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इस वक़्त दुनिया में ट्रंप के टैरिफ़ के मुद्दे के बीच रेयर अर्थ मिनरल्स यानि दुर्लभ खनिजों की सप्लाई भी चर्चा में है.
ये रेयर अर्थ मिनरल्स सैन्य हथियारों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन से जुड़ी टेक्नॉलॉजी और कई प्रकार की अन्य आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.
इन रेयर अर्थ मिनरल्स के उत्पादन में चीन सबसे आगे है और यही राष्ट्रपति ट्रंप की चिंता का विषय भी है.
निकेल, तांबा और लिथियम सहित इन प्राकृतिक संसाधनों की मांग तेज़ी से बढ़ रही है. इन रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई बाधित होने से कई देशों के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है.
इसलिए इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या दुनिया रेयर अर्थ खनिजों की होड़ में चीन की बराबरी कर सकता है?
अमेरिका में खोज
1949 में तीन अमेरिकी कैलिफ़िर्निया में स्थित मोजावी रेगिस्तान में यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों की खोज कर रहे थे ताकि परमाणू हथियार बना कर सोवियत संघ के ख़तरे से निपटा जा सके.
इन लोगों को यूरेनियम तो मिला लेकिन रेयर अर्थ मिनरल्स यानि दुर्लभ खनिजों का दुनिया का सबसे बड़ा भंडार भी मिल गया.
कुछ दशकों बाद इन्हीं तत्वों से कलर टेलीविजन की टेक्नॉलॉजी भी बनी. आने वाले दशकों में रेयर अर्थ मिनरल्स की मदद से अमेरिका आधुनिक टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में बड़ी तरक्की करने वाला था.
आज अमेरिका में केवल कैलिफ़ोर्निया के पहाड़ी इलाके में रेयर अर्थ का खनन हो रहा है.
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रेयर अर्थ को समझने के लिए हमने बात की जूली मिशेल क्लिंगर से जो अमेरिका की विस्कोंसिन यूनिवर्सिटी में एनवायरमेंटल स्टडीज़ की असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं और इस विषय की विशेषज्ञ हैं.
उन्होंने बताया कि रेयर अर्थ दरअसल 17 अलग लेकिन एक दूसरे से मिलते जुलते रासायनिक तत्व हैं. इन सभी के अलग चुंबकीय गुण हैं और वह एक दूसरे से अलग भी दिखते हैं.
रेयर अर्थ मिनरल्स में इलेक्ट्रॉन की संख्या कहीं अधिक होती है जिसकी वजह से वे बहुत शक्तिशाली बन जाते हैं.
जूली मिशेल ने कहा कि कई लोग जानते हैं कि रेयर अर्थ मिनरल्स के चुंबकीय गुणों का इस्तेमाल, गाड़ियों की सीट बेल्ट, घर के रेफ़्रिजरेटर्स, पवन चक्कियों और ड्रोन्स को दिशा दिखाने वाली टेक्नॉलॉजी में भी होता है. इनका इस्तेमाल एमआरआई मशीनों और स्मार्ट फ़ोन में भी होता है.
दरअसल रेयर अर्थ मिनरल्स दुर्लभ नहीं हैं. ये काफ़ी मात्रा में धरती में उपलब्ध हैं लेकिन उनका खनन कर के उन्हें इस्तेमाल लायक बनाने की प्रक्रिया बहुत जटिल और मुश्किल होती है.
यही बात उन्हें दुर्लभ बनाती है.
जूली मिशेल क्लिंगर कहती हैं, “समस्या यह है कि ये 17 रेयर अर्थ इलिमेंट्स या तत्व ज़मीन में एक दूसरे के साथ मिले जुले होते हैं इसलिए उनके गुणों को अलग करना बहुत मुश्किल होता है. इन तत्वों को एक दूसरे से अलग करना बहुत ज़रूरी होता है क्योंकि अलग और शुद्ध रूप में ही यह सबसे अधिक उपयुक्त होते हैं. खनन से निकला ज़्यादातर हिस्सा रेयर अर्थ नहीं होता. जो एक दूसरे से जुड़े रेयर अर्थ मिनरल्स होते हैं उन्हें अलग करने के लिए रसायनों में डुबो कर ऊंचे तापमान पर प्रोसेस किया जाता है जिसमें काफ़ी ऊर्जा खर्च होती है.”
इससे प्रदूषण भी फैलता है. मगर सवाल यह है कि जब अमेरिका ने सबसे पहले देश में रेयर अर्थ मिनरल्स का पता लगा लिया था तो अब वह इसे प्राप्त करने की होड़ में कैसे पिछड़ गया?
टकराव
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फ़िलहाल रेयर अर्थ मिनरल्स के दो तिहाई खनन उद्योग पर चीन का नियंत्रण है. उसकी प्रोसेसिंग और रिफ़ाइनिंग उद्योग का नब्बे प्रतिशत से अधिक हिस्सा भी चीन के कब्ज़े में है.
इससे इस क्षेत्र में चीन का लगभग एकाधिकार बन चुका है.
यह शुरू कब हुआ यह समझने के लिए हमने बात की सोफ़िया कलांज़ाकोस से जो न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के अबूधाबी स्थित शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायन स्कॉलर्स प्रोग्राम में एनवायरनमेंट स्टडीज़ की डिस्टिंग्विश्ड प्रोफ़ेसर हैं.
वह बताती हैं कि 2015 में पैरिस की ‘कॉन्फ़्रेंस ऑफ़ दी पार्टीज़’ यानी कॉप समिट में 200 से अधिक देशों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रतिबद्धता दोहराई थी.
उस सम्मेलन में तय किया कि इस समस्या के समाधान के लिए ऐसे तरीके अपनाए जाएंगे जिनसे कार्बन उत्सर्जन को सही तरीके से आंका जा सकेगा.
कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए अर्थव्यवस्था को डिजिटल टेक्नॉलॉजी की ओर ले जाने और यातायात के लिए बिजली के वाहनों को अपनाने का फ़ैसला किया गया.
इसी के तहत चीन के पास विश्व को अपनी टेक्नोलॉजी और आर्थिक ताक़त दिखाने का मौका भी मिला. बिजली पर चलने वाले वाहनों के निर्माण में चीन आगे निकलने लगा.
साथ ही उसने एनर्जी से जुड़ी टेक्नोलॉजी का घरेलू इस्तेमाल और दूसरे देशों को बेचने के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया. चीन ने इसे रणनीतिक संसाधन की तरह देखना शुरू किया और इससे जुड़ी टेक्नॉलॉजी की रिसर्च में भारी निवेश किया.
सोफ़िया कलांज़ाकोस ने कहा, “विकसित देश सोच रहे थे कि रेयर अर्थ मिनरल्स की कमी नहीं होगी क्योंकि जैसे-जैसे औद्योगिकीकरण बढ़ेगा बाज़ार इसकी सप्लाई भी करेगा.”
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उन्होंने आगे कहा कि वैश्वीकरण के कारण लोग एक से दूसरे देश जा कर काम कर रहे थे. पूरा विश्व फ़ैक्ट्रियों का एक असेंबली लाइन बन गया था.
चीन ने इस असेंबली लाइन का लाभ उठा कर कई उत्पादों या उनके कलपुर्ज़े को चीन में बनाने के लिए कंपनियों को आकर्षित किया.
तो इस मामले से जुड़ा भूराजनीतिक टकराव कब शुरू हुआ?
सोफ़िया कलांज़ाकोस की राय है कि संघर्ष कई बार उभर कर आया. वह कहती हैं कि धीरे-धीरे चीन विश्व की महाशक्ति बनता गया, उसकी अर्थव्यवस्था मज़बूत होती गयी और साथ ही उसने कई विकासशील देशों के साथ सहयोग शुरू कर दिया.
उसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन को अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी बताना शुरू कर दिया. अब सवाल उठता है कि दूसरे देश, ख़ास तौर पर अमेरिका कब तक रेयर अर्थ मिनरल्स के क्षेत्र में चीन की बराबरी कर पाएंगे?
सोफ़िया कलांज़ाकोस ने कहा कि खनन एक महंगा व्यापार है, इसकी लागत और मुनाफ़े में उतार चढ़ाव आते हैं.
उन्होंने कहा, “इसमें दस साल से अधिक समय लग सकता है. दरअसल जब चीन इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन को बढ़ा रहा था तब यूरोपीय संघ डीज़ल पर चलने वाली गाड़ियां बनाने में लगा था. अमेरिका को भी इसमें रुचि नहीं थी और इस टेक्नॉलॉजी के विकास में वह काफ़ी पीछे रह गया था. जब तक पश्चिमी देशों को पता चला कि भविष्य में यही टेक्नॉलॉजी सबसे महत्वपूर्ण होगी तब तक चीन उनसे बहुत आगे निकल चुका था. उसने रेयर अर्थ मिनरल्स के उत्पादन में बड़ी बढ़त हासिल कर ली थी.”
राष्ट्रपति ट्रंप ने रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई को राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला करार दिया है.
बराबरी के प्रयास
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अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्री कलीम सिद्दीकी के अनुसार रेयर अर्थ उद्योग में चीन के एकाधिकार को तोड़ने में कई साल लगेंगे लेकिन अमेरिका और दूसरे देशों में इसकी शुरुआत ज़रूर हो चुकी है.
अप्रैल 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कई देशों के साथ व्यापारिक टैरिफ़ में बराबरी की बात करते हुए टैरिफ़ लगा दिए. साथ ही उन्होंने चीन के ख़िलाफ़ कई प्रतिबंध लगा दिए. जवाब में चीन ने भी अमेरिका को याद दिला दिया कि अमेरिका सहित कई देशों को होने वाली रेयर अर्थ मिनरल्स की सप्लाई उसके हाथ में है.
कलीम सिद्दीकी ने कहा कि पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप ने चीन पर 37 प्रतिशत टैरिफ़ लाद दिए थे. और चीन ने अमेरिका को रेयर अर्थ मिनरल्स के निर्यात पर रोक लगा दी थी. यह एक बड़ा जोखिम है.
वह कहते हैं, “मुझे लगता है कि यूरोपीय देशों को यूरोप में ही इसका खनन और प्रोसेसिंग करनी चाहिए क्यों कि अगर चीन ने उन्हें इस सामग्री की सप्लाई बंद कर दी तो उनकी अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा.”
तो यूरोपीय देश इस बारे में क्या कर सकते हैं?
कलीम सिद्दीकी का मानना है कि इक्कीसवीं सदी के इस महत्वपूर्ण संसाधन की आपूर्ति के लिए यूरोप एक मोनोपोली सप्लायर पर निर्भर नहीं रह सकता. उसे अपनी नीतियों में बदलाव कर के खनन उद्योग को उत्पादन उद्योग से जोड़ने के लिए नीतियां बनानी होंगी ताकि रेयर अर्थ मिनरल्स का उत्पादन यूरोप में हो सके. कलीम सिद्दीकी का मानना है कि यूरोप को इस समस्या के समाधान के लिए दूसरे देशों के साथ सहयोग करना होगा.
सिद्दीकी कहते हैं, “यूरोप को भारत, चीन, विएतनाम और अफ़्रीकी देशों के साथ मिल कर काम करना चाहिए क्योंकि वहां उत्पादन की अच्छी सुविधाएं हैं और उत्पादन का खर्च भी कम है. चीन का रेयर अर्थ मिनरल्स पर एकाधिकार है और वही उसकी कीमत भी तय करता है. अगर यूरोपीय देश अफ़्रीकी देशों के साथ काम करें तो उन्हें यह कच्चा माल सस्ता मिल सकता है. अगर यूरोप भारत और अफ़्रीकी देशों के साथ मिल कर इस उद्योग में निवेश करे तो इससे सभी को फ़ायदा होगा.”
मगर रेयर अर्थ के खनन का पर्यावरण पर जो असर पड़ता है उसके बारे में भी सोचना ज़रूरी होगा.
कलीम सिद्दीकी याद दिलाते हैं कि रेयर अर्थ के खनन और प्रोसेसिंग से काफ़ी प्रदूषण फैलता है. इससे परिस्थितिकी और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है. इतना ही नहीं बल्कि लोग विस्थापित भी होते हैं. इसलिए स्थानीय लोगों को विश्वास में लेकर इसे लोकतांत्रिक तरीके से करना बहुत ज़रूरी है.
नई शुरूआत
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एक टन रेयर अर्थ मिनरल्स की प्रोसेसिंग से दो हज़ार टन ज़हरीला कचरा पैदा होता है.
रेयर अर्थ मिनरल्स छोटी मात्रा में ज़मीन में होते हैं और अक्सर यूरेनियम के साथ मिले होते हैं. इसलिए इसकी प्रोसेसिंग से पैदा होने वाले कचरे में रेडियोधर्मी यानी रेडियोएक्टिव तत्व और ख़तरनाक धूल भी होती है.
यूके स्थित स्वतंत्र थिंक टैंक चैटहम हाउस के एनवायरमेंट एंड सोसायटी सेंटर के सीनियर रिसर्च फ़ेलो डॉक्टर पैट्रिक श्रोडर कहते हैं कि चीन ने पहले इस कचरे से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान से निपटने के लिए ख़ास कदम नहीं उठाए.
अब यह समस्या इतनी बड़ी हो गई है कि उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. अब रेयर अर्थ मिनरल्स का उत्पादन करने वाले सभी देशों को इसके बारे में सोचना आवश्यक हो गया है.
डॉक्टर पैट्रिक श्रोडर ने बताया कि नब्बे के दशक में यूरोप में पर्यावरण संबंधी कई नियंत्रण लागू कर दिए गए. उन्होंने कहा कि यूरोपीय देशों को लग रहा था कि चीन से रेयर अर्थ मिनरल्स आयात करना किफ़ायती सौदा है क्योंकि इसमें उत्पादन से जुड़े प्रदूषण से निपटने की ज़िम्मेदारी चीन की थी.
पर्यावरण को होने वाले नुकसान से निपटने का एक विकल्प यह भी है कि निकाले गए रेयर अर्थ मिनरल्स का दोबारा इस्तेमाल किया जाए जिसके लिए उन्हें रीसाइकल करना होगा.
डॉक्टर पैट्रिक श्रोडर ने कहा कि, “रेयर अर्थ मिनरल्स की रीसाइक्लिंग से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम किया जा सकता है.”
उन्होंने कहा कि पहले ऐसा नहीं किया गया क्योंकि व्यावसायिक तौर पर यह विकल्प किफ़ायती नहीं लगता था. इनकी रीसाइक्लिंग के के लिए ज़रूरी टेक्नॉलॉजी उपलब्ध नहीं थी इसलिए रीसाइक्लिंग के बिलकुल नहीं हो पा रही थी. लेकिन अब स्थिति बदल रही है. कंपनियां इसकी रीसाइक्लिंग के लिए कारख़ाने लगा रही हैं.
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अब अमेरिका, कनाडा, यूके, फ़्रांस और जर्मनी में रेयर अर्थ मिनरल्स की रीसाइक्लिंग शुरू हो गई है.
इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन चक्कियों और इलेक्ट्रॉनिक सामान में से रेयर अर्थ चुंबकों को निकाल कर रीसाइकल किया जा रहा है.
डॉक्टर पैट्रिक श्रोडर इसे एक सकारात्मक कदम मानते हैं, “सवाल यह है कि हम कितनी जल्दी चीन पर निर्भरता घटा सकते हैं? यह रातों रात तो नहीं होगा. इसमें कई दशक भी लग सकते हैं.”
चीन से मुक़ाबला?
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- क्या विश्व रेयर अर्थ खनिजों की होड़ में चीन की बराबरी कर सकता है?
चीन की सरकार के प्रयासों के चलते दशकों पहले ही चीन ने रेयर अर्थ मिनरल्स के खनन और उत्पादन में बढ़त हासिल कर ली थी. इनका इस्तेमाल उसने प्रतिरक्षा ही नहीं बल्कि स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी टेक्नॉलॉजी में भी करना शुरू कर दिया था.
विश्व के दूसरे देश इस रेस में देर से आए और अब वह अपनी रेयर अर्थ मिनरल्स की आपूर्ति के लिए नए विकल्प खोज रहे हैं. यह करने में काफ़ी समय लग सकता है.
मगर अच्छी बात यह है कि अब इन देशों के पास रेयर अर्थ उत्पादन की बेहतर टेक्नॉलॉजी होगी जिससे इसका उत्पादन सस्ता भी हो सकता है.
साथ ही बेहतर टेक्नॉलॉजी की मदद से रेयर अर्थ मिनरल्स के उत्पादन में पर्यावरण की रक्षा के लिए कड़े मापदंड लागू किए जा सकेंगे.
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