देवी-देवता या पौराणिक चिन्ह नहीं।

इसके बाद कुछ नेताओं ने अशोक स्तंभ, सांची के स्तूप और ताजमहल को राष्ट्रीय प्रतीक बनाने की सिफारिश की। कुछ ने धान, गेहूं की बालियों, हल के साथ बैलों की जोड़ी, हाथी, शेर और बरगद वृक्ष का भी प्रस्ताव दिया।
फिर अशोक स्तंभ का नाम क्यों चुना गया?
अशोक स्तंभ प्राचीन सभ्यता, नैतिक शासन और कानून का प्रतीक था। इसलिए राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर लंबी बहस के बाद नेहरू, पटेल और अंबेडकर समेत सभी नेता ‘अशोक स्तंभ’ के नाम पर एकमत हो गए।
कैसे तैयार हुई राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ की डिजाइन?
राष्ट्रीय प्रतीक के नाम पर सभी नेता एकमत हो चुके थे। अब डिजाइन पर काम शुरू हुआ। देशभर के कला स्कूलों से छात्रों और कला के विशेषज्ञों डिजाइन बनवाए गए, लेकिन कोई डिजाइन रास नहीं आई।
आखिर में प्रख्यात चित्रकार व शांति निकेतन के कला शिक्षक नंदलाल बोस और उनकी टीम की राष्ट्रीय प्रतीक की डिजाइन बनाने को दी गई।
फिर उन्होंने साल 1949 में कागज पर जो अशोक स्तंभ बनाकर दिया, वही आज आप मुद्रा, सरकारी दस्तावेज और पासपोर्ट पर राष्ट्रीय प्रतीक के तौर पर देखते हैं।

अशोक स्तंभ पर क्या है और क्या संदेश देता है?
शीर्ष पर चार शेर हैं। चारों शेर चार दिशाओं – उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की ओर मुख किए हुए हैं। यानी पीठ से पीठ सटाकर खड़े हैं। हालांकि, राष्ट्रीय चिह्न में केवल तीन शेर ही दिखाई देते हैं।
इसके अलावा, अबेकस की पट्टी पर हाथी, दौड़ता हुआ घोड़ा, बैल, शेर और धर्मचक्र बना है। नीचे लिखा है- ‘सत्यमेव जयते’। यानी सत्य की ही विजय होती है।
26 जनवरी 1950 को क्या-क्या बदला?
ठीक 76 साल पहले 26 जनवरी को भारत का संविधान लागू हुआ। ब्रिटिश शासन के सभी प्रतीक हटाए गए और भारत ने अशोक स्तंभ को अपने राष्ट्रीय प्रतीक (State Emblem of India) को आधिकारिक तौर पर अपनाया। रॉयल एम्बलम को हटा दिया।

भारतीय सेना और पुलिस में क्या बदलाव हुआ?
26 जनवरी, 1950 को भारतीय सेना के बैज के साथ-साथ नाम भी बदल गया।
पुराना नाम नया नाम
रॉयल इंडियन आर्मी – इंडियन आर्मी
रॉयल इंडियन नेवी – इंडियन नेवी
रॉयल इंडियन एयर फोर्स – इंडियन एयरफोर्स
इंपीरियल पुलिस – इंडियन पुलिस सर्विस
इंपीरियल सिविल सर्विस – इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस
आजादी से पहले CRPF का नाम क्या था?
बता दें कि आजादी के बाद CRPF का भी नाम बदला। अंग्रेजी सरकार ने रियासतों में कानून व्यवस्था को बनाए रखने और विद्रोह को कुचलने के लिए 27 जुलाई 1939 को क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस (Crown Representative’s Police) गठित की।
आजादी के बाद 28 दिसंबर को इसका नाम बदलकर सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (CRPF) कर दिया गया। 26 जनवरी 1950 को सीआरपीएफ का भी बैज बदला गया था।
इसके अलावा भी कई बदलाव हुए। राष्ट्रीय प्रतीक, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, सरकारी सील, मंत्रालयों के लेटरहेड, पासपोर्ट, राजपत्र (Gazette), न्यायिक मुहर और मुद्रा का भी स्वरूप बदला। इनमें से कुछ बदलाव आजादी के बाद हो गए तो बाकी 26 जनवरी 1950 से लागू हो गए।
पहले –
बाद में-
राष्ट्रीय ध्वज
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत
पहले राष्ट्रगान
बाद में –
राष्ट्रगान – जन गण मन
राष्ट्रीय गीत – वंदे मातरम्
भारतीय मुद्रा में क्या बदलाव हुआ?
पहले
King George VI की फोटो
King Emperor लिखा होता
जैसे-
George V, King Emperor
George VI, King Emperor
बाद में
अशोक स्तंभ
Government of India
भारतीय प्रतीक और भाषाएं

अशोक स्तंभ कब बना था?
जिस अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक के तौर पर 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया, उस स्तंभ को सम्राट अशोक ने 280 ईसा पूर्व बनवाया था। शासन बदला और स्तंभ भी मिट्टी में दबकर कहीं खो गया था।
मिट्टी में किसने खोजा अशोक स्तंभ?
फिर जर्मनी के सिविल इंजीनियर फ्रेडरिक ओर्टेल (Friedrich Oertel) भारत आए। उन्होंने चीनी यात्रियों जैसे- ह्वेनसांग (Xuanzang) और फाहियान (Faxian) की किताबें पढ़ी, जिनमें जिनमें सारनाथ के बारे में लिखा था।
सिविल इंजीनियर फ्रेडरिक ओर्टेल पुरातत्व में रुचि थी। उन्होंने साल 1904–1905 में सरकार के साथ मिलकर खुदाई कराई, जिसमें अशोक स्तंभ का ऊपरी हिस्सा यानी शेर वाला हिस्सा मिला, जो करीब 7 फुट ऊंचा था। जबकि पूरा स्तंभ 40–50 फीट ऊंचा था, लेकिन खुदाई में पूरा स्तंभ खड़ा नहीं मिला, बल्कि टुकड़ों में मिला।

अच्छी बात यह थी कि अशोक स्तंभ का शेर वाला हिस्सा एकदम सही-सलामत मिला था। इस पर जिस तरह से शेर को बारीकी से उभारा गया था, वो कला का नायाब नमूना था। यह स्तंभ वाराणसी में सारनाथ संग्रहालय में रखा हुआ है।