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‘गुंडागर्दी नहीं चलेगी…तानाशाही नहीं चलेगी, सीजेएम साहब को वापस लाओ.’
संभल के चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर के तबादले के विरोध में बुधवार को कुछ ऐसे ही नारों की गूंज संभल के ज़िला न्यायालय परिसर में सुनाई दी. नारे वकीलों का एक समूह लगा रहा था.
इन्हीं वकीलों में से एक रोहन सिंह यादव ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ” हमें अख़बारों से सीजेएम साहब के तबादले के बारे में पता चला. इस ख़बर से आम लोगों में ये संदेश गया कि जो आदेश माननीय हाई कोर्ट ने दिया है, वह पुलिस प्रशासन के दबाव में आया है. इसलिए वकीलों ने ये प्रदर्शन किया.”
उत्तर प्रदेश के एक पूर्व डीजीपी ने सीजेएम के ट्रांसफर को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है.
रोहन यादव ने बताया, ”हम वकील चाहते हैं कि सीजेएम साहब का तबादला रोका जाए. वह एक बहुत ही अच्छे, न्यायप्रिय और सभी नागरिकों को एक समान दृष्टि से देखने वाले अधिकारी हैं, ऐसे लोगों की न्यायालय में ज़रूरत है.”
एक अन्य वकील राजेश कुमार यादव ने बताया कि सीजेएम के ट्रांसफ़र के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में तक़रीबन सौ वकीलों ने भाग लिया है. कुछ युवा वकीलों ने मुख्यमंत्री और पुलिस प्रशासन के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी की.
उनके मुताबिक़, ”सीजेएम के असमय तबादले से नए अधिवक्ताओं में ये संदेश गया कि ये तबादला पुलिस प्रशासन के दबाव में किया गया है. जबकि हमें पता है कि ये फ़ैसला उच्च न्यायालय की तरफ़ से किया गया है. लेकिन हम हाईकोर्ट से मांग करते हैं कि हमारे सीजेएम का ट्रांसफ़र रोका जाए क्योंकि विभांशु सुधीर साहब यहां अच्छा कार्य कर रहे थे. उनकी कार्यप्रणाली से सारे अधिवक्ता, अधिकारी खुश थे. वह सही मायने में न्याय कर रहे थे.”
तबादले का आदेश
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दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक प्रशासनिक आदेश में संभल के चीफ़ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर सहित 14 न्यायिक अधिकारियों का ट्रांसफर कर दिया है. विभांशु सुधीर को अब सुल्तानपुर के सीनियर डिविजन का सिविल जज बनाया गया है.
वहीं आदित्य सिंह, जो पूर्व में चंदौसी में (संभल) सीनियर डिविज़न जज थे, उन्हें संभल का नया सीजेएम नियुक्त किया गया है.
विभांशु सुधीर, वही जज हैं जिन्होंने 13 जनवरी को संभल हिंसा मामले में एक याचिका की सुनवाई करते हुए तत्कालीन क्षेत्राधिकारी (सीओ) अनुज चौधरी समेत 12 पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करने का आदेश दिया था.
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यह आदेश यामीन नाम के याचिकाकर्ता की याचिका की सुनवाई के दौरान दिया गया था. याचिका बीते साल 4 फ़रवरी को सीजेएम कोर्ट में दायर की गई थी. याचिकाकर्ता का आरोप था कि उनके बेटे को संभल हिंसा के दौरान पुलिस ने गोली मारी.
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि गोली लगने के बाद उन्हें छिपकर अपने बेटे का इलाज कराना पड़ा था. अपनी याचिका में उन्होंने बेटे के इलाज से जुड़े दस्तावेज़ और ऑपरेशन के दौरान निकाली गई गोली से जुड़ी रिपोर्टें भी पेश की थीं.
युवक के पिता का आरोप था कि उनका बेटा रोज़ी-रोटी कमाने के लिए बाहर निकला था, तभी उसे गोली मार दी गई.
सीजेएम के फ़ैसले में क्या था?
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लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ यामीन ने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि तत्कालीन संभल सर्किल ऑफिसर अनुज चौधरी सहित कुछ पुलिसकर्मियों की फायरिंग से उनके बेटे को गोली लगी, इसलिए उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की जाए.
इस याचिका पर सुनवाई करते हुए संभल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट विभांशु सुधीर ने पाया कि पुलिस की रिपोर्ट और मेडिकल साक्ष्यों में मेल नहीं है और “सरकारी ड्यूटी” का हवाला देकर संभावित आपराधिक कृत्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
यामीन ने अपनी याचिका में लिखा था कि 24 नवंबर, 2024 को 8 बजकर 45 मिनट के आसपास उनका बेटा संभल की जामा मस्जिद के नज़दीक ठेले पर बिस्किट बेच रहा था. तभी तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और अन्य पुलिस अधिकारियों ने अचानक से भीड़ पर फायरिंग करनी शुरू कर दी.
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता क़मर आलम के मुताबिक़, ”याचिका की सुनवाई के दौरान पंद्रह से अधिक बार बहस हुई. कई बार रिपोर्टें मंगवाई गई. हमें तो उम्मीद ही नहीं थी कि फ़ैसला हमारे पक्ष में आ सकता है लेकिन जिस दिन कोर्ट ने एफ़आईआर दर्ज करवाने का फ़ैसला दिया, पीड़ित परिवार का न्याय व्यवस्था पर भरोसा मज़बूत हुआ. हमें उम्मीद थी कि अदालत की निगरानी में निष्पक्ष विवेचना हो सकेगी.”

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार सीजेएम सुधीर ने अपने 11 पन्ने के आदेश में कहा था कि पुलिस सरकारी ड्यूटी का हवाला देकर किसी गलत काम को सही नहीं ठहरा सकती. सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए जज ने कहा कि किसी इंसान पर गोली चलाना पुलिस की ड्यूटी नहीं हो सकती.
कोर्ट ने पुलिस की यह दलील भी नहीं मानी कि गोली कहां से लगी. कोर्ट को पुलिस की रिपोर्ट शक के दायरे में लगी और उनके मुताबिक़ पीड़ित के मेडिकल रिपोर्ट से मेल नहीं खा रही थी.
इसी के बाद संभल के तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी और 12 पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करवाने का आदेश दिया था.
लेकिन आदेश देने वाले जज के तबादले की ख़बर आने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं.
‘न्याय कैसे मिलेगा?’
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उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने फेसबुक पर लिखा है, ”सत्य स्थानांतरित नहीं होता, उसका स्थान अचल है. न्यायपालिका की स्वतंत्रता का हनन सीधे-सीधे लोकतंत्र का हनन है. स्वतंत्र न्यायपालिका ही संविधान की अभिभावकीय सुरक्षा कर सकती है.”
इससे पहले जब 13 जनवरी को सीजेएम का फ़ैसला आया था, तब अखिलेश यादव ने एक बयान जारी कर कहा था, अब अनुज चौधरी को बचाने कोई नहीं आएगा.
उन्होंने 14 जनवरी को एक्स पर किए अपने एक पोस्ट में लिखा, ”अब ये पक्षपाती पुलिसकर्मी अकेले बैठकर अपने किए फ़ैसले और कामों को याद करेंगे.”
फिर बीजेपी पर निशाना साधते हुए अखिलेश यादव इसी पोस्ट में लिखा, ”भाजपा का फ़ार्मूला नंबर वन…पहले इस्तेमाल करो फिर बर्बाद करो! भाजपा का फ़ार्मूला नंबर दो… भाजपाई किसी के सगे नहीं हैं.”
‘सामान्य है ट्रांसफ़र का ऑर्डर’
हालांकि उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह सीजेएम के ट्रांसफर को एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बताते हैं.
उनके मुताबिक़ न्यायिक अधिकारियों की पोस्टिंग और स्थानांतरण राज्य सरकार द्वारा नहीं की जाती है, ये हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है. ऐसे में ये कह देना कि यह फ़ैसला राज्य सरकार के दबाव में लिया गया है, यह पूर्ण रूप से आपत्तिजनक है.
बीबीसी हिंदी से बात करते हुए उन्होंने कहा, ”जो लोग इसे अनुज चौधरी के ऊपर दिए गए फ़ैसले के दंड के रूप में देख रहे हैं, मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि भला किस पुस्तक में लिखा है कि स्थानांतरण एक दंड है. ट्रांसफर एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है और प्रत्येक राज्यकर्मी अपने करियर में कम से कम 17 से 21 बार ट्रांसफ़र से गुज़रता ही है.”
उनका कहना है, ”इसको दूसरा रंग देना कहीं से भी जायज़ नहीं है. अगर फ़ैसले से कोई मतभेद है तो उसे चुनौती दी जा सकती है लेकिन राजनीतिक रंग देकर ये कह देना कि यह आदेश देने के बाद दंडात्मक कार्रवाई है, इससे मैं पूर्णत: असहमत हूं. लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए इसे बिना वजह हवा देने में लगे हैं.”
हमने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता क़मर आलम से भी सीजेएम सुधीर के तबादले पर प्रतिक्रिया लेनी चाही लेकिन उन्होंने किसी भी तरह की टिप्पणी से इनकार कर दिया.
उनके मुताबिक़, ”कुछ लोग कोर्ट के इस आदेश को बीती 13 जनवरी के फ़ैसले से जोड़कर देख रहे हैं लेकिन मैं इस पर कुछ नहीं कहना चाहता. हम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हैं.”
हालांकि, उन्होंने कहा कि उन्हें याचिकाकर्ता यामीन की बेटी रज़िया ने फ़ोन करके अपनी हताशा ज़ाहिर की है.
उन्होंने बताया, ”रज़िया ने मुझसे पूछा कि अब हमें न्याय कैसे मिलेगा.”
दरअसल, संभल हिंसा के दौरान अनुज चौधरी की भूमिका को लेकर कई सवाल और विवाद खड़े हुए थे.
हिंसा के दौरान जब पुलिस अधिकारी दावा कर रहे थे कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई थी, तब चौधरी ने कहा था, ”एक पढ़े-लिखे आदमी को इस तरह के जाहिल मार देंगे. हम कोई पुलिस में मरने के लिए थोड़े ही भर्ती हुए हैं.”
कौन हैं अनुज चौधरी?
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अनुज चौधरी 2012 से पुलिस उपाधीक्षक पद पर हैं. वह खेल कोटे से भर्ती हुए थे. वो मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के रहने वाले हैं. अनुज चौधरी को अर्जुन पुरस्कार मिल चुका है. वो कुश्ती में भारत की तरफ से कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं.
इसके अलावा अनुज चौधरी सोशल मीडिया पर भी काफ़ी एक्टिव हैं. फ़ेसबुक पर उनके 1.3 मिलियन और इंस्टाग्राम पर 8.85 लाख फ़ॉलोवर्स हैं जिस पर वो अपनी वर्दी में रील्स शेयर करते रहते हैं.
पिछले साल संभल में एक शिव मंदिर को क़रीब 46 साल के बाद खोला गया था. समाचार एजेंसी एएनआई के एक वीडियो में मंदिर खुलने के बाद सीओ और एसपी ख़ुद इस मंदिर में मौजूद शिवलिंग की सफाई करते नज़र आ रहे थे.
अनुज चौधरी के कुछ चर्चित बयान
संभल में हुई हिंसा के दौरान और उसके बाद भी अनुज चौधरी अपने बयान और सोशल मीडिया पोस्ट के कारण सुर्खियों में रहे हैं. बीते साल मार्च महीने में होली और जुमे की नमाज़ पर दिए उनके बयान की काफ़ी चर्चा हुई थी.
संभल में हुई हिंसा के बाद सांप्रदायिक तौर पर शांति स्थापित करने की कोशिशों के तहत प्रशासन होली के त्योहार की तैयारी कर रहा था. बीते साल जिस दिन होली थी (14 मार्च), उसी दिन रमज़ान का दूसरा जुमा भी पड़ रहा था.
ऐसे में मीडिया से बातचीत में अनुज चौधरी ने कहा था, ”होली का दिन साल में एक बार आता है, जबकि जुमा साल में 52 बार आता है. यदि किसी को लगता है होली के रंग से उसका धर्म भ्रष्ट होता है तो वह उस दिन घर से ना निकले. मेरी सोच ये है कि रंग से कोई छोटा-बड़ा नहीं होता है.”
विपक्षी पार्टियों जैसे कांग्रेस, समाजवादी पार्टी के नेताओं ने अनुज चौधरी के इस बयान की तब आलोचना की थी. वहीं एक निजी चैनल से बातचीत के दौरान यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनका बचाव किया था.
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योगी आदित्यनाथ ने कहा था, “जो हमारा वह पुलिस अधिकारी है वो पहलवान रहा है, अर्जुन पुरस्कार विजेता रहा है. पूर्व ओलंपियन है. अब पहलवान की बात है और पहलवान की तरह बोलेगा तो कुछ लोगों को बुरा लगता है. लेकिन सच है उस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए.”
इसी के कुछ दिनों बाद अपने एक और बयान को लेकर अनुज चौधरी सुर्खियों में आए. यह बयान ईद को लेकर दिया गया था.
उन्होंने कहा था, ”अगर कोई ईद की सेवइयां खिलाना चाहता है तो उसे गुझिया भी खानी पड़ेगी. दोनों पक्ष खाएं, वहां गड़बड़ हो जाती है जहां एक पक्ष तो खाने को तैयार रहता है पर दूसरा पक्ष खा नहीं रहा. यहां भाईचारा ख़त्म हो जाता है. ”
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इससे पहले रामपुर में तैनाती के दौरान उनकी समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान से तीखी बहस भी हो चुकी है.
क़रीब दो साल पुरानी इस घटना में सपा नेता आज़म ख़ान मुरादाबाद कमिश्नर से मिलने जा रहे थे, इसी दौरान सीओ सिटी के पद पर तैनात अनुज चौधरी ने सभी लोगों को अंदर जाने से मना किया था.
तभी आज़म ख़ान ने उन्हें कहा कि समाजवादियों ने ही उनकी (पहलवानों की) पहचान की थी और उन्हें अखिलेश यादव का एहसान याद रखना चाहिए.
इस पर अनुज चौधरी ने जवाब दिया था कि उन्हें अर्जुन अवॉर्ड मिला है, जो किसी के एहसान से नहीं मिलता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित