डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) एक्ट, 2025 के कई प्रविधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया। कोर्ट ने कहा कि उठाया गया मुख्य विवाद वास्तविक, प्रत्यक्ष एवं ठोस राष्ट्रहित और दुर्भाग्यपूर्ण काल्पनिक नुकसान के बीच है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने मामले को बेहद संवेदनशील बताते हुए कहा कि इस पर विस्तृत सुनवाई की जरूरत है और याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे दूसरे देशों की तुलनात्मक नियामक व्यवस्था प्रस्तुत करें।
याचिकाकर्ताओं के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि 2025 का यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह निजी कंपनियों को 3000 करोड़ रुपये से अधिक के दायित्व से छूट प्रदान करता है। जबकि परमाणु दुर्घटना में नुकसान 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक का होता है। यह पूर्ण दायित्व सिद्धांत के विरुद्ध है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, भारत में पर्याप्त ऊर्जा संसाधनों की कमी है, विकास एवं इन उद्योगों के लिए पर्याप्त सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है। हम कोयले पर आधारित ऊर्जा संयंत्र की अनुमति नहीं देते, जंगलों से हम समझौता कर नहीं सकते, गैस हमारे पास है नहीं। हम कहां जा रहे हैं?”
भूषण ने कहा कि इसका जवाब सौर ऊर्जा है। जस्टिस बागची ने कहा कि सौर ऊर्जा के लिए लिथियम की जरूरत है जिसके लिए भारत को चीन पर निर्भर रहना होगा। भूषण ने कहा कि यह धारणा बन गई है कि इस देश में बिजली का उत्पादन बहुत कम है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि समस्या यह है कि कई राज्यों ने अब बिजली सब्सिडी देना शुरू कर दिया है जिससे निजी कंपनियों के हितों पर असर पड़ रहा है।
(न्यूज एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)