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शहरी निकायों को समय पर फंड के लिए राज्य वित्त आयोगों का गठन जरूरी, बजट में मिलता है GDP का सिर्फ 1

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Jan 27, 2026


माला दीक्षित, जागरण। देश विकासशील से विकसित बनने की डगर पर चल रहा है और 2047 विकसित भारत बनने का लक्ष्य है । ये लक्ष्य हासिल करने के लिए जरूरी है आमजन को सुविधाजनक सुकून भरा सुरक्षित माहौल मिले।

यानी शहर नियोजन, शहरों में सीवर व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल, साफ और दुरुस्त सड़कें, आवारा पशुओं से निजात हो और ये सब उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है शहरी नगर निकायों की जो हमेशा फंड की कमी से जूझते रहते हैं। उनके फंड को लेकर हमेशा अनिश्चितता कायम रहती है।

राज्य सरकार काफी ढीली है

अक्सर उन्हें नहीं मालूम होता कि उन्हें कब और कितना फंड मिलेगा और कर्मचारियों का वेतन निकाल कर वे किस मद में कितना पैसा खर्च कर सकते हैं। ऐसा इसलिए हैं क्योंकि उनके फंड का महती हिसाब बताने वाले राज्य वित्त आयोगों के गठन में राज्य सरकारें काफी ढीली हैं।

शहरी निकायों को समय पर फंड के लिए समय पर राज्य वित्त आयोगों का गठन और वित्त आयोगों की सिफारिशों को उसी शिद्दत से लागू करना जरूरी है। भले ही शहरी व्यवस्था और रहन सहन को सुगम बनाने का दारोमदार शहरी निकायों पर हो लेकिन सच्चाई यही है कि भारत में शहरी निकायों का बजट कुल जीडीपी का एक प्रतिशत है जबकि हमारे जैसे विकासशील देश ब्राजील में ये 7.4 और साउथ अफ्रीका में जीडीपी का छह प्रतिशत है।

हाल ही में एक गैर सरकारी संगठन जनाग्रह की रिपोर्ट आयी है जिसमें स्थानीय निकायों के फाइनेंस और राज्य वित्त आयोगों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के बाद राज्यों को राज्य वित्त आयोग गठित करना था जो कि शहरी निकायों के लिए फंड पर सिफारिश देते हैं।

क्यों नहीं हुई सातवां राज्य वित्त आयोग का गठन?

अभी तक सभी राज्यों को सातवां राज्य वित्त आयोग गठित कर देना चाहिए था लेकिन जब से संविधान संशोधन हुआ है तब से अभी तक सिर्फ सात राज्यों राजस्थान, हरियाणा, तमिलनाडु, बिहार, केरल, असम और हिमाचल प्रदेश ने सभी सात वित्त आयोग गठित किये हैं।

सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि राज्य समय से वित्त आयोग गठित ही नहीं करते, अगर गठित हो जाएं तो उनकी रिपोर्ट समय से नहीं आती और अगर रिपोर्ट आ भी जाए तो राज्य उसमें की गई सिफारिशों को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते और अगर सिफारिशें स्वीकार भी हो जाए तो उसका पूरी तरह अनुपालन नहीं हो पाता।

ये बड़ी बाधाएं हैं जिनके चलते शहरी निकायों को समय पर फंड उपलब्ध नहीं होता जिससे वे नागरिकों को सुविधाओं और सेवाओँ की आपूर्ति तो दूर कई बार कर्मचारियों तो समय पर वेतन तक के लिए संघर्ष करते हैं।

शहरी निकायों के लिए राज्य वित्त आयोग कितने जरूरी हैं इसका पता इसी से चलता है कि राज्य वित्त आयोगों की सिफारिश पर राज्य सरकारों से स्थानीय निकायों को मिलनी वाली रकम , केंद्रीय वित्त आयोग द्वारा अनुशंसित हस्तांतरण से औसतन चार गुना अधिक है।

जनाग्रह के सार्वजनिक वित्त प्रबंधन निदेशक प्रभात कुमार कहते हैं कि अच्छी तरह से काम करने वाले शहर और गांव तथा नागरिकों के लिए बेहतर ढंग से रहने की स्थिति और अवसर, मजबूत स्थानीय सरकारों यानी स्थानीय निकायों पर निर्भर करते हैं।

रिपोर्ट में क्या है?

यदि सरकार के इस तीसरे स्तर को अपेक्षित रूप से काम करना है तो राज्य वित्त आयोगों को केंद्रीय वित्त आयोग के समान संस्थागत विश्वस्नीयता प्राप्त होनी चाहिए। निरंतरता, क्षमता और जवाबदेही के माध्यम से उनके कामकाज को मजबूत करना, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संसाधन स्थानीय निकायों यानी लोकल गवर्नमेंट तक पहुंचे, जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

जनाग्रह की रिपोर्ट में सिफारिश है कि कार्यकाल समाप्त होने से कम से कम दो साल पहले राज्य वित्त आयोग गठित होने चाहिए ताकि वे राज्यों को समय से रिपोर्ट दे सकें। उन्हें पर्याप्त संसाधन और कार्यबल उपलब्ध कराया जाना चाहिए। कई जगह इसकी बेहद कमी होती है।

रिपोर्ट कहती है कि राज्य वित्त आयोग की रिपोर्ट मिलने के छह महीने में राज्य उसे विधानसभा में पेश करें और उस पर एक्शन टेकन रिपोर्ट दें। राज्य सरकारों को हर साल बजट में ही यह बता देना चाहिए कि किस नगर निकाय को किस मद में कितना पैसा दिया जाएगा। अभी सिर्फ कुछ ही राज्यों जैसे कर्नाटक और केरल में यह होता है। रिपोर्ट और दस्तावेज सार्वजनिक होने चाहिए। आंकड़े उपलब्ध होने चाहिए।

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