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1960 के रोम ओलंपिक का अधूरा चैप्टर मिल्खा सिंह परिवार की तीन पीढ़ियों से गुज़रा है. रेस ट्रैक से गोल्फ़ कोर्स तक, दिल टूटने से उम्मीद तक.
अब उस उम्मीद को परिवार के सबसे छोटा सदस्य 15 साल के हरजय मिल्खा सिंह आगे बढ़ा रहे हैं.
हरजय ने 2025 का अंत गोल्फ़ जूनियर अंडर-18 कैटेगरी में भारत के नंबर एक खिलाड़ी के रूप में किया.
‘फ़्लाइंग सिख’ के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह रोम में 400 मीटर फ़ाइनल में ओलंपिक पदक से मामूली अंतर से चूक गए थे. ओलंपिक मेडल नहीं जीत पाने का दर्द सारी उम्र मिल्खा सिंह के साथ रहा.
उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह ने उस बात को याद करते हुए कहा, “जब मैं बड़ा हो रहा था, तो मेरे पिता हमेशा 1960 के रोम ओलंपिक में बहुत कम अंतर से पदक हारने की बात करते थे. हालांकि उन्होंने भारतीय खेल इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज करा लिया, लेकिन ओलंपिक पदक हारने का दर्द हमेशा उनके साथ रहा.”
लेकिन मिल्खा सिंह की विरासत को उनके बेटे जीव मिल्खा ने आगे बढ़ाया.
वह भारत के सबसे सफल पेशेवर गोल्फ़र बन गए. उन्होंने साल 2008-09 के दौरान एशियाई टूर पर अपना दबदबा बनाए रखा और अपने गोल्फ़िंग करियर की सर्वश्रेष्ठ विश्व रैंकिंग हासिल की. साल 2009 में रैंकिंग में वो 28वें स्थान पर पहुंचे.
54 साल के जीव मिल्खा ने यूरोपियन, एशियन और जापान टूर जीते हैं और एक समय वह सबसे उच्च रैंकिंग वाले भारतीय गोल्फ़र थे.
लेकिन जीव मिल्खा अपने करियर के सबसे अच्छे दौर के दौरान ओलंपिक खेलों में हिस्सा नहीं ले पाए.
जीव ने कहा, “साल 2008 में जब मैं दुनिया के शीर्ष खिलाड़ियों में से एक था, उस वक्त गोल्फ़ ओलंपिक का हिस्सा होता तो मैं निश्चित रूप से पदक की दौड़ में होता. दुर्भाग्य से उस समय गोल्फ़ ओलंपिक का हिस्सा नहीं था.”
जब 2016 के रियो ओलंपिक में गोल्फ़ को ओलंपिक खेलों में शामिल किया गया, तब तक जीव के करियर का अच्छा दौर गुज़र चुका था.
उन्होंने उस मौके़ को अपने हाथ से जाते हुए देखा जिसका उन्होंने लंबे समय तक इंतज़ार किया था.
लेकिन साल 2026 की शुरुआत मिल्खा परिवार के लिए एक नई उम्मीद लेकर आई है.
बीते साल जीव के बेटे हरजय ने भारत के सबसे होनहार युवा गोल्फ़रों में से एक के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई.
मिल्खा सिंह के परिवार के लिए यह उस यात्रा का अगला चरण है जो कई पीढ़ियों पहले शुरू हुई थी. जीव मिल्खा कहते हैं, “अगर मेरा बेटा ओलंपिक पोडियम पर पहुंचने के मेरे पिता के सपने को पूरा कर सके तो मुझे एक पिता के रूप में बहुत गर्व होगा.”
कोलंबो के साथ परिवार का ख़ास कनेक्शन
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पिछले महीने जीव ने श्रीलंका के रॉयल कोलंबो गोल्फ़ कोर्स में आयोजित इंडियन गोल्फ़ प्रीमियर लीग (आईजीपीएल) इनविटेशनल जीतकर 13 साल के ख़िताब के सूखे को समाप्त किया.
इस जीत के साथ उनका एक अलग कनेक्ट है. जीव ने कहा, “यह वही कोलंबो है जहां मेरे माता-पिता मिले थे और उनका प्यार परवान चढ़ा था. इसलिए इस जीत का और इस जगह का ख़ास कनेक्शन, इसे ख़ास और भावुक बना देता है.”
“2021 में कोविड के दौरान मेरे माता-पिता दोनों के निधन के बाद मेरे लिए खेल पर ध्यान केंद्रित करना बहुत मुश्किल हो रहा था. मैं भावनात्मक रूप से टूट गया था.”
अपने माता-पिता के निधन के बाद मिली यह पहली जीत उनके लिए ख़ास है.
वो कहते हैं, “उनके निधन के बाद यह मेरी पहली जीत है. इसलिए यह जीत मेरे लिए बहुत ख़ास है. मैंने ट्रॉफी को चंडीगढ़ स्थित अपने घर में उनकी तस्वीरों के सामने रखा है.”
इस पल को और भी यादगार बनाने वाली बात यह थी कि हरजय ने अपने पिता के साथ इस टूर्नामेंट में भाग लिया और 18वां स्थान हासिल किया.
जीव ने कहा, “हरजय के साथ खेलना मेरे लिए भी ख़ास था और मेरी जीत ने उसे यह एहसास दिलाया कि उसे अभी लंबा सफ़र तय करना है. मैं चाहता हूं कि आने वाले सालों में वह मुझसे आगे निकल जाए.”

ऐसे गोल्फ़ खेलने लगे हरजय

हरजय ने कहा, “गोल्फ़ से मेरा परिचय मेरी दादी ने कराया, जो मुझे पांच साल की उम्र में चंडीगढ़ गोल्फ़ कोर्स ले गई थीं. अन्य बच्चों की तरह मेरी रुचि कई अलग-अलग खेलों में थी. लेकिन अपने पिता को लगातार गोल्फ़ खेलते देखने के बाद आख़िरकार मुझे गोल्फ़ ही अपना सच्चा जुनून लगा.”
हरजय को धीरे-धीरे अपने परिवार से मिली खेल की विरासत का एहसास होने लगा है.
हरजय कहते हैं, “जब मैं छोटा था तब मुझे अपने परिवार की खेल से जुड़ी विरासत की अहमियत का पूरी तरह से अंदाज़ा नहीं था. क़रीब तीन साल पहले मुझे अपने दादा मिल्खा सिंह और पिता जीव मिल्खा सिंह की खेल की उपलब्धियों का महत्व समझ में आने लगा.”
“मैं इस पारिवारिक खेल विरासत में अपना योगदान देना चाहता हूं. ओलंपिक मेरे दिमाग़ में ज़रूर है, मैं वहां खेलना चाहता हूं और अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिखाना चाहता हूं.”
हरजय द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता जेसी ग्रेवाल से ट्रेनिंग लेते हैं. उनके प्रेरणास्रोत विश्व के नंबर एक खिलाड़ी स्कॉटी शेफ़लर हैं.
जीव ने अपने बेटे की डेवलपमेंट के लिए पूरा प्लान बनाया है.
जीव ने बताया, “हरजय अच्छा कर रहा है और बहुत मेहनती है. उसकी प्रगति मेरी बनाई योजना के मुताबिक हो रही है. उसके अपने कोच हैं जो उसे ट्रेनिंग दे रहे हैं और मैं उसकी कोचिंग प्रक्रिया में दख़ल नहीं दे रहा हूं. हालांकि जैसे-जैसे वह बड़ा होगा मानसिक मज़बूती और दिमागी कसरत के लिए वह धीरे-धीरे मेरे मार्गदर्शन में आएगा,”
“एक पेशेवर गोल्फ़र के रूप में, जिसने पेशेवर जीवन के उतार-चढ़ाव देखे हैं, मेरा मानना है कि मैं गोल्फ़ कोर्स पर, टूर्नामेंट के दौरान और प्रमुख प्रतियोगिताओं की तैयारी में दबाव को संभालने में उनका बेहतर मार्गदर्शन कर सकता हूं.”
जीव ने कहा, “अब हरजय के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने और जूनियर वर्ग के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ ख़ुद को परखने का सही समय है. मैं चाहता हूं कि वह इस साल पीजीए जूनियर प्रतियोगिताओं और जूनियर ब्रिटिश ओपन में खेले.”
‘भाग मिल्खा भाग’
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मिल्खा सिंह पर बनी फ़िल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ ने युवा पीढ़ी को इस महान खिलाड़ी की उपलब्धियों से परिचित कराया है. बहुत कम खिलाड़ियों को मिल्खा सिंह जैसी पहचान मिली है.
हरजय की मां कुदरत ने कहा, “आज भी हरजय ‘भाग मिल्खा भाग’ देखता है. संघर्ष, कठिनाइयों पर जीत और महानता हासिल करने की इस कहानी ने मिल्खा सिंह को भारतीय खेलों के महानतम खिलाड़ियों में से एक बनाया. आज भी हरजय समेत युवा पीढ़ी को प्रेरित करती है. मैंने कई बार उसे फ़िल्म के कुछ हिस्से देखते हुए देखा है और यह उसे अपने खेल करियर में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है.”
हरजय इस साल अपनी कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा देने जा रहे हैं. हालांकि उनका परिवार उन पर पढ़ाई का ज़्यादा दबाव नहीं बनाता है. कुदरत कहती हैं, “हरजय का पूरा ध्यान गोल्फ़ पर है, और मैं उस पर पढ़ाई करने का कोई दबाव नहीं डाल रही हूं.”
रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह की दिल तोड़ने वाली हार के 65 साल बाद, उनके पोते उस सपने को पूरा करने के लिए तैयार हैं जिसे परिवार के पहले ‘मिल्खा’ ने खो दिया था, एक ओलंपिक मेडल.
खेल भले ही एथलेटिक्स से गोल्फ़ में बदल गया हो लेकिन सपना वही है.
चंडीगढ़ में मिल्खा सिंह के घर में क़दम रखते ही दीवारें मानो बोलने लगती हैं. पहली दीवार पर ‘फ्लाइंग सिख’ की तेज़ गति वाली तस्वीरें लगी हैं, साथ ही ऐसे बैज भी हैं जो उन कई ट्रैक की याद दिलाते हैं जिन पर उन्होंने कभी भारत के लिए दौड़ लगाई थी.
पास ही में स्थित एक और दीवार एक अलग ही कहानी बयां करती है. जीव मिल्खा सिंह के गोल्फ़ के सफ़र की. उनके हासिल किए गए खिताबों की. तीसरी दीवार खामोशी से खड़ी है, मानो आने वाले भविष्य के लिए रिज़र्व हो.
कुदरत कहती हैं, “हरजय को अभी लंबा सफ़र तय करना है. उसने अभी अपनी यात्रा शुरू ही की है, इसलिए उसे एक ऐसी दीवार का इंतज़ार करना होगा जो उसकी जीत को दिखाए.”
हरजय के लिए यह यात्रा केवल व्यक्तिगत सफलता के बारे में नहीं है. यह उस कहानी को पूरा करने के बारे में है जो 1960 में रोम के एक ट्रैक पर शुरू हुई थी और जीव के विश्व स्तरीय गोल्फ़ करियर के माध्यम से जारी रही.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.