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अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रंप के पास दोबारा आने के बाद पिछले क़रीब 75 सालों से जो वर्ल्ड ऑर्डर था, वो बदलता दिख रहा है.
वर्ल्ड ऑर्डर का मतलब उस व्यवस्था से है, जो दूसरे विश्व युद्ध के बाद बना था. दूसरे विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र बना था और वैश्विक व्यवस्था के संचालन में इसकी अहम भूमिका थी.
अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में इस बात को प्रमुखता से शामिल किया था कि कोई भी देश किसी दूसरे देश के भूभाग को जबरन अपने में नहीं मिला सकता है.
इस तरह की सैन्य कार्रवाई को अपराध के दायरे में रखा गया था. अमेरिका ने इसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 1950 में उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ अपने सैनिकों को भेजा था और 1991 में इराक़ी आक्रामकता से लड़ने के लिए सैनिकों की तैनाती की थी.
जाने-माने पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बारीक समझ रखने वाले पत्रकार फ़रीद ज़कारिया ने सीएनएन के अपने शो में कहा, ”1816 से 1945 के बीच एक दूसरे देश के भूभाग पर जबरन क़ब्ज़े की 150 से ज़्यादा घटनाएं हुईं. लेकिन 1945 के बाद एक वैश्विक व्यवस्था बनी, जिसे संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका का संरक्षण हासिल था और इस व्यवस्था के ज़रिए एक दूसरे के क्षेत्र पर नियंत्रण को रोक दिया गया. अब डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की इस उपलब्धि को पीछे छोड़ चुके हैं.”
डोनाल्ड ट्रंप अब नया वर्ल्ड ऑर्डर बना रहे हैं. ट्रंप को लग रहा है कि पुराने वर्ल्ड ऑर्डर में अमेरिका को नुक़सान हो रहा है.
यूक्रेन पर रूस के हमले की तीसरी बरसी पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस हफ़्ते रूसी हमले की निंदा के लिए एक प्रस्ताव लाया गया था लेकिन अमेरिका ने उत्तर कोरिया, बेलारूस और सूडान की पंक्ति में खड़े होकर रूस का पक्ष लिया.
दूसरी तरफ़ ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी, कनाडा, इटली और जापान के साथ ज़्यादातर देशों ने रूस का विरोध किया.
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भारत ने क्यों नहीं दिखाया वैसा उत्साह
लेकिन दिलचस्प है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में फ़्रांस और ब्रिटेन ने रूस की निंदा करने वाले प्रस्ताव का खुलकर समर्थन किया लेकिन जैसे ही अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस की बिना निंदा किए यूक्रेन में जारी जंग ख़त्म करने का प्रस्ताव लाया तो फ़्रांस और ब्रिटेन ने वीटो नहीं किया.
ब्रिटेन और फ़्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और दोनों चाहते तो अमेरिका के इस प्रस्ताव को वीटो कर सकते थे लेकिन दोनों वोटिंग से बाहर रहे.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, चीन, रूस, फ़्रांस और ब्रिटेन. इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य हैं, जो हर महीने बदलते रहते हैं. अमेरिका का यह प्रस्ताव 10 वोटों से पास हो गया लेकिन ब्रिटेन और फ़्रांस के अलावा यूरोप के तीन और देश ग्रीस, डेनमार्क और स्लोवेनिया वोटिंग से बाहर रहे. अगर फ़्रांस और ब्रिटेन चाहते तो अमेरिकी प्रस्ताव को ब्लॉक कर सकते थे.
ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बने मुश्किल से एक महीना हुआ है और वह अमेरिका को उस खे़मे के क़रीब ले जा रहे हैं, जो दशकों से दुश्मन माना जाता रहा है. वहीं अमेरिका को लेकर उन देशों में अविश्वास बढ़ रहा है, जो पारंपरिक रूप से दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोस्त रहे हैं.
दिलचस्प है कि जो चीन और भारत रूस के दोस्त माने जाते हैं, उनके व्यवहार में भी रूस को लेकर ट्रंप की तरह क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है.
यूएन महासभा में रूस की निंदा वाले प्रस्ताव पर वोटिंग से चीन और भारत बाहर रहे जबकि अमेरिका ने रूस के पक्ष में मतदान किया. यानी चीन और भारत की विदेश नीति में रूस को लेकर एक तरह की निरंतरता है जबकि अमेरिका के रुख़ में अविश्वसनीय बदलाव आया है.
अमेरिकी एन्टरप्राइज़ इंस्टिट्यूट के फेलो और वॉल स्ट्रीट जर्नल के कॉलमिस्ट सदानंद धुमे ने रूस के समर्थन में अमेरिका के जाने पर लिखा है, ”एक वैकल्पिक दुनिया में भारत की अपनी जगह सुरक्षित है. अमेरिका पागल हो सकता है लेकिन भारत एक हद से ज़्यादा रूस के समर्थन में नहीं आ सकता है.”
सदानंद धुमे की इस टिप्पणी पर थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूट की सीनियर फेलो तन्वी मदान ने लिखा है, ”भारत अब भी स्थिर है. भारत नहीं चाहता है कि क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन या विस्तारवाद को समर्थन या मान्यता दी जाए. भारत यूरोप के साथ भी सकारात्मक संबंध बनाकर रखना चाहता है.”
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर संजय कुमार पांडे से पूछा कि जिस तरह से ट्रंप रूस को लेकर उत्साह दिखा रहे हैं, वैसा उत्साह भारत क्यों नहीं दिखा रहा है?
इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर संजय कुमार पांडे कहते हैं, ”ट्रंप क्या करना चाहते हैं, इसे अभी सपाट तरीक़े से नहीं समझा जा सकता है. रूस के प्रति ट्रंप की उदारता स्थायी है या अस्थायी इसे अभी समझा जाना बाक़ी है. हम इसे इतना सपाट नहीं देख सकते हैं कि ट्रंप रूस से दोस्ती करना चाहते हैं. भारत और रूस का संबंध ऐतिहासिक है और यह ट्रंप या बाइडन के रुख़ से तय नहीं होता है.”
प्रोफ़ेसर पांडे कहते हैं, ”अभी यह देखना बाक़ी है कि ट्रंप जो रुख़ रूस को लेकर अपना रहे हैं क्या वही रुख़ चीन को लेकर भी अपनाने जा रहे हैं? अगर चीन को लेकर भी यह रुख़ अपनाते हैं तो भारत को सोचना होगा. ट्रंप की नीति पर अभी कुछ भी कहना ख़तरे से ख़ाली नहीं है.”
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अमेरिका चाहता क्या है?
ट्रंप की नीतियों को लेकर न केवल पूरी दुनिया में उथल-पुथल की स्थिति है बल्कि अमेरिका के भीतर भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत रहीं निकी हेली ने एक्स पर लिखा है, ”अमेरिका हमेशा से स्वतंत्रता और लोकतंत्र का स्तंभ रहा है. ग़लत और सही के बीच अमेरिका को नैतिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए. हम ग़लत और सही के बीच की लाइन धुंधली नहीं कर सकते हैं. हमें कोई एक पक्ष चुनना होगा और हमें किसी भी सूरत में तानाशाह का पक्ष नहीं चुनना चाहिए.”
पिछले हफ़्ते फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने व्हाइट हाउस गए थे और उन्होंने मीडिया के सामने ही ट्रंप को यूक्रेन के मामले में काउंटर किया.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री भी व्हाइट हाउस जाने वाले हैं. अगर ट्रंप रूस के साथ यूरोप की चिंता किए बिना आगे बढ़ते हैं तो यूरोप, कनाडा और एशियाई सहयोगी जैसे जापान और दक्षिण कोरिया भी अपनी अलग राह देख सकते हैं. दूसरी तरफ़ रूस भी राजनयिक अलगाव और प्रतिबंधों से बाहर आएगा.
ट्रंप की नीतियों से केवल यूरोप और अमेरिकी सहयोगी ही प्रभावित नहीं होंगे बल्कि भारत के लिए भी चुनौतियां बढ़ेंगी.
किशोर महबुबानी सिंगापुर के स्कॉलर और पूर्व डिप्लोमैट हैं. तीन फ़रवरी को द हिन्दू को दिए इंटरव्यू में महबुबानी ने कहा था कि ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत के लिए यही अच्छा होगा कि अमेरिकी सहयोगी बनने की बजाय अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के साथ रहे.
किशोर महबुबानी ने कहा था कि भारत अपनी बुद्धिमत्ता से काम ले रहा है क्योंकि उसने क्वॉड और ब्रिक्स दोनों में रहकर विकल्प खुला रखा है. क्वॉड में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और भारत हैं जबकि ब्रिक्स चीन और रूस के दबदबे वाला गुट है, जिसका भारत भी सदस्य है.
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भारत पहले से ही सतर्क
किशोर महाबुबानी ने कहा था, ”अमेरिका आख़िरकार कोई एक ईमानदार या निष्कलंक देश नहीं है लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद आख़िरकार अमेरिका ने विश्व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कमोबेश एक ज़िम्मेदार देश की भूमिका निभाई है. अगर अमेरिका ने अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया तो उसने कम से कम स्वीकार भी किया है. हम इस नियम में भरोसा करते हैं कि किसी भी देश को दूसरे देश पर हमला नहीं करना चाहिए और न ही उसके भूभाग पर क़ब्ज़ा करना चाहिए. लेकिन ट्रंप ने उन सारे अंतरराष्ट्रीय नियमों को ठंडे बस्ते में डाल दिया है, जिसकी अमेरिका वकालत करता था.”
किशोर महबुबानी ने कहा, ”मिसाल के तौर पर ट्रंप पनामा नहर पर अमेरिका का नियंत्रण चाहते हैं और ग्रीनलैंड को जबरन लेना चाहते हैं. ये सारी बातें संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन हैं. दूसरी तरफ़ अमेरिका कहता था कि यूक्रेन पर रूस का हमला अवैध है. ऐसे में ट्रंप अगले चार सालों में क्या करेंगे, यह बहुत बड़ा सवाल है. ट्रंप के बारे में विरोधाभास यह भी है कि वह ख़ुद को युद्ध के ख़िलाफ़ बताते हैं और यह सच भी है क्योंकि अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने कोई नई जंग नहीं छेड़ी थी. डोनाल्ड ट्रंप पहले राष्ट्रपति थे, जिन्होंने कोई नया युद्ध नहीं शुरू किया था.”
भारत में सरकारें बदलती हैं लेकिन विदेश नीति में एक किस्म की निरंतरता है. अमेरिका की तरह नहीं है कि बाइडन रूस के ख़िलाफ़ हैं और ट्रंप आए तो रूस के दोस्त बन गए.
भारत की विदेश नीति की बुनियाद गुट निरपेक्षता में रखी गई थी यानी भारत किसी गुट में नहीं होगा. भारत की इस विदेश नीति का पालन सभी सरकारों ने किया.
पिछले 11 सालों से बीजेपी की सरकार है और यह सरकार बहुध्रुवीय दुनिया की वकालत कर रही है. यानी नॉन अलाइनमेंट से बढ़कर मल्टीअलाइनमेंट की बात की जा रही है. लेकिन मल्टी अलाइनमेंट को नॉन अलाइनमेंट का ही विस्तार माना जा रहा है. भारत किसी गुट में नहीं है और भारत सभी गुटों में है के बीच का अंतर बहुत नहीं है. यानी जो सबके साथ होता है, वो किसी एक के साथ नहीं होता है.
भारत पारंपरिक रूप से बहुपक्षीय वैश्विक संस्थानों और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थक रहा है. भारत नहीं चाहता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जो ग्लोबल ऑर्डर बना था, वो ध्वस्त हो जाए. भारत ने इसी ग्लोबल ऑर्डर में अपनी पकड़ मज़बूत बनाने की कोशिश की. लेकिन ज़रूरी नहीं है कि यह व्यवस्था नष्ट होती है तो भारत के ख़िलाफ़ ही जाएगा.
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यूक्रेन एक सबक़ है?
इंस्टिट्यूट ऑफ साउथ एशिया स्टडीज़ के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर सी राजामोहन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है, ”ट्रंप न केवल यूक्रेन और रूस को लेकर अमेरिकी नीति बदल रहे हैं बल्कि अपने पुराने सहयोगियों से भी दूर हो रहे हैं. ट्रंप की सोच अपने प्रतिद्वंद्वी रूस और चीन से अच्छी डील करने की है. दूसरी तरफ़ भारत की नीति है कि अमेरिका की बदलती नीति को ठीक से हैंडल किया जाए. इसीलिए भारत ब्रिक्स के साथ भी जुड़ा है. रूस के साथ ट्रंप जिस तरह से पेश आ रहे हैं, उससे एशियाई सहयोगियों में एक डर यह भी है कि कहीं चीन के साथ भी यही नीति न अपनाना शुरू कर दें.”
कई विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन अमेरिका के बदले रुख़ से उन देशों को सबक़ लेना चाहिए जो महाशक्तियों के पिछलग्गू बन जाते हैं.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के अंतरराष्ट्रीय संपादक स्टैनली जॉनी ने लिखा है, ”यूक्रेन अपना 20 फ़ीसदी भूभाग खो चुका है और उसके दसियों हज़ार लोग मारे जा चुके हैं. यूक्रेन के लाखों लोग दूसरे देश में शिफ़्ट हो गए. यूक्रेन अपना खोया भूभाग वापस नहीं पा सकता है. यूक्रेन नेटो का सदस्य भी नहीं बन सकता है. यहाँ तक कि उसे पश्चिम से सुरक्षा गारंटी भी नहीं मिल सकती है.”
स्टैनली ने लिखा है, ”अब उसे अमेरिका मजबूर कर रहा है कि अपनी खनिज संपदा के लिए डील करे ताकि अमेरिका ने युद्ध में जो मदद दी थी, उसकी भरपाई हो सके. यूक्रेन को यह क़ीमत हारी हुई जंग के लिए चुकानी पड़ रही है.”
“कल्पना कीजिए कि यूक्रेन ने अपना क्षेत्र गंवाया, लोग मारे गए और अब अपनी खनिज संपदा अमेरिका के हवाले करेगा. इसके बदले में यूक्रेन को मिला क्या? ज़ाहिर है कि कुछ नहीं. छोटे देशों के लिए यह सबक़ है कि शक्तिशाली देशों के युद्ध का मैदान न बनें.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित