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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार 28 अगस्त को ये साफ़ कर दिया कि उनका अपने पद से रिटायर होने का कोई इरादा नहीं है.
आरएसएस इस साल अपनी स्थापना के 100 साल पूरे करने जा रहा है. इस मौक़े पर राजधानी दिल्ली में आयोजित तीन दिनों की ‘व्याख्यानमाला’ के आख़िरी दिन सवालों के जवाब देते हुए भागवत ने ये बात कही.
एक और सवाल के जवाब में संघ प्रमुख ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ संघ का कोई झगड़ा नहीं है और मतभेद हो सकते हैं लेकिन मनभेद नहीं है.
लेकिन बीजेपी के बारे में उन्होंने कुछ ऐसा भी कहा जिससे लगा कि वो पार्टी पर तंज़ कर रहे हैं.
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एक और बड़ी बात जो भागवत ने की, वो जुड़ी थी काशी और मथुरा में मंदिर-मस्जिद विवादों से. यहां भी भागवत ने ऐसा कुछ कहा जिसे विवादास्पद की श्रेणी में गिना जा सकता है.
तो आइए, सिलसिलेवार तरीक़े से इन तीनों मुद्दों को समझने की कोशिश करते हैं.
75 साल और रिटायरमेंट
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भागवत ने कुछ ही दिन पहले कहा था कि नेताओं को 75 साल की उम्र हो जाने पर अपने पद को छोड़ देना चाहिए.
इस टिप्पणी से ये सवाल उठा कि क्या भागवत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इशारे से कुछ कह रहे हैं क्योंकि सितंबर के महीने में मोदी 75 साल के हो जायेंगे.
बीजेपी में कई सालों से देखा जा रहा है कि 75 साल की उम्र हो जाने पर नेता चुनाव नहीं लड़ते या अपने पद को छोड़ देते हैं या उन्हें हटा दिया जाता है.
गुरुवार को इस मुद्दे पर बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि 75 साल वाली बात उन्होंने मोरोपंत पिंगले के हवाले से कही थी.
उन्होंने कहा, “75 साल की बात है तो मोरोपंत जी को मैंने कोट किया. वो बड़े मज़ाकिया आदमी थे. वे इतने हाज़िरजवाब थे कि उनकी बातों पर हँसी रोकना मुश्किल हो जाता था. कभी-कभी तो कुर्सी पर बैठे-बैठे उछलने का मन करता था और अनुशासन बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाता था.”
“एक बार हमारे एक कार्यक्रम में जहाँ पूरे भारत से कार्यकर्ता मौजूद थे, उन्होंने 70 वर्ष पूरे किए. हमारे सरकार्यवाह श्री शेषाद्री जी ने उन्हें एक शॉल भेंट की और कुछ बोलने के लिए कहा.”
“उन्होंने कहा कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है, यह शॉल भी ज़रूरी नहीं है. लेकिन फिर वे खड़े हुए और बोले: ‘आपको लग सकता है कि आपने मेरा सम्मान किया है, लेकिन मैं जानता हूँ कि जब किसी को शॉल दी जाती है, तो उसका मतलब होता है कि अब आपकी उम्र हो गई है. अब आप आराम से कुर्सी पर बैठिए और देखिए आगे क्या होता है’. ऐसी हाज़िरजवाबी थी उनकी.”
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अपनी बात जारी रखते हुए भागवत ने कहा, “उनकी जीवनी का लोकार्पण नागपुर में अंग्रेज़ी में हुआ था और वहां मैं बोल रहा था. मैंने वहां बताया कि वे कितने हाज़िरजवाब थे. वहां मैंने तीन-चार घटनाएं भी साझा कीं.”
“नागपुर के लोग उन्हें बहुत क़रीब से जानते थे, इसलिए वे भी इसका खूब आनंद ले रहे थे. मैंने कभी नहीं कहा कि मैं रिटायर हो जाऊँगा या किसी और को रिटायर होना चाहिए.”
इसके बाद भागवत ने कहा कि संघ में स्वयंसेवकों को काम सौंपा जाता है, चाहे वो उसे करना चाहें या नहीं.
उन्होंने कहा, “अगर मेरी उम्र 80 साल है और संघ कहे कि जाओ शाखा चलाओ, तो मुझे जाना ही होगा. मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी उम्र 75 साल हो गई है, अब मैं रिटायरमेंट का आनंद लेना चाहता हूँ. और अगर मेरी उम्र 35 साल है तो भी संघ कह सकता है कि तुम कार्यालय में बैठो. हम वही करते हैं जो संघ हमें कहता है.”
साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि संघ के लोग जीवन में कभी भी सेवा से निवृत्त होने को तैयार हैं और जब तक संघ चाहे, तब तक काम करने को भी तैयार हैं.
‘ये एक जुमला था’
तो क्या आरएसएस प्रमुख अपनी बात से पलट गए हैं? क्या उन्होंने इस मुद्दे पर यू-टर्न ले लिया है.
वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं 75 साल पर रिटायरमेंट की बात एक जुमला था और अब जो हुआ है वो यू-टर्न नहीं बल्कि सुविधानुसार अपनी बात को बदल लेने जैसा है.
वह कहती हैं, “ये भी एक तरीक़े से राजनीति करने वाले लोग हैं. ख़ुद को ग़ैर-राजनीतिक कह कर सुविधा अनुसार बातें कही जाती हैं-चाहे वो आरक्षण के मसले पर हो, चाहे वो हिंदू राष्ट्र के मसले पर हो, चाहे ये 75 साल के रिटायरमेंट की बात हो. कभी ‘अच्छे दिन’ आते हैं, कभी आप कह देते हैं कि 15-15 लाख रुपये आपके खाते में जायेंगे. तो ये भी इसी तरीक़े का बयान था.”
सुमन गुप्ता कहती हैं कि ये मुद्दा चर्चा का विषय बन गया लेकिन जब यह बात चल रही थी, तब भी किसी के दिमाग़ में ये नहीं आया होगा कि सितंबर में भागवत या प्रधानमंत्री मोदी रिटायर हो जायेंगे.
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी आरएसएस और बीजेपी पर क़रीबी नज़र रखते हैं.
उनके मुताबिक़ मोरोपंत पिंगले से जुड़ी बात करते हुए जब भागवत ने 75 साल में रिटायरमेंट की बात की थी, तो राजनीति समझने वाले लोगों को लगा कि वो प्रधानमंत्री मोदी की तरफ इशारा कर रहे हैं.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, “सितंबर में ख़ुद मोहन भागवत 75 साल के हो रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी भी. अब बीजेपी और संघ में कोई नियम तो लिखा हुआ नहीं है. संघ में तो सरसंघचालक होते हैं, वो आजीवन होते हैं या वो रिटायर होना चाहें तो वो अपने हिसाब से हो सकते हैं.”
“संघ का शताब्दी वर्ष है. तो कोई भी यह उम्मीद नहीं कर रहा कि मोहन भागवत सरसंघचालक के पद से अभी रिटायर होंगे, कम से कम एक साल तो शताब्दी वर्ष ही चल रहा है.”
त्रिवेदी कहते हैं कि जब बात प्रधानमंत्री की आई तो ये साफ़ है कि उनके पिछले कार्यकाल में कई ऐसे लोगों को मंत्री के पद से हटा दिया गया था, जिन्होंने 75 साल पूरे कर लिए थे.
“तो ये माना गया कि इससे यह संदेश दिया जा रहा है कि जिनकी उम्र ज़्यादा हो गई है, उनको रिटायर कर दिया जाए. एक मार्गदर्शक मंडल बनाया गया था जिसमें आडवाणी जी समेत कई लोगों को रखा गया.”
“बीजेपी हमेशा कहती रही कि एक जनरेशनल (पीढ़ी का) चेंज करना चाहिए. जो नई पीढ़ी है उसको आगे आने देना चाहिए. तो इसका मतलब होता है कि पुरानी पीढ़ी के लोग जायेंगे तभी नई पीढ़ी के लोग आएंगे.”
अपनी बात जारी रखते हुए त्रिवेदी कहते हैं, “लेकिन पूरी भारतीय जनता पार्टी और संघ यह मानता है कि नरेंद्र मोदी तो ब्रैंड वैल्यू हैं पार्टी के और अगर मार्केटिंग सेंस में देखा जाए तो जो ब्रैंड चलता हो उसे नहीं बदला जाता.”
“75 साल का जो मैसेज है वो ये है कि अगर आप काम भी नहीं कर रहे और फिर भी आप बने हुए हैं 75 की उम्र के बाद भी, तो आपको रिटायर हो जाना चाहिए. अगर आप काम कर सकते हैं और आप की ब्रैंड वैल्यू है तो बदलाव की संभावना नहीं देखी जा सकती.”
विजय त्रिवेदी के मुताबिक़ इस पूरी चर्चा में नरेंद्र मोदी एक अपवाद हैं.
वे कहते हैं, “नरेंद्र मोदी के भरोसे तो पूरी पार्टी चल रही है, सरकार चल रही है तो वो तो अपवाद भी होंगे, उनको बदलना और मार्केटिंग सेंस में भी समझदारी नहीं लगती. मोहन जी अगर ये कहते है की 75 साल पर रिटायर होना चाहिए तो सबसे पहले तो उनको ख़ुद होना पड़ता न रिटायर? मतलब वो अपना उदाहरण देकर ही कर सकते थे.”
वो कहते हैं कि अगर मोहन भागवत 75 साल के होने पर अपना पद छोड़ देते तो बिना कुछ कहे ही प्रधानमंत्री मोदी पर एक राजनीतिक दबाव बनता.
“उससे बीजेपी की पूरी राजनीतिक व्यवस्था एकदम गड़बड़ हो जाती. आज तो पूरी लीडरशिप वहां चल रही है तो क्या कोई संघ का प्रमुख चाहेगा कि अपना ही घर खराब कर ले?”
बीजेपी पर तंज़?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले कुछ समय से संघ और बीजेपी के बीच कुछ मुद्दों को लेकर तनातनी चल रही है.
साल 2024 के लोक सभा चुनावों में जब बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो माना गया कि संघ ने बीजेपी के लिए उस तरह से ज़मीनी स्तर पर काम नहीं किया जिसकी उम्मीद बीजेपी कर रही थी.
पिछले लोकसभा चुनाव के बीच ही बीजेपी नेता जेपी नड्डा के उस बयान से भी खलबली मच गई थी, जिसमें उन्होंने बीजेपी के सक्षम होने और उसे आरएसएस की ज़रूरत न होने की बात कही थी.
हालांकि नड्डा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए संघ ने इस मामले को एक ‘पारिवारिक मामला’ बताया था और कहा था कि संघ ऐसे मुद्दों पर सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं करता.
पिछले कई महीनों से बीजेपी के नए अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी की वजह भी संघ और बीजेपी के बीच चल रहे मतभेदों को माना जा रहा है.
गुरुवार को जब मोहन भागवत से संघ और बीजेपी के रिश्तों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनका सरकार के साथ अच्छा तालमेल है “लेकिन कुछ व्यवस्थाएं हैं जिनमें अंदरूनी विरोधाभास होते हैं.”
उन्होंने कहा, “अगर कुर्सी पर बैठा व्यक्ति पूरी तरह हमारे पक्ष में भी हो, तो भी उसे काम करना होता है और वह जानता है कि क्या-क्या बाधाएं हैं. हो सकता है वह काम कर पाए, हो सकता है नहीं कर पाए. हमें उसे स्वतंत्रता देनी होगी.”
“कहीं कोई झगड़ा नहीं है. दोनों कभी टकराव की स्थिति में नहीं होते. वे सच्चाई को जानने की कोशिश करते हैं और उसमें थोड़ा संघर्ष होता है. इन सब बातों से ऐसा लगता है कि कोई संघर्ष या झगड़ा है. संघर्ष हो सकता है, लेकिन झगड़ा नहीं है.”
“लक्ष्य एक ही है- हमारे देश का भला, हमारे लोगों का भला. अगर यह समझ बनी रहे, तो तालमेल हमेशा बना रहता है. और हमारे स्वयंसेवकों में यह समझ है.”
भागवत ने ये भी कहा कि ‘मतभेद के विचार कुछ हो सकते हैं, मनभेद बिल्कुल नहीं है.’
इसके बाद भागवत उस बात पर आए कि क्या बीजेपी में होने वाले फ़ैसलों को संघ ही तय करता है.
उन्होंने कहा, “सब कुछ संघ तय करता है, यह पूरी तरह से ग़लत बात है. यह हो ही नहीं सकता क्योंकि हम इतने दिनों से… मैं 50…60 साल से शाखा चला रहा हूँ, तो कोई शाखा के बारे में मुझे सलाह दे तो मैं एक्सपर्ट हूँ, लेकिन वो राज्य चला रहे हैं अनेक वर्षों से, तो राज्य के बारे में एक्सपर्ट वो हैं.”
“मेरी एक्सपर्टीज़ (विशेषज्ञता) वो जानता है, उसकी एक्परटाइज मैं जानता हूँ. तो इस मामले में सलाह तो दे सकते हैं, देखने से भी सीखते हैं लोग,लेकिन डिसीज़न (फ़ैसला) तो उस फील्ड में उनका है, इस फील्ड में हमारा है.”
इसके बाद जो मोहन भागवत ने कहा उसे बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी से जोड़ कर देखा जा रहा है.
इस मुद्दे पर अपनी बात ख़त्म करते हुए उन्होंने कहा, “इसलिए हम तय नहीं करते, (अगर) हम तय करते… (तो) इतना समय लगता क्या? हम नहीं करते, हमको करना नहीं है. टेक योर टाइम (आप अपना वक़्त लीजिए). हमको कुछ कहना नहीं है.”
‘बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में देरी से संघ खुश नहीं’
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जिस वक़्त मोहन भागवत ने ये बात कही उस वक़्त विज्ञान भवन में मौजूद लोगों का एक ज़ोरदार ठहाका सुनाई दिया.
उस वक़्त विजय त्रिवेदी वहां मौजूद थे.
वो कहते हैं, “इस बात को कहते हुए उन्होंने जो पॉज़ (विराम) दिया है वो बहुत महत्वपूर्ण है. और वो तंज़ के साथ है. मुझे लगता है कि संघ ने कहा कि हमने जो बताया वो आपको नहीं करना है, या आप उससे सहमत नहीं हैं, तो जो मर्ज़ी है वो करो. वो तंज़ है. और संघ ये भी बता रहा है कि वो इस बात से बहुत खुश नहीं है. लेकिन बहुत बार होता है कि घर में भी बच्चे भी बात नहीं मानते हैं तो आप कहते हैं तुम्हारी जो मर्ज़ी है कर लो, हमने तुम्हें समझा दिया.”
तो क्या ये बात बीजेपी के अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी से जुड़ी हुई है?
विजय त्रिवेदी कहते हैं, “एक बात तो साफ़ है कि संघ और बीजेपी में इस बात को लेकर विवाद बना हुआ है. अध्यक्ष पद बड़ा है. बाक़ी बातें तो हो जाती हैं.”
“देखिए शीर्ष पर ही तो सबसे महत्वपूर्ण बात है, बाक़ी तो किसी को जनरल सेक्रेटरी बनाना…नहीं बनाना, मंत्री बनाना… नहीं बनाना तो चलता रहता है. वो बड़ा मुद्दा नहीं होता. जैसे सरकार में प्रधानमंत्री बनाना, वो महत्वपूर्ण बात है.”
“मैं समझता हूँ कि भागवत के बयान का मतलब है कि संघ और बीजेपी में अध्यक्ष को लेकर सहमति नहीं बनी और संघ उससे खुश नहीं है.”
सुमन गुप्ता के मुताबिक बिना संघ के प्रभाव के बीजेपी में कोई प्रमुख पद तय नहीं होता है.
उनके मुताबिक़ महत्वपूर्ण पदों पर संघ की पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति का होना एक प्राथमिक शर्त होती है.
वह कहती हैं, “चाहे राजस्थान के मुख्यमंत्री की बात हो, या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की बात हो या छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की बात हो, तो उनकी पृष्ठभूमि क्या है?”
सुमन गुप्ता कहती हैं कि संघ और बीजेपी एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर काम करते हैं.
वह कहती हैं, “अगर संघ तय नहीं करता तो भी प्रभाव तो रखता है ना? यह होगा, यह तो नहीं तय करते लेकिन ये नहीं होगा, ये तो तय करते हैं ना? अगर ऐसा न होता तो (बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में ) इतने दिनों तक खिचड़ी पकती क्यों नहीं? ये बीरबल की खिचड़ी जो पक रही है, तो ये क्यों नहीं पक पा रही.”
काशी-मथुरा पर बड़ी बात?
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आरएसएस प्रमुख से पूछा गया कि उन्होंने अतीत में सार्वजनिक रूप से कहा था कि संघ ने राम मंदिर के मुद्दे पर चले आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन काशी-मथुरा के बारे में संघ की ऐसी कोई योजना नहीं है तो क्या संघ प्रमुख के नाते वो अपने फ़ैसले पर अटल हैं या इसमें कोई बदलाव है?
इसके जवाब में मोहन भागवत ने कहा, “आंदोलन में संघ जाता नहीं. एकमात्र आंदोलन राम मंदिर था, जिसमें हम जुड़े. जुड़े इसलिए, उसको आख़िर तक ले गए. अब बाक़ी आंदोलन में संघ जाएगा नहीं.”
इसके बाद जो उन्होंने कहा वो दिलचस्प है.
भागवत ने कहा, “लेकिन हिंदू मानस में काशी, मथुरा, अयोध्या तीनों का महत्व है. दो जन्मभूमि हैं, एक निवास स्थान है तो हिंदू समाज इसका आग्रह करेगा. और संस्कृति और समाज के हिसाब से संघ इस आंदोलन में नहीं जाएगा लेकिन संघ के स्वयंसेवक जा सकते हैं, वो हिंदू हैं.”
अपनी बात को जारी रखते हुए भागवत ने कहा, “लेकिन इन तीन को छोड़कर मैंने कहा है हर जगह मंदिर मत ढूंढो, हर जगह शिवलिंग मत ढूंढो. मैं अगर ये कह सकता हूँ- हिंदू संगठन का प्रमुख जिसको स्वयंसेवक प्रश्न पूछते ही रहते हैं- तो थोड़ा इतना भी होना चाहिए… चलो भाई तीन की ही बात है न. ले लो. ये क्यों न हो. ये भाईचारे के लिए एक बहुत बड़ा कदम आगे होगा.”
‘झंडा हमारा न हो, बंदा हमारा हो’
इन बयानों का क्या मतलब निकाला जाए? क्या भागवत मुस्लिम पक्ष को ये संदेश दे रहे हैं कि काशी और मथुरा के मामलों में वो हिंदू पक्ष से किसी विवाद में न पड़ें.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, “ये तो मैसेज है ही साफ़-साफ़. वो कह रहे हैं मुझ पर हिंदू संगठन के अध्यक्ष होने या लीडर होने के बाद दबाव बना हुआ है और यह सच है कि उन पर स्वयंसेवकों का दबाव है.”
“मुस्लिम समाज के लिए तो वो कह ही रहे हैं इसमें तो कोई कंफ्यूजन नहीं है कि आप इस पर झगड़ा मत करो ये दो भी आप दे दो. लेकिन मुझे लगा कि उन्होंने एक नया रास्ता खोला है कि अब स्वयंसेवक अगर इस पर आंदोलन चलाना चाहे तो चला लें. ये मुझे एक अलग तरीक़े की महत्वपूर्ण बात लगती है. उनका मतलब ऐसा है कि ‘झंडा हमारा नहीं हो लेकिन बंदा हमारा हो’.”
त्रिवेदी कहते हैं कि काशी-मथुरा का मसला सिर्फ़ मंदिर का नहीं, बल्कि पूजा स्थलों के क़ानून का है.
वह कहते हैं, “तो प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट पर सरकार क्या करना चाहती है उसके लिए भी सरकार के लिए उन्होंने एक दबाव बना दिया है. यह सोचने के लिए एक मुद्दा दे दिया है कि आप इस पर विचार करें कि क्या करना है. आंदोलन के लिए उन्होंने अप्रूवल दे दिया है कि स्वयंसेवक अगर जाना चाहते हैं तो चले जाएं. तो इसका मतलब है अनुमति है, आप करना चाहे आंदोलन तो कर लें.”
सुमन गुप्ता के मुताबिक़ ये कोई सांस्कृतिक या धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि ‘शुद्ध राजनीतिक मुद्दा’ है.
वह कहती हैं, “जब-जब इस राजनीतिक मुद्दे को धार्मिक चाशनी में लपेटने की ज़रूरत पड़ेगी, जब-जब एक ख़ास पार्टी को राजनीतिक ज़रूरत पड़ेगी, यह सब चीजें होती रहेंगी.”
तो सवाल ये है कि क्या संघ अपने और अपने स्वयंसेवकों के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा बना सकता है?
सुमन गुप्ता कहती हैं, “संघ बिना स्वयंसेवकों के अपने आप में क्या है? वो ख़ुद को एक सांस्कृतिक संगठन कहते हुए भी राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए काम कर रहे हैं और वो करते आए हैं.”
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