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बांग्लादेश में जुलाई, 2024 में बड़े पैमाने पर आंदोलन के बाद सत्ता से बेदख़ल होने वाली अवामी लीग की भागीदारी के बिना ही देश में अगले संसदीय चुनाव की तैयारियां चल रही हैं.
इससे यह सवाल बना हुआ है कि साल 2014 से लगातार तीन विवादास्पद चुनावों के बाद सभी दलों की भागीदारी के बिना आगामी चुनाव आखिरकार कितने प्रभावी होंगे.
साल 2014 और 2024 में हुए चुनावों में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और जमात-ए-इस्लामी ने हिस्सा नहीं लिया था. इस की वजह से वो चुनाव एकतरफा रहे थे.
इस बार के चुनावों में भी सभी पार्टियां हिस्सा नहीं ले रही हैं.
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इन चुनावों में मुख्य रूप से वही ताकतें हिस्सा ले रही हैं जो 2024 के आंदोलन के पीछे थीं. इनमें साल 2014 और 2024 के चुनाव में हिस्सा नहीं लेने वाली बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी का खास तौर पर जिक्र किया जा सकता है.
देश की अंतरिम सरकार ने सत्ता से बेदख़ल अवामी लीग की राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदी लगा दी है. इसके साथ ही चुनाव आयोग ने पार्टी का पंजीकरण भी रद्द कर दिया है.
अवामी लीग की विरोधी राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि यह चुनाव सहभागी और समावेशी होंगे.
दोनों गठबंधनों का रवैया
आगे चल कर कुछ लोग शायद साल 2026 के चुनाव को भी एकतरफा मानेंगे.
लेकिन दोनों प्रमुख गठबंधनों के नेताओं का मानना है कि हर स्तर पर वोटर, वैध राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए यह चुनाव समावेशी होंगे.
जमात-ए-इस्लामी के महासचिव मियां गुलाम परवर का कहना है कि वोटरों की मौजूदगी के जरिए ही अगला चुनाव सहभागी होगा.
बीबीसी बांग्ला से साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “सहभागिता से हमारा मतलब चुनाव में वोटरों की भागीदारी से है. इसका किसी खास राजनीतिक पार्टी के शामिल होने से कोई मतलब नहीं है.”
उनका कहना था, “संसदीय चुनाव कानून के आधार पर कराए जाते हैं. देश में चुनाव आयोग के अलावा एक चुनावी कानून और संवैधानिक तरीका है. इसके आधार पर ही लोग चुनाव में हिस्सा लेंगे. दैट इज काल्ड पार्टिसिपेटरी, दैट इज काल्ड इनक्लुसिव.”
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गुलाम परवर ने कहा कि चुनाव में अगर योग्य मतदाताओं को वोट देने की अनुमति नहीं दी जाती है तो यह एक गैर-भागीदारी वाला चुनाव होगा.
बीएनपी नेता सलाहुद्दीन अहमद मानते हैं कि सभी की भागीदारी वाले चुनाव के सवाल पर इस बार कोई विवाद नहीं है. उनकी दलील है कि देश की तमाम पंजीकृत पार्टियों के हिस्सा लेने के कारण यह चुनाव सहभागी होगा.
अहमद कहते हैं, “समावेशी चुनाव का मतलब अवामी लीग के बिना चुनाव कराना है. इसका कारण यह है कि अवामी लीग अब कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. वो एक माफिया गुट है. उसका राजनीतिक चरित्र बदल गया है और उसने देश में सामूहिक हत्याएं कराई हैं.”
बीएनपी की स्थायी समिति के सदस्य सलाहुद्दीन अहमद का कहना है कि अगर एक-दो छोटी राजनीतिक राजनीतिक पार्टियां चुनाव में हिस्सा नहीं लेती तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

जातीय पार्टी का अलग रवैया
इस बार अवामी लीग के मैदान में नहीं होने के कारण बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले दोनों गठबंधन चुनाव में आमने-सामने हैं.
इन दोनों का मानना है कि फरवरी में होने वाला चुनाव विश्वसनीय और स्वीकार्य होगा. लेकिन जातीय पार्टी ने इन दोनों की ऐसी उम्मीदों पर संदेह और आशंका जताई है.
पार्टी के महासचिव शमीम हैदर पटवारी ने बीबीसी बांग्ला से कहा, “बांग्लादेश एक अनियंत्रित चुनाव की ओर बढ़ रहा है. मतदान के दिन स्थानीय भीड़, स्थानीय ताकतें और स्थानीय स्तर पर सत्ता की बागडोर संभालने वाले लोग जो चाहेंगे, वही होगा.”
पहले अवामी लीग के साथ गठजोड़ में रही जातीय पार्टी इस बार चुनाव में हिस्सा ले रही है.

पटवारी का कहते हैं, “यह चुनाव लोकतांत्रिक बदलाव की ओर बढ़ने का जरिया है. अवामी लीग में भी बदलाव की जरूरत है. चुनाव नहीं हुए तो मौजूदा अंतरिम सरकार देश नहीं चला सकेगी.”
नागरिक अधिकार कार्यकर्ता प्रोफेसर अनु मोहम्मद तख्तापलट के बाद की चुनावी राजनीति की मौजूदा स्थिति का विश्लेषण करते हुए बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, “सहभागी चुनाव का मतलब तमाम राजनीतिक पार्टियों की हिस्सेदारी है. लेकिन हक़ीक़त में इस बार ऐसा नहीं हो रहा है.”
“अगर अवामी लीग अपने मुद्दों पर पुनर्विचार करती और अगर उसके खिलाफ दायर मुकदमे खत्म हो जाते तो वो निश्चित रूप से किसी न किसी तरह से वापसी कर सकती थी. वैसी स्थिति में अगला चुनाव पूरी तरह सहभागी हो सकते थे.”
उनका कहना था कि फिलहाल आंशिक तौर पर ही चुनाव कराना होगा. लेकिन इसके बावजूद इस बात को लेकर चिंता बनी हुई है कि चुनाव कितने ठीक-ठाक तरीके से आयोजित होगा.
मतदान पर असर
पहले के चुनावी नतीजो के विश्लेषण से यह बात साफ है कि बांग्लादेश में बीएनपी और अवामी लीग के वोटर ही सबसे ज्यादा हैं. अवामी लीग भले चुनाव मैदान में नहीं है, उसके समर्थक भारी तादाद में यहां हैं, इसलिए हार-जीत तय करने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होगी.
अवामी लीग ने अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से आगामी चुनाव में मतदान से दूर रहने की अपील की है. इसका मतदान पर कैसा और कितना असर होगा, इस पर तमाम राजनीतिक पार्टियों ने अलग-अलग मूल्यांकन किया है.
बीएनपी नेता सलाहुद्दीन अहमद का दावा है कि अवामी लीग के वोटरों की गैरहाजिरी से मतदान पर कोई असर नहीं होगा.
वो कहते हैं, “देश के लोग, नई पीढ़ी और खासकर 18 से 35 साल तक की उम्र के मतदाता स्वतंत्र और मुक्त मतदान के लिए उत्सुक और उत्साहित हैं. उनको मतदान केंद्र तक पहुंचने से कोई भी नहीं रोक सकेगा. कुछ लोग जो चुनाव में हिस्सा नहीं लेना चाहते या मतदान नहीं करना चाहते, वो ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं. लेकिन मेरी राय में ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है.”
जमात-ए-इस्लामी का भी मानना है कि वोटरों की उपस्थिति कोई समस्या नहीं होगी.
लेकिन जातीय पार्टी के महासचिव शमीम हैदर पटवारी कहते हैं, “आखिर में अवामी लीग का कोई फैसला मतदाताओं की संख्या पर असर डाल सकता है.”
पटवारी कहते हैं, “अगर आगे चल कर अवामी लीग चुनाव के बायकाट का फैसला करती है तो ‘अवैध रूप से मतदान’ कराना होगा. इसे छिपाया नहीं जा सकता. बांग्लादेश में कुल 42 हजार मतदान केंद्रों पर वोट डाले जाएंगे और अवैध मतदान का पता चलने के बाद चुनाव पर सवाल खड़े होंगे.”
उनका कहना था, “हम सब चाहते हैं कि अवामी लीग के वोटर भी मतदान केंद्रों तक पहुंच कर अपने वोट डालें. सबको मिल कर इस मुद्दे पर विचार करना होगा कि उनको मतदान केंद्रों तक कैसे लाया जा सकता है.”

विश्लेषकों का कहना है कि अगले चुनाव में 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदान नहीं होने की स्थिति में सवाल पैदा हो सकते हैं.
अनु मोहम्मद कहते हैं, “कम से कम 50 प्रतिशत मतदान नहीं होने की स्थिति में यह स्वीकार्य नहीं होगा. लंबे समय बाद चुनाव होने की वजह से मतदान का प्रतिशत और ज्यादा होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसे नाकामी माना जाएगा.”
उनका कहना था कि यह सब इस बात पर निर्भर है कि चुनाव आयोग मतदान से पहले कैसा माहौल बना सकता है और अंतरिम सरकार चुनाव के प्रति कितनी गंभीर है.
मोहम्मद का कहना था, “अंतरिम सरकार को यह साफ करना होगा कि वह कोई पक्षपात नहीं कर रही है. चुनाव आयोग के लिए भी यह चुनाव एक परीक्षा है.”
विश्लेषकों की राय में चुनाव की स्वीकार्यता के सवाल पर दो मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण होंगे. पहला वोटरों की भागीदारी और दूसरा सुरक्षा और मतदान का माहौल.
अनु मोहम्मद मानते हैं कि इस मामले में भी आशंका बनी हुई है. वो कहते हैं, “पहले हुए चुनावों के दौरान हमने देखा है कि जातीय और धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच आतंक का ऐसा माहौल बना दिया जाता है जिससे वो वोट डालने नहीं जा सकें. उनके लिए मतदान के लिए बाहर निकलने और नहीं निकलने, दोनों स्थितियों में खतरा है. सरकार और आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे समुदाय के लोग वोट डालने के लिए घरों से बाहर निकलें. इसकी वजह यह है कि देश में उनकी अच्छी-खासी तादाद है.”
अनु मोहम्मद का कहना था, “फिलहाल बहुसंख्यक वोटरों में भी आतंक है. अब मजारों और बाउल समुदाय के लोगों पर हमले हो रहे हैं. इनकी खासी जनसंख्या है. अगर इन लोगों को लगता है कि मतदान के लिए निकलने की स्थिति में चुनाव के दिन या उसके बाद उनको राजनीतिक दलों की हिंसा का शिकार होना पड़ सकता है तो मतदान की प्रतिशत काफी कम हो सकता है.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.