इमेज कैप्शन, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के बीच बढ़ती राजनीतिक खींचतान की पृष्ठभूमि में कई सवाल उठ रहे हैं….में
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है. हाल के दिनों में सऊदी अरब के सरकारी चैनल ‘अल-इख़बारिया’ ने अमीराती सरकार पर आरोप लगाया है कि वह सऊदी अरब के ख़िलाफ़ मीडिया मुहिम को हवा दे रही है.
‘अल-इख़बारिया’ पर आठ दिन पहले जारी इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को नुक़सान पहुंचाने या ख़तरे में डालने वालों के ख़िलाफ़ ज़रूरी क़दम उठाने में नहीं हिचकिचाएगा.
रियाद और अबू धाबी के बीच बढ़ती राजनीतिक खींचतान की पृष्ठभूमि में ऐसे सवाल उठ रहे हैं जो सतही मतभेदों से आगे बढ़कर इस क्षेत्र के जियो-पॉलिटिक्स से जुड़े विवाद के बुनियादी पहलुओं के इर्द-गिर्द घूमते हैं. इनमें सबसे अहम सवाल यह है कि क्या व्यापार के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग दोनों खाड़ी पड़ोसियों के बीच एक अघोषित प्रतिद्वंद्विता का मैदान बन गए हैं?
यह सवाल हमें सीधे यमन की तरफ़ ले जाता है, जिसके पास हिंद महासागर, अरब सागर और लाल सागर के साथ 2,000 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा है. इसी रास्ते से दुनिया का लगभग 10 से 12 फ़ीसद व्यापार होता है.
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इमेज कैप्शन, सोमालीलैंड का बरबेरा पोर्ट (फ़ाइल फ़ोटो)
‘बाब अल-मंदाब’ के रणनीतिक जलडमरूमध्य पर भी यमन का क़ब्ज़ा है. यहां से सऊदी तेल टैंकरों सहित व्यापारिक और सैन्य जहाज़ गुजरते हैं.
‘रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट फ़ॉर डिफ़ेंस एंड सिक्योरिटी’ से जुड़े यमनी शोधकर्ता बरा शीबान बताते हैं कि यूएई ने क्षेत्रीय जलक्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण मौजूदगी बना ली है. इसके उदाहरण सोमालीलैंड के बरबेरा बंदरगाह में पूंजी निवेश, इरिट्रिया में फ़ौजी अड्डे और यमन में वैसे ठिकाने हैं जो यूएई ने 2025 के अंत में वहां बनाए थे.
बीबीसी न्यूज़ अरबी से बातचीत में शीबान ने कहा कि यूएई की क्षेत्रीय उपस्थिति समुद्री सीमाओं पर मज़बूत पकड़ और अमेरिका के साथ गहरे संबंधों पर आधारित है, जिसका मक़सद यह है कि मैरीटाइम सिक्योरिटी और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा से जुड़े अमेरिका के बोझ को कम किया जा सके.
उनके अनुसार, इस स्थिति ने क्षेत्र में यूएई और सऊदी अरब के बीच एक प्रकार की प्रतिद्वंद्विता को जन्म दिया है.
शीबान ने स्पष्ट किया कि यूएई ने यमन में सशस्त्र बलों और फ़ौजी अड्डों का जाल बिछाकर और सोमालीलैंड के बरबेरा बंदरगाह में निवेश के ज़रिए पोर्ट ऑफ़ अदन में अपनी उपस्थिति और प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की.
इसराइल क्या कर रहा है?
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इमेज कैप्शन, यूएई के क्षेत्रीय विस्तार को इसराइल के साथ सहयोग के तौर पर देखा जा रहा है (सांकेतिक तस्वीर)
उनका कहना था कि इस बंदरगाह पर कंट्रोल यूएई को क्षेत्रीय समुद्री सीमाओं में एक ख़ास बढ़त देता है.
हालांकि उनके अनुसार, यह योजना उस वक़्त ख़त्म हो गई जब सऊदी अरब ने यमनी सरकार के समर्थन से यूएई को यमनी बंदरगाहों और कुल मिलाकर लगभग पूरे देश से बाहर कर दिया.
दूसरी तरफ़ यूएई के राजनीतिक विशेषज्ञ अमजद ताहा का मानना है कि इस मामले को कई स्तरों पर परखा जा सकता है.
उनके मुताबिक़, “पहला, अदन यमन का प्राकृतिक दक्षिणी प्रवेश द्वार है और इसकी स्थिरता यमन के साथ-साथ पूरे क्षेत्र के लिए फ़ायदेमंद है. दूसरा, सोमालीलैंड दूसरी ओर एक लॉजिस्टिक पॉइंट है जो रास्तों में विविधता लाने, व्यापारिक जलमार्गों पर दबाव कम करने और स्थानीय विकास में मदद करता है.”
अदन और सोमालीलैंड के संबंधों पर वह कहते हैं कि जब दोनों तरफ़ सुविधाएं बेहतर होंगी तो समुद्री डकैती, स्मगलिंग और चरमपंथी समूहों की गतिविधियां कम होंगी.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ अरबी से बातचीत में कहा, “बाब अल-मंदाब आज एक वैश्विक मार्ग है, और इसमें किसी भी रुकावट का असर व्यापार, ऊर्जा, अनाज और यहां तक कि समुद्री बीमा पर पड़ता है. इसलिए इसकी सुरक्षा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि दोनों तरफ़ एक सक्रिय अर्थव्यवस्था से सुनिश्चित की जा सकती है, जो अराजकता और आतंकवादियों की हरकतों को रोकती है, जिसमें मुस्लिम ब्रदरहुड और जिहादी समूह भी शामिल हैं.”
यूएई के क्षेत्रीय विस्तार को इसराइल के साथ सहयोग के तौर पर देखा जा रहा है, ख़ास कर दोनों देशों के बीच संबंधों की बहाली और इसराइल के सोमालीलैंड को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने के बाद. ऐसी कार्रवाई लाल सागर के बारे में सऊदी हितों से टकराती है.
यमनी शोधकर्ता बरा शीबान कहते हैं, “अगर हम सऊदी नज़रिए को देखें, कम से कम सोमालीलैंड के संबंध में, तो सऊदी ये मानते हैं कि इसराइल और यूएई के बीच एक तरह का गठबंधन है, जिसका मक़सद उन क्षेत्रों में इसराइल की मौजूदगी को मज़बूत करना है जो पारंपरिक रूप से इसराइल के अनुकूल नहीं रहे हैं.”
उनके अनुसार, इसराइल 2020 में यूएई के साथ हुए ‘अब्राहम एकॉर्ड’ का इस्तेमाल कर रहा है ताकि दुनिया के इस महत्वपूर्ण हिस्से में अपनी मौजूदगी बढ़ा सके.
यूएई की क्या योजना है?
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इमेज कैप्शन, इसराइली विदेश मंत्री ने सोमालीलैंड के राष्ट्रपति से मुलाक़ात की थी
दूसरी तरफ़ अमीराती राजनीतिक विश्लेषक अमजद ताहा का कहना है कि समुद्री मार्ग यूएई के लिए केवल ‘जियोग्राफ़िकल लग्ज़री’ नहीं बल्कि उसकी आर्थिक समृद्धि का बुनियादी ढांचा है.
वो कहते हैं कि यूएई, पूर्व और पश्चिम, उत्पादक और उपभोक्ता के साथ-साथ बाज़ार और अवसरों के बीच एक पुल के तौर पर अपनी स्थिति पर निर्भर करता है.
उनके अनुसार, इन मार्गों में किसी भी रुकावट का तत्काल असर महंगाई और सप्लाई चेन पर पड़ता है जिससे बचने की कोशिश यूएई कर रहा है.
क्षेत्र में विभिन्न शक्तियों के आपसी हितों और शक्ति संतुलन में संभावित बदलावों ने इस स्थिति को और पेचीदा बना दिया है.
बरा शीबान के मुताबिक़, यमन में यूएई के बड़े पूंजी निवेश और ‘सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल’ के समर्थन के बावजूद वह (यूएई) नाकाम रहा और इसका फ़ायदा सऊदी अरब को हुआ.
हालांकि उनका कहना है कि यूएई अब भी इरिट्रिया में सैन्य तैनाती और सूडान में ‘रैपिड सपोर्ट फ़ोर्सेज़’ के समर्थन से अपनी मौजूदगी बनाए हुए है.
उनके अनुसार, भविष्य में अमीराती हस्तक्षेप इस बात पर निर्भर करेगा कि वह सऊदी अरब के साथ जलडमरूमध्यों और क्षेत्रीय जलक्षेत्र पर प्रतिद्वंद्विता के ख़तरों को किस रूप में देखता है.
अमजद ताहा का मानना है कि हालांकि बंदरगाहों और निवेश जैसे क्षेत्रों में आर्थिक ‘ओवरलैप’ मौजूद है लेकिन लाल सागर में सऊदी और अमीराती हित एक दूसरे के लिए फ़ायदेमंद हैं.
उन्होंने कहा, “दोनों देशों को एक जैसे ख़तरों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें समुद्री जहाज़ों की सुरक्षा की समस्या, हथियारों और ड्रग्स की स्मगलिंग, आतंकवादी समूह, हूती विद्रोहियों की धमकियां और व्यापारिक रुकावटें शामिल हैं.”
इसलिए, उनके अनुसार, लाल सागर में यूएई की योजना टकराव की नहीं बल्कि स्थिरता की योजना है.
सऊदी अरब क्या कर रहा है?
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इमेज कैप्शन, सऊदी अरब को आशंका है कि इसराइल, अमीरात के साथ हुए अब्राहम समझौते का इस्तेमाल दुनिया के इस महत्वपूर्ण हिस्से में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए कर रहा है (सांकेतिक तस्वीर)
अमजद ताहा ने कहा कि अगर प्रभाव का मतलब व्यापार की सुरक्षा, बंदरगाहों के काम में सुधार और स्थिरता का समर्थन है, तो यूएई एक वैश्विक व्यापारिक देश के रूप में अपने स्वाभाविक अधिकार का उपयोग कर रहा है.
उनके अनुसार अबू धाबी समुद्री सुरक्षा को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है जिसमें समुद्री डकैती और तस्करी के ख़िलाफ़ कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की रक्षा शामिल है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसी कोशिशें सामूहिक कार्रवाई के बिना कामयाब नहीं हो सकतीं.
उन्होंने कहा, “अबू धाबी ऐसा समुद्र नहीं चाहता जो बस उसका हो, बल्कि ऐसा समुद्र चाहता है जो सभी के काम आए.”
इसी दौरान सऊदी अरब का सोमालिया और मिस्र के साथ सैन्य गठबंधन ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिमी अख़बारों ने रिपोर्ट दी कि सऊदी अरब अफ़्रीका में यूएई के प्रभाव को कम करने के लिए सोमालिया और मिस्र के साथ एक नए सैन्य गठबंधन की कोशिश कर रहा है.
यह जानकारी तब सामने आई जब सोमालिया ने यूएई के साथ सुरक्षा और बंदरगाह से जुड़े समझौतों को रद्द कर दिया.
सोमालिया ने आरोप लगाया कि यूएई ने उसकी संप्रभुता का उल्लंघन किया है क्योंकि उसने यमन की ‘सदर्न ट्रांज़िशनल काउंसिल’ के नेता ईदरोस अल-ज़ुबैदी को सोमालीलैंड के रास्ते छिपाकर भेजा.
यह दावा सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन द्वारा किया गया जो यमन में क़ानूनी सरकार का समर्थन कर रहा है.
सोमालिया के लिए संप्रभुता का मुद्दा अधिक संवेदनशील हो गया है, क्योंकि वह सोमालीलैंड के साथ यूएई और इसराइल के संबंधों को अपनी सुरक्षा के लिए ख़तरा मानता है.
इस समय सऊदी अरब और मिस्र ने सोमालिया की एकता का समर्थन किया है और इसराइल द्वारा सोमालीलैंड को स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देने की निंदा की है.
इस तरह सऊदी अरब की तरफ़ से सोमालिया और मिस्र के साथ नए सैन्य गठबंधन की कोशिश को यूएई और इसराइल की क्षेत्रीय उपस्थिति बढ़ाने के प्रयासों का मुक़ाबला करने के तौर पर देखा जा सकता है.
यही वजह है कि क्षेत्र के महत्वपूर्ण जलमार्गों और बंदरगाहों के आसपास रणनीतिक तनाव बढ़ रहा है, जो सऊदी-अमीराती प्रतिद्वंद्विता और नए खिलाड़ियों के असर की वजह से अप्रत्याशित बदलावों का शिकार हो सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.