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बीते कुछ दिनों से बनारस के गांवों में कुछ नारों की गूंज सुनाई दे रही थी.
इनमें ‘मनरेगा बहाल करो, कौन बनाता हिन्दुस्तान- भारत का मज़दूर किसान, कौन खिलाता हिन्दुस्तान- भारत का मज़दूर किसान, हल्लाबोल-हल्लाबोल, ‘वीबी जी रामजी’ काला कानून वापस लो’ जैसी मांंग शामिल है.
जिस तरफ़ से युवाओं की साइकिल का काफिला गुज़र रहा था उन इलाकों में हलचल का माहौल था और ये लोग सरकार बदलने की मांग और सरकार पर तानाशाही के आरोप लगाते जा रहे थे.
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार साल 2005 में मनरेगा क़ानून लेकर आई थी जिसके तहत ग्रामीण इलाक़े के परिवारों को साल में 100 दिन रोज़गार की गारंटी थी.
इसके बीस साल बाद केंद्र सरकार ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोज़गार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘वीबी- जी राम जी’ क़ानून लेकर आई है. नए अधिनियम में साल में 125 दिन रोज़गार देने का प्रस्ताव है.
मनरेगा के प्रावधानों के मुताबिक़ मज़दूरों को दी जाने वाली मज़दूरी का पूरा खर्च केंद्र सरकार उठाती थी, जबकि सामान वगैरह का खर्च राज्य सरकारें एक निश्चित अनुपात में उठाती थीं. इसके अलावा प्रशासनिक ज़िम्मेदारी में राज्य सरकार की बड़ी भूमिका है.
नए कानून के मुताबिक़ इसके तहत होने वाले कुल खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी जबकि 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार उठाएगी. जबकि पहले (मनरेगा में) राज्यों का ख़र्च क़रीब 10% ही था.
नए प्रावधान के मुताबिक़ पूर्वोत्तर के राज्यों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार इसके तहत होने वाला 90 फ़ीसदी ख़र्च ख़ुद उठाएगी.
इन्हीं बदलावों सबसे ज़्यादा विरोध किया जा रहा है और इसी मक़सद से ये युवा साइकिल यात्रा पर निकले.
यह कोई चुनावी रैली नहीं थी, न ही किसी पार्टी का मार्च था. यह उन 15 युवाओं की यात्रा थी जो खुद को गांधीवादी विचारधारा से जोड़ते हैं.
इन युवाओं की ‘मनरेगा बचाओ यात्रा’ 17 जनवरी को गोरखपुर के चौरी-चौरा से शुरू हुई थी. करीब 1200 किलोमीटर की यह यात्रा गोरखपुर, देवरिया, बलिया, मऊ और गाजीपुर होते हुए वाराणसी पहुंची.
इस यात्रा का उद्देश्य मनरेगा के कानून में किए गए बदलावों और नए कानून ‘वीबी जी राम जी’ के ख़िलाफ़ था लोगों को जागरूक कर ग्रामीण मज़दूरों को संगठित करना था.
यात्रा में शामिल लोगों के मुताबिक़ चौरी-चौरा से यह यात्रा इसलिए शुरू की गई क्योंकि यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संसदीय क्षेत्र था और बनारस में इसलिए समापन कर रहे हैं क्योंकि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है.
यात्रा के 32वें दिन 17 फ़रवरी को दोपहर दो बजे वाराणसी के कचहरी स्थित अंबेडकर प्रतिमा पर एक दिवसीय उपवास पर बैठे जिसका समापन 18 फ़रवरी दोपहर दो बजे हुआ.
यात्रा में शामिल नोएडा के राजू कुमार बताते हैं, “सोशल मीडिया से मुझे इस यात्रा के बारे में पता चला. मै अपनी नौकरी छोड़कर 20 दिन से इस यात्रा में शमिल हूँ. हमारी बात मुख्यधारा में आती ही नहीं है. मैं इसलिए साइकिल यात्रा में शामिल हुआ ताकि हमारी बात आगे तक पहुंचें. जो मैं झेल रहा हूँ उसे आने वाली पीढ़ी न झेले.”
‘रोज़-रोज़ झेलने से अच्छा है एक बार झेल लिया जाए’
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राजू कुमार बिहार के सहरसा ज़िले के रहने वाले हैं. नोएडा में एक फैक्ट्री में लोडिंग-अनलोडिंग का काम करते हैं.
वो कहते हैं, “महंगाई बढ़ रही है लेकिन मजदूरी नहीं बढ़ रही. प्राइवेट सेक्टर में सिक्योरिटी नहीं है. 12 घंटे काम कराओ और कोई डिमांड करो तो निकाल देंगे. हम अभी नौजवान हैं नौकरी छोड़ने का नुकसान झेल लेंगे. महीने का 12000-13000 रुपये मिलते हैं. घर पर दो तीन हज़ार ही भेज पाता हूँ. इस यात्रा में शमिल होने की वजह से दो तीन महीने नहीं भेज पाऊंगा पर कोई बात नहीं. रोज़-रोज़ झेलने से अच्छा है एक बार झेल लिया जाए.”
राजू जैसे ही बनारस विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जेएनयू और कुछ युवा छात्र नेताओं ने मिलकर यह यात्रा शुरू की थी.
मनरेगा बचाओ यात्रा के जोशीले नारे चौराहों, नुक्कड़ों और गांवों में लोगों का ध्यान अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर रहे थे. बीबीसी हिन्दी की टीम 15-16 फरवरी को इस यात्रा में शामिल रही. इस यात्रा में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ भी शामिल हुए थे.
पश्चिमपुर अहरक में आंबेडकर प्रतिमा के पास जब युवाओं की ये टोली नारे लगा रही थी और उस वक़्त इसी गाँव के माया प्रसाद गौतम (55 वर्ष) ने वहां आकर कहा, “तुम लोग लड़ो हम तुम्हारे साथ हैं. हमने तो मनरेगा में पहले बहुत काम किया है. बच्चों की फीस कॉपी-किताब सब इसी से भरा. अब इसमें कहाँ काम मिलता है. अगर 10-12 दिन काम मिला भी तो पैसा कब मिलेगा कोई भरोसा नहीं. हम लोग तो मज़दूर आदमी है अगर पैसा समय से नहीं मिलेगा तो खायेंगे क्या?”
जब यह यात्रा जगदीशपुर की मुसहर बस्ती में पहुंची तो महिलाएं ज्यां द्रेंज से मनरेगा से जुड़ी अपनी समस्याएँ बता रही थीं.
पचपन वर्षीय बेला ने कहा, “सात आठ साल पहले मनरेगा में काम किया था तबसे काम नहीं मिला. उस समय आठ दस दिन जो काम किया था उसका भी पैसा आज तक नहीं मिला. नया कानून पुराना कानून हमें ये सब समझ नहीं आता. हमारा तो पहले भी नुकसान था और अभी भी कुछ पता नहीं काम मिलेगा भी या नहीं.”
यात्रा ही रास्ता है…
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बेला का एक बेटा और एक बेटी है. वह मुसहर समुदाय से आती हैं उनके पास खुद की कोई जमीन नहीं है. इस मीटिंग में शामिल सभी महिलाएं भूमि आवंटन की बात कर रही थीं.
वहीं 32 साल की इंदु देवी ने कहा, “बहुत बार मांग की, धरना दिया पर हमें ज़मीन का एक टुकड़ा तक नहीं मिला. मनरेगा का काम तो कभी मिला ही नहीं. गरीबों की कहाँ सुनवाई होती है.”
इनकी बैठकी में ऐसा नहीं था कि लोग सिर्फ मनरेगा की बात करें. ग्रामीण खासकर महिलाएं शिक्षा,स्वास्थ्य, असुरक्षा, बेरोज़गारी, आवास, पानी, शौचालय और भूमि आवंटन जैसे कई मुद्दों पर अपनी बात रख रहे थे.
दोपहर डेढ़ बजे यह रैली बेलवां गाँव के नट समुदाय में पहुंची.
लंबे समय से नट समुदाय में काम करने वाले प्रेम नट ने कहा, “मनरेगा बचाओ यात्रा हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. हम मुसहर और नट समुदाय के साथ काम करते हैं. काम करा लिया जाता पर इन्हें पैसा नहीं मिलता कई बार 10 दिन काम के बदले 4 दिन का ही पैसा मिलता है. बीच में बिचौलिए बहुत हेराफेरी करते हैं. उसे ही ठीक करने की ज़रूरत थी न कि गरीब जनता को गुमराह करके नये कानून को लाने की थी.”
यहाँ की महिलाओं को सुनने के बाद प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने कहा, “बीस साल पहले देशभर में सालों तक लोगों ने यात्रा निकाली तब यह कानून आया और अब इसे ख़त्म करने की बात हो रही है. मनरेगा एक कानून है जिसने मज़दूरों को बहुत अधिकार दिए थे. लेकिन नये कानून मज़दूरों से अधिकार छीन लिए हैं. वीबी जी राम जी कानून की पूरी शक्ति केंद्र सरकार के पास रहेगी. नये कानून में जो 125 दिन काम देने की बात कही गयी है वो वादा एक प्रोपेगेंडा है.”
उन्होंने आगे कहा, “नेशनल सैम्पल सर्वे की रिपोर्ट भी कहती है कि बीतें वर्षों में मज़दूरों को काफी कम काम मिला है. समय-समय पर जो इस कानून में नई-नई डिजिटल चीजें हुईं उससे मज़दूरों को दिक्कतें हुई हैं. मनरेगा की खामियों को ठीक करने की ज़रूरत थी, 100 दिन काम देना सुनिश्चित करना था न कि 125 दिन का हवाला हेकर उनके अधिकार को खत्म करना था.”
विरोध की संस्कृति को ज़िंदा रखने की कोशिश
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मनरेगा बचाओ यात्रा छह ज़िलों के 250 से ज्यादा गाँव में घूमी है. साइकिल के अलावा इस रैली में एक छोटी गाड़ी भी चल रही थी.
यात्रा में शामिल धनंजय त्रिपाठी ने बीबीसी से कहा, “मनरेगा कानून जब बदलने की बात हुई तो सरकार ने संसद में एकतरफ़ा फैसला सुना दिया. गांधीवादी सोच वाले युवाओं ने 17 जनवरी को रोहित वेमुला को याद करते हुए, महात्मा गांधी को याद करते हुए इस तारीख को चुना था. जनवरी 1948 में गांधी ने अपने जीवन का आख़िरी उपवास किया था.”
उन्होंने आगे कहा, “यह यात्रा 18 फ़रवरी को भले ही औपचारिक तौर पर खत्म हो गई हो पर मज़दूरों के साथ हमारी लड़ाई जारी रहेगी.”
दो दिन तक इस यात्रा के साथ चलते हुए हमें गांव की चौपालों, पंचायत भवनों और बाजारों में एक ही शिकायत बार-बार सुनाई दे रही थी कि मनरेगा में पिछले सालों में काम घटा है और मजदूरी समय पर नहीं मिली.
यात्रा में शामिल प्रियेश पांडेय ने इस यात्रा को शुरू करने के पीछे की वजह बताई.
प्रियेश कहते हैं, “यूपी में पिछले दस सालों से हमने जो महसूस किया है कि सड़कों पर, चौराहों पर, बाजारों में धरने बंद हुए हैं. मेरी 30 साल उम्र है मुझे 2010 का समय याद है जब सड़कों पर मार्च धरना खूब देखने को मिलते थे. अब बहुत कम संगठित यूनियन बचे हैं. हमने इस यात्रा से प्रोटेस्ट की संस्कृति को जिंदा रखने की कोशिश की.”
मनरेगा बचाओ यात्रा कर रहे युवाओं के दिन की शुरुआत सुबह 8 बजे होती थी और 10 बजे ये पहले गांव के लिए निकल पड़ते थे. दिन के चार पांच गांव और बाजार होते हुए शाम 6 बजे ये उस ठिकाने पर पहुंच जाते थे जहां इन्हें रुकना होता था.
जाति और धर्म अलग लेकिन मुद्दा एक
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प्रियेश बताते हैं, “भाजपा, आरएसएस का नारा लगाते हुए हम पूर्वांचल की सड़कों पर उतरे. सत्ता में बैठे लोग यह न भूलें कि अगर विपक्ष शांत रहेगा या मीडिया शांत रहेगी तो आप हमले करते जायेंगे और सड़क से, गलियों से कोई रिस्पॉन्स नहीं आएगा. यह सोचना गलत है कुछ लोग जरूर होंगे, जो रिस्पॉन्स करेंगे. हम वही लोग हैं.”
ऐसा नहीं था कि इस यात्रा में मुश्किलें नहीं आईं. इन्हें जगह-जगह पुलिस प्रशासन ने रोकने की कोशिश की. कुछ गांवों में लोगों ने विरोध किया. कहीं-कहीं इन्हें गांव से बाहर भी निकाला गया. यात्रा भले ही युवाओं ने शुरू की हो लेकिन लड़कियां और महिलाएं भी साइकिल चलाकर इस यात्रा का हिस्सा बनीं.
बनारस में एलजीबीटी समुदाय के साथ काम करने वाली नीति ने कहा, “इस यात्रा में जुड़ने की एक वजह यह भी थी कि हम जिस समुदाय के साथ काम करते हैं उनके माता-पिता भी मनरेगा मज़दूर हैं. इसलिए यह हमारा मुद्दा भी है.”
यात्रा में शामिल युवा पूर्वांचल के अलग-अलग ज़िलों से थे. इनकी जाति और धर्म भी अलग-अलग थे लेकिन इनका मुद्दा एक था.
यात्रा में शामिल तौफ़ीक बेग कहते हैं, “जाति और धर्म के बीच जितना भेदभाव खबरों और सोशल मीडिया पर देखने को मिलता है उतना गांव में नहीं है. हर समुदाय ने खुलकर इस यात्रा का समर्थन किया. क्राउड फंड और जनसहयोग से यह यात्रा सफल हो पाई.”
यात्रा में शामिल मृत्युंजय मौर्या बताते हैं, “सरकार कहती है मनरेगा में काम करने के लिए गांव में मज़दूर नहीं हैं. यह बात सरासर झूठी है. हमारी यात्रा में लोगों ने बताया कि वो गांव में खाली बैठे हैं बहुत कम पैसों में शहरों में काम के लिए पलायन करते हैं फिर सरकार ऐसा क्यों कह रही कि गांव में मज़दूर नहीं.”
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