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‘वसुधैव कुटुंबकम’ के हिमायती समाज में पारिवारिक विवाद विडंबनापूर्ण, हाई कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका

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Jan 2, 2026


पीटीआई, मुंबई। बांबे हाई कोर्ट ने समाज की इस विडंबना पर दुख जताया है जो दुनियाभर में ”वसुधैव कुटुंबकम” की हिमायत करता है और उसके अपने ही घरों में विरासत को लेकर झगड़े होते हैं। संपत्ति के अंतहीन विवादों को प्राचीन मूल्यों और आधुनिक वास्तविकता के बीच जुड़ाव की कमी का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए कोर्ट ने उम्मीद जताई कि समाज के व्यापक हित में कटु व लंबे समय तक चलने वाले पारिवारिक मुकदमों में कमी आएगी।

 

जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस अद्वैत सेठना की पीठ ने इस हफ्ते की शुरुआत में दिए फैसले में एक बेटी की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने अपनी दिवंगत मां की वसीयत के संबंध में लेटर फ एडमिनिस्ट्रेशन (संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार पत्र) जारी करने की मांग की थी, जिसमें उपनगरीय बांद्रा में परिवार की संपत्ति उसे और उसके दो भाइयों को दी गई थी।

 

दो अन्य भाइयों, जिन्हें वसीयत से बाहर रखा गया था, ने अपनी मां की वसीयत पर संदेह जताया था और दावा किया था कि यह प्रभाव डालकर और मिलीभगत से बनाई गई थी। इन दोनों भाइयों को मां की वसीयत से पहले बनी पिता की वसीयत में संपत्ति के एक्जीक्यूटर के रूप में नामित किया गया था।

 

कोर्ट ने मां की वसीयत के संबंध में लेटर फ एडमिनिस्ट्रेशन जारी करने से इन्कार करते हुए कहा कि उसकी राय में इस वसीयत के संबंध में संदिग्ध व संदेहास्पद परिस्थितियां मौजूद हैं।

 

याचिका के मुताबिक, अपीलकर्ता के माता-पिता की शादी 1933 में हुई थी और उनके छह बच्चे (पांच बेटे और एक बेटी) थे। 1976 में अपीलकर्ता के पिता की मृत्यु हो गई और उन्होंने अपनी वसीयत में अपनी पत्नी व दो बेटों को संपत्ति का एक्जीक्यूटर एवं ट्रस्टी बनाया था।

 

1987 में मां की मृत्यु हो गई और उन्होंने एक वसीयत छोड़ी जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति अपनी बेटी व दो अन्य बेटों को दी। जिन दो बेटों को शुरू में पिता की वसीयत में ट्रस्टी बनाया गया था, उन्होंने दावा किया कि उनकी मां की वसीयत अस्पष्ट थी और उसमें यह नहीं बताया गया था कि उन्हें वसीयत से क्यों बाहर रखा गया।

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