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वेनेज़ुएला में हुई नाटकीय घटनाओं और उसके बाद अमेरिका में सामने आए घटनाक्रम ने इस बात को लेकर तीखी चर्चा छेड़ दी है कि क्या ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को जबरन सत्ता से हटाते समय क़ानून के दायरे में काम किया.
मादुरो और उनकी पत्नी अब अमेरिका की एक अदालत में हथियार और ड्रग्स तस्करी से जुड़े मामलों का सामना कर रहे हैं.
वहां उन्हें जेल की लंबी सज़ा मिलने की आशंका है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय क़ानून के जानकारों का कहना है कि इस कार्रवाई को अंजाम देने में अमेरिकी अधिकारियों के पास किसी स्पष्ट मिसाल या अंतरराष्ट्रीय क़ानून का मजबूत आधार था या नहीं, यह साफ़ नहीं है.
मादुरो पहले भी खुद को किसी कार्टेल का नेता होने के आरोपों से सख़्ती से इनकार करते रहे हैं.
मादुरो ने अमेरिका पर आरोप लगाया था कि वह ‘ड्रग्स के ख़िलाफ़ जंग’ को बहाना बनाकर उन्हें सत्ता से हटाने और वेनेज़ुएला के विशाल तेल भंडार पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है.
अंतरराष्ट्रीय क़ानून आम तौर पर बल प्रयोग की इजाज़त नहीं देता, सिवाय कुछ सीमित हालात के, जैसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी या वास्तविक आत्मरक्षा की स्थिति में.
सही ठहराने का तर्क
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वेनेज़ुएला पर अमेरिकी हमलों और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पकड़ने के कुछ ही घंटों के भीतर ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने न्यूयॉर्क में दायर आपराधिक आरोपों के आधार पर इस कार्रवाई को सही ठहराने की कोशिश की.
इस क़दम को घरेलू कानून व्यवस्था से जुड़ा मामला बताया गया और इसे “नार्को टेररिज़्म” के ख़िलाफ़ आत्मरक्षा के रूप में पेश किया गया.
इस दलील की अगुवाई अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पैम बॉन्डी ने की. उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर कहा कि मादुरो और उनकी पत्नी ‘जल्द ही अमेरिकी धरती पर अमेरिकी अदालतों में अमेरिकी क़ानून की सख़्ती का सामना करेंगे.’
शनिवार को हुई एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और अमेरिकी जॉइंट चीफ़्स ऑफ़ स्टाफ़ के चेयरमैन जनरल डैन केन ने कहा कि ‘यह छापा अमेरिकी न्याय विभाग की ओर से और उसके अनुरोध पर किया गया क़दम था.’
दरअसल इन बयानों को वेनेज़ुएला पर हमलों और मादुरो को हटाने से पहले कांग्रेस की मंज़ूरी न लिए जाने को लेकर उठी चिंता को कम करने की कोशिश भी माना जा रहा है.
यह मुद्दा ट्रंप प्रशासन के लिए मुश्किल भी बन सकता है.
क़ानून के मुताबिक़, अगर वेनेज़ुएला के ख़िलाफ़ लंबे समय तक अमेरिकी सैन्य अभियान चलाना है, तो राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंज़ूरी चाहिए.
डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को यह संकेत भी दिया कि मादुरो के हटने के बाद अमेरिका कुछ समय तक वेनेज़ुएला को ‘चलाएगा.’
नवंबर में व्हाइट हाउस की चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ सूजी वाइल्स ने वैनिटी फ़ेयर मैगजीन से कहा था कि वेनेज़ुएला में ज़मीनी हमलों के लिए कांग्रेस की मंज़ूरी ज़रूरी होगी, लेकिन उसी महीने ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से इस राय का खंडन किया था.
अमेरिकी संसद को गुमराह करने के आरोपों के बीच रूबियो ने शनिवार को कहा कि ऑपरेशन से पहले अमेरिकी सांसदों को इसलिए जानकारी नहीं दी गई, क्योंकि यह ‘असल में एक क़ानून व्यवस्था से जुड़ा काम’ था, न कि जंग की कार्रवाई.
उन्होंने कहा कि इसे अंजाम देने के लिए “डिपार्टमेंट ऑफ़ वॉर ने डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस का समर्थन किया.”
अपनी बात पर जोर देने के लिए रूबियो ने मादुरो को “अमेरिकी न्याय से फ़रार व्यक्ति” करार दिया.
ट्रंप प्रशासन ‘वॉर पावर्स रेजॉल्यूशन’ का भी हवाला दे सकता है.
यह क़ानून राष्ट्रपति को कांग्रेस की मंज़ूरी लिए बिना 60 दिनों तक सीमित सैन्य कार्रवाई शुरू करने की इजाज़त देता है, साथ में 30 दिन की अतिरिक्त अवधि सैनिकों की वापसी के लिए होती है, बशर्ते 48 घंटे के भीतर कांग्रेस को सूचना दी जाए.
इस ढांचे के तहत राष्ट्रपति यह दावा कर सकते हैं कि वेनेज़ुएला पर हमला शुरू करने के लिए उनके पास क़ानूनी अधिकार था और पहले से कांग्रेस को बताना ज़रूरी नहीं था.
हालांकि अमेरिकी सांसद अब भी आगे की सैन्य कार्रवाई को सीमित करने या ख़त्म करने के लिए वोट कर सकते हैं. आने वाले दिनों में इस पर मतदान होने की उम्मीद है.
क़ानूनी संशय
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इस सप्ताहांत की घटनाएं अंतरराष्ट्रीय क़ानून और नियम आधारित व्यवस्था के लिए क्या मायने रखेंगी, इसको लेकर कुछ एक्सपर्ट्स ने गहरी चिंता ज़ाहिर की है और वेनेज़ुएला को लेकर अमेरिका के क़दमों के क़ानूनी आधार पर भी सवाल उठाए हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि ड्रग्स तस्करी और गैंग हिंसा, जिन्हें ट्रंप प्रशासन ने वेनेज़ुएला में कार्रवाई के लिए बहाना बनाया था, आपराधिक गतिविधियां मानी जाती हैं.
लेकिन ये सैन्य कार्रवाई को जायज ठहराने के लिए मान्य अंतरराष्ट्रीय मानक पर खरी नहीं उतरतीं हैं.
शनिवार की प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप ने वेनेज़ुएला पर अमेरिकी तेल संपदा चुराने का आरोप भी लगाया.
उन्होंने कहा कि जब अमेरिका वेनेज़ुएला को चलाएगा, तो वह इन्हें वापस लेगा, हालांकि उन्होंने इनका कोई ब्योरा नहीं दिया.
अमेरिका की नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी में संवैधानिक क़ानून के प्रोफ़ेसर जेरेमी पॉल ने रॉयटर्स से कहा, “आप यह नहीं कह सकते कि यह एक क़ानून लागू करने से जुड़ा ऑपरेशन था और फिर पलटकर कहें कि अब हमें देश चलाना है. इसका कोई मतलब नहीं बनता.”
लंदन स्थित चैटम हाउस के प्रोफ़ेसर मार्क वेलर का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत बल प्रयोग को राष्ट्रीय नीति बनाना प्रतिबंधित है.
सिर्फ़ उसी मामले में छूट प्राप्त है जब “किसी सशस्त्र हमले का जवाब दिया जाना हो या वजूद ख़त्म होने के संकट से किसी आबादी को सुरक्षित बचाने के लिए” यह ज़रूरी हो.
उनके मुताबिक इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी भी ज़रूरी होती है.
वह लिखते हैं, “स्पष्ट है कि वेनेज़ुएला के ख़िलाफ़ अमेरिका की सशस्त्र कार्रवाई इन शर्तों में से किसी को भी पूरा नहीं करती.”
उन्होंने कहा कि ड्रग्स कारोबार को दबाने में अमेरिकी हित या यह दावा कि मादुरो सरकार मूल रूप से एक आपराधिक ढांचा थी, किसी भी तरह क़ानूनी तर्क नहीं हो सकते.
पनामा का उदाहरण
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कुछ विश्लेषकों का कहना है कि हो सकता है कि ट्रंप और उनके करीबी सहयोगियों ने मादुरो को हटाने के लिए 1989-1990 में पनामा में हुई घटनाओं को एक मॉडल के रूप में देखा हो.
पनामा के बेहद अलोकप्रिय वास्तविक सैन्य शासक मैनुअल नोरिएगा को तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज एच डब्ल्यू बुश के प्रशासन की सैन्य कार्रवाई के बाद सत्ता से हटाया गया था.
उन पर ड्रग्स से जुड़े आरोप लगाए गए थे और उन पर मुकदमा चलाने के लिए उन्हें अमेरिका ले जाया गया था.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ दोनों मामलों में कुछ स्पष्ट समानताएं हैं, जैसे 35 साल पहले अमेरिका ने पनामा नहर पर दबदबा बनाने की कोशिश की थी.
और अब वेनेज़ुएला के तेल क्षेत्रों में अमेरिकी दिलचस्पी साफ़ है. लेकिन इसके बावजूद दोनों स्थितियों में अंतर भी है.
प्रोफ़ेसर मार्क वेलर के अनुसार, तब भी और अब भी वॉशिंगटन ने अमेरिकी हितों पर तात्कालिक ख़तरे की बात कही और आत्मरक्षा के तर्क के आधार पर नोरिएगा को हटाया गया.
अमेरिका के पूर्व राजनयिक जॉन फीली जैसे विश्लेषकों का कहना है कि दोनों मामलों में सबसे बड़ा अंतर यह है कि पनामा में नोरिएगा के हटने के बाद एक लोकप्रिय विपक्ष सत्ता संभालने के लिए तैयार था और वहां स्थायी लोकतांत्रिक बदलाव हुआ.
इसके कुछ समय बाद अमेरिकी सैनिक भी वापस लौट गए.
ट्रंप की इस सप्ताहांत की टिप्पणियां संकेत देती हैं कि वेनेज़ुएला में स्थिति ऐसी नहीं है. वहां मादुरो के हटने के बाद सत्ता संभालने के लिए कोई विपक्ष तैयार खड़ा नहीं दिखता.
अब आगे क्या?
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अब अगला क़दम मादुरो के ख़िलाफ़ मुकदमे की प्रक्रिया का आगे बढ़ना माना जा रहा है, चाहे वेनेज़ुएला से न्यूयॉर्क लाने के तरीक़े कितने ही विवादित और विवादास्पद क्यों न रहे हों.
प्रोफ़ेसर मार्क वेलर के अनुसार, अमेरिकी अदालतें तथाकथित केर फ्रिस्बी सिद्धांत का पालन करती हैं. इसके तहत यह मायने नहीं रखता कि किसी संदिग्ध को अमेरिकी अदालत के सामने कैसे पेश किया गया. अगर उसे इस प्रक्रिया में गंभीर यातना नहीं दी गई है, तो “गैरक़ानूनी सशस्त्र हस्तक्षेप या अपहरण” के बाद भी मुकदमा चलाया जा सकता है.
विश्लेषकों का यह भी कहना है कि अगर वेनेज़ुएला में की गई कार्रवाई को लेकर अमेरिका को किसी तरह के नतीजों का सामना नहीं करना पड़ा, तो इसका दुनिया के दूसरे सुलगते संघर्षों पर बहुत गंभीर असर हो सकता है.
खास तौर पर संयुक्त राष्ट्र की उस क्षमता पर सवाल खड़े होंगे, जिसके जरिए वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम आधारित व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश करता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.