इमेज कैप्शन, रूस के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने भारत के मामले में कई चीज़ें स्पष्ट की हैं
रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़ाखारोवा ने बुधवार को कहा कि भारत के रूस के साथ ऊर्जा सहयोग के अपने रुख़ पर फिर से विचार करने का कोई कारण नहीं है.
मारिया ने कहा कि व्यापार दोनों देशों के लिए लाभकारी है और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाज़ार में स्थिरता बनाए रखने में योगदान देता है.
मारिया ने कहा कि अमेरिका के लिए यह नया नहीं है कि वह किसी स्वतंत्र देश पर व्यापार के मामले में दबाव डालना अपना अधिकार समझता है.
मारिया ने कहा, ”भारत अपना रुख़ कई मौक़ों पर स्पष्ट कर चुका है. हम भारत के साथ सहयोग जारी रखेंगे. हम इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि रूसी हाइड्रोकार्बन की ख़रीद पारस्परिक रूप से लाभकारी है और वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में स्थिरता बनाए रखने में योगदान देती है. हम इस क्षेत्र में अपने भारतीय साझेदारों के साथ निकट सहयोग जारी रखने के लिए तैयार हैं.”
इससे पहले तीन जनवरी को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था कि भारत जिससे चाहे उससे तेल ख़रीदने के लिए स्वतंत्र है.
जब उनसे पूछा गया कि भारत तेल आपूर्तिकर्ताओं को बदलने के बारे में सोच रहा है, इस पर रूस की क्या प्रतिक्रिया है?
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इमेज कैप्शन, अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया है कि पीएम मोदी रूस से तेल नहीं ख़रीदने पर राज़ी हो गए हैं
भारत का रुख़
इसके जवाब पेस्कोव ने कहा था, “दूसरे सभी अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा विशेषज्ञों की तरह हम, अच्छी तरह जानते हैं कि रूस भारत में तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का एकमात्र आपूर्तिकर्ता नहीं है. भारत हमेशा से ये उत्पाद अन्य देशों से भी ख़रीदता रहा है. इसलिए हमें इसमें कुछ भी नया नहीं दिखता.”
इससे पहले, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के ख़िलाफ़ 50 फ़ीसदी टैरिफ़ को घटाकर 18 प्रतिशत करने की घोषणा करते हुए कहा था कि नरेंद्र मोदी रूस से तेल आयात बंद करने पर सहमत हो गए हैं. हालांकि रूस से तेल आयात बंद करने पर भारत ने आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है लेकिन ट्रंप के दावों को ख़ारिज भी नहीं किया है.
बुधवार को वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी जो बयान जारी किया, उसमें उन्होंने ट्रंप के दावों को ख़ारिज नहीं किया.
पीयूष गोयल ने कहा, “बाज़ार की परिस्थितियों और बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल के अनुरूप अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाना, हमारी रणनीति का मूल है.”
एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा कहते हैं कि रूस और भारत के संबंधों में एक निरंतरता है और यह तेल ख़रीदने पर निर्भर नहीं है.
नरेंद्र तनेजा कहते हैं, ”आप याद कीजिए कि भारत यूक्रेन में युद्ध शुरू होने से पहले रूस से कितना तेल ख़रीदता था. भारत न के बराबर तेल ख़रीदता था. मुश्किल से अपनी ज़रूरत का एक फ़ीसदी से भी कम. रूस से तेल ख़रीदने के लिए भी राष्ट्रपति बाइडन ने ही प्रोत्साहित किया था ताकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत संतुलित रहे.”
”तेल आयात बंद होने से संबंध ख़राब हो जाएंगे, जो ऐसा मानते हैं, उन्हें 2022 से पहले जाना चाहिए, जब भारत तेल न के बराबर ख़रीदता था. भारत और रूस के संबंधों को सामरिक लिहाज से ज़्यादा देखना चाहिए. केवल रूस भारत के लिए अहम नहीं भारत भी रूस की ज़रूरत है.”
भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार में ऊर्जा की बड़ी हिस्सेदारी है. वित्त वर्ष 2024-25 में रूस और भारत का द्विपक्षीय व्यापार 68.7 अरब डॉलर हो गया था लेकिन इसमें 52.73 अरब डॉलर का कच्चा तेल भारत ने रूस से ख़रीदा था.
अगर भारत, रूस से तेल आयात पूरी तरह से बंद करता है तो दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार 20 अरब डॉलर से भी नीचे हो जाएगा.
भारत के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी ने पिछले महीने कहा था कि रूस से कच्चे तेल के आयात में गिरावट जारी रहने की उम्मीद है. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ईंधन ख़रीदार है. हरदीप पुरी ने कहा था कि भारत तेल आपूर्तिकर्ता देशों में विविधता ला रहा है.
27 जनवरी को ब्लूमबर्ग टेलीविजन को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि रूस से होने वाली आपूर्ति पहले ही घटकर 1.3 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गई है, जो पिछले साल के औसत 1.8 मिलियन बैरल प्रति दिन से कम है. पुरी ने कहा था कि इसमें गिरावट का रुझान है और ये बाज़ार-आधारित परिस्थितियां हैं.
थिंक टैंक ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान मानती हैं कि व्यापार अपने हितों को ध्यान में रखकर ही होता है.
तन्वी मदान ने एक्स पर लिखा है, ”भारत सरकार यह भी ध्यान में रखेगी कि रूस से मिलने वाली छूट, अमेरिकी बाज़ार तक पहुंच या भारत में नौकरियों के नुक़सान की भरपाई नहीं करेगी. वास्तविकता यह है कि अमेरिकी बाज़ार, पूंजी और टेक्नोलॉजी तक पहुंच, रूसी तेल आयात पर मिलने वाली छूट की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. यह भारत–अमेरिका संबंधों के अन्य कारणों को अलग रखते हुए भी सच है.”
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इमेज कैप्शन, पीएम मोदी ने रूस और अमेरिका दोनों से संबंध अच्छे रखने की कोशिश की है
भारत के लिए रूस ज़रूरी क्यों?
भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रहे हैं. भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इन संबंधों को पिछले आधी सदी की वैश्विक राजनीति में एकमात्र स्थायी तत्व बताया है.
शीत युद्ध के दौरान भारत ने सोवियत संघ के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे जबकि अमेरिका भारत के कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के क़रीब रहा था. भारत भले शुरू से गुटनिरपेक्ष की नीति पर चल रहा था लेकिन 1971 के गृह युद्ध में पाकिस्तान को अमेरिकी समर्थन मिला था और भारत सोवियत के क़रीब आ गया था.
आने वाले दशकों में भारत-रूस संबंध और मज़बूत हुए, जब दोनों देशों ने अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग किया.
हाल के वर्षों में मोदी ने रूस के साथ इस लंबे समय से चले आ रहे संबंध को बनाए रखने का प्रयास किया है, साथ ही अमेरिका के साथ भी गहरे संबंध आगे बढ़ाए हैं. अमेरिका के साथ भारत के संबंध को चीन से मुक़ाबले में एक साझेदार के तौर पर देखा जाता है.
यूक्रेन युद्ध पर भारत ने सतर्क रुख़ अपनाया है. भारत ने युद्ध रोकने की अपील की है, लेकिन रूस के हमले की आलोचना करने से परहेज किया. युद्ध की निंदा करने वाले संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर मतदान से दूर रहा है.
इन सबके बावजूद अमेरिका भी भारत के लिए अहम सहयोगी है. अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है. भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में अमेरिका में 86.5 अरब डॉलर का सामान बेचा, जो उसके वार्षिक निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा है. अमेरिका से भारत का आयात कुल 45.3 अरब डॉलर रहा.
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इमेज कैप्शन, कहा जाता है कि रूस से भारत का व्यापार कम हुआ तो चीन पर उसकी निर्भरता और बढ़ जाएगी
भारत रूस व्यापार
भारत और रूस 2022 से एक-दूसरे के शीर्ष पांच व्यापारिक साझेदारों में शामिल रहे हैं. ऐसा रूसी तेल की ख़रीद बढ़ाने के कारण हुआ. कुल द्विपक्षीय व्यापार वित्त वर्ष 2024-25 में रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया और दोनों देश इसे 2030 तक 100 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रख रहे हैं.
31 मार्च 2025 को समाप्त वित्त वर्ष में रूस को भारत का निर्यात 4.9 अरब डॉलर रहा, जिसमें दवाइयां, चावल और चाय जैसे कृषि उत्पाद शामिल थे.
इसकी तुलना में रूस से भारत का आयात कहीं अधिक रहा, जो 63.8 अरब डॉलर था और मुख्य रूप से तेल और पेट्रोलियम उत्पादों से बना था. यानी भारत को रूस से 60 अरब डॉलर से ज़्यादा का व्यापार घाटा है जो चीन से 100 अरब डॉलर के व्यापार घाटे के बाद दूसरा सबसे बड़ा है.
भारत के लिए रूस की अहमियत रक्षा साझेदारी के कारण भी है. रूस दशकों से भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता रहा है. रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी कहते हैं कि भारतीय सेना के पास 200 से अधिक रूसी निर्मित लड़ाकू विमान हैं, साथ ही एस-400 जैसी सतह से हवा में मार करने वाली कई मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ भी हैं.
इनका इस्तेमाल मई 2025 में पाकिस्तान के साथ चार दिन के संघर्ष के दौरान किया गया था. वैश्विक हथियार बिक्री का अध्ययन करने वाले थिंक टैंक स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, हाल के वर्षों में भारत ने अमेरिका, इसराइल और फ्रांस से हथियारों की ख़रीद बढ़ाई है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.