अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। देश में इस बार मानसून को लेकर चिंताजनक संकेत सामने आ रहे हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार जून के मध्य या उसके बाद प्रशांत महासागर में अलनीनो सक्रिय हो सकता है, जिसका सीधा असर भारत में मानसूनी वर्षा पर पड़ने की आशंका है। अलनीनो की स्थिति बनने पर आमतौर पर देश में बारिश कम होती है और गर्मी बढ़ जाती है।
ऑस्ट्रेलिया मौसम विभाग (ब्यूरो आफ मेट्रोलाजी) के मुताबिक फिलहाल प्रशांत महासागर में ला-नीना की स्थिति बनी हुई है, लेकिन यह धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है।
प्रशांत महासागर की सतह के नीचे गर्म पानी जमा हो रहा है, जो आने वाले महीनों में अलनीनो को जन्म दे सकता है।
जून के मध्य से अलनीनो सक्रिय होने की आशंका
मौसम विज्ञानियों का कहना है कि फरवरी के अंत तक हालात सामान्य यानी न्यूट्रल हो सकते हैं और मार्च से मई तक यही स्थिति बनी रह सकती है, लेकिन इसके बाद जून से धीरे-धीरे अलनीनो के सक्रिय होने के आसार बढ़ जाएंगे।
आमतौर पर लानीना के बाद आने वाला अलनीनो ज्यादा प्रभावी माना जाता है और यही स्थिति इस साल देखने को मिल सकती है।

अलनीनो तब बनता है, जब प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। इससे हवाओं की दिशा और गति बदल जाती है और इसका असर पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है।
मानसूनी बारिश में कमी, गर्मी बढ़ने का खतरा
भारत में इसका सबसे बड़ा प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून पर होता है। अलनीनो के दौरान हवा की दिशा बदल जाती है, जिससे बारिश कम होती है और कई इलाकों में सूखे जैसे हालात बन जाते हैं।
- पिछले अनुभव भी इस खतरे की ओर इशारा करते हैं। वर्ष 1986 में अलनीनो के कारण देश के कई हिस्सों में गंभीर सूखा पड़ा था।
- इसी तरह 2014 में मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 12 प्रतिशत कम रही थी। तीन साल पहले 2023 का अलनीनो भी भारत में खेती के लिए परेशानी का कारण बना था।
- इस बार भी मौसम वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर जून के बाद अलनीनो का असर बढ़ा, तो मानसून की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
मार्च में मानसून का अधिक सटीक आकलन संभव
स्काइमेट के अध्यक्ष जेपी शर्मा का मानना है कि इस बार अलनीनो धीरे-धीरे विकसित होगा। ऐसे मामलों में मानसून पर असर ज्यादा जटिल और कभी-कभी ज्यादा खतरनाक भी हो सकता है। हालांकि मौसम विभाग यह भी साफ कर रहा है कि अभी यह शुरुआती अनुमान है।