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अजित पवार के अचानक निधन के बाद न केवल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में बल्कि महाराष्ट्र में भी सत्ता का संतुलन बिगड़ गया है. इसे स्थिर होने में कुछ समय लगेगा.
महाराष्ट्र, जिसने पिछले कुछ सालों में कई उथल-पुथल का सामना किया है. लेकिन अब राज्य एक नई दुविधा का सामना कर रहा है.
समाधान के तहत पार्टी और ‘महायुति’ गठबंधन ने अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को उप मुख्यमंत्री का पद दिया है. महाराष्ट्र के गठन के बाद उप मुख्यमंत्री का पद पाने वाली वह पहली महिला हैं.
इस फै़सले के पीछे की राजनीति को एक तरफ़ रखते हुए, सवाल यह है कि सुनेत्रा पवार को इस नई और बड़ी ज़िम्मेदारी को संभालने में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और वो इससे कैसे निपटेंगी.
महाराष्ट्र ने अभी तक सुनेत्रा पवार की राजनीति, प्रशासनिक कार्य शैली का अनुभव नहीं देखा है. सुनेत्रा कभी राजनीतिक सुर्खियों में नहीं रही हैं. हाल ही में बारामती से सुप्रिया सुले के ख़िलाफ़ लोकसभा चुनाव लड़ने और फिर राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हुईं.
लेकिन अब वह राज्य के राजनीतिक परिदृश्य और प्रशासन में हैं और वास्तविक अनुभव की कमी के बावजूद अब नंबर दो के महत्वपूर्ण पद पर आसीन हैं. तो, अब उनके सामने कौन सी चुनौती है?
इसका सबसे संवेदनशील और प्रभावशाली पहलू वह हालात हैं जिससे वह एक शख़्स के रूप में गुज़र रही हैं. यह ज़िम्मेदारी उन पर तब आन पड़ी है जब उन्हें अपने दुख से पूरी तरह उबरने का समय भी नहीं मिला है.
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अनुभव की कमी
इस परीक्षा में सुनेत्रा पवार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उन्हें अभी तक सरकार में कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है. वह जून 2024 में सांसद बनी हैं. वह संसद की कुछ समितियों की सदस्य हैं. फ़िलहाल उनके पास यही एकमात्र अनुभव है.
इसलिए, सरकार कैसे काम करती है, विभाग कैसे चलाया जाता है, प्रशासनिक अधिकारियों के साथ कैसे काम करना है, मंत्री के रूप में काम करना, सभी क़ानूनों, नियमों और मंत्रालय की संरचना का अध्ययन करना, यह सब सुनेत्रा पवार के लिए नया होगा.
अजित पवार पिछले चार दशकों से इन सब बातों पर बारीकी से नज़र रख रहे थे और उन्हें हर बात की अच्छी जानकारी थी. इसलिए, प्रशासनिक अनुभवहीनता सुनेत्रा के लिए एक बड़ी चुनौती है.
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मौजूदा हालात के चलते सुनेत्रा पवार को शीर्ष स्तर की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी. उन्हें तैयारी का समय नहीं मिला.
लेकिन उनके लिए ये हालात बिल्कुल नए नहीं हैं. सुनेत्रा पवार बचपन से ही राजनीति और सरकार के काफ़ी क़रीब रही हैं. वह एनसीपी के वरिष्ठ नेता पद्मसिंह पाटिल की बहन हैं. पद्मसिंह पाटिल और शरद पवार की दोस्ती की वजह से सुनेत्रा और अजित पवार का विवाह हुआ था.
वो बारामती और पुणे में कई सामाजिक गतिविधियों में शामिल हैं. इसलिए, सरकार और सत्ता उनके लिए कोई नई बात नहीं है. सवाल यह है कि इतने सालों तक उन्होंने जो कुछ करीब से देखा है, उसे वो इस स्थिति में व्यवहार में कैसे लागू करेंगी?
पार्टी को संभालने का ज़िम्मा?
सुनेत्रा पवार के सामने न केवल मंत्रिमंडल में की ज़िम्मेदारी है, बल्कि उन्हें अजित पवार की ‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी’ की राजनीतिक दिशा भी संभालनी है.
पार्टी के पदों पर भले ही अलग-अलग नेता हों, लेकिन सुनेत्रा ही पार्टी का चेहरा होंगी. इसलिए सुनेत्रा को अपनी राजनीतिक कुशलता का प्रदर्शन करना होगा.
इस पार्टी का प्रबंधन करना आसान काम नहीं है. इसका एक मुख्य कारण यह है कि इस पार्टी में राजनीति का लंबा अनुभव रखने वाले कई नेता हैं. प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, छगन भुजबल, हसन मुशरिफ़, दिलीप वलसे-पाटिल और धनंजय मुंडे कुछ प्रमुख नाम हैं.
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इन सभी नामों के बीच, सुनेत्रा पवार को अब अपनी अलग पहचान बनानी होगी. पार्टी को अपने नियंत्रण में रखना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि ऐसी ख़बरें हैं कि कुछ नेताओं ने अपने फै़सले खु़द लेने शुरू कर दिए हैं.
इसके अलावा, कुछ विधायक अलग-अलग नेताओं के प्रति वफ़ादार हैं. वे अजित पवार की बात सुनते थे क्योंकि अजित पवार ने कई वर्षों तक उनके चुनावों में भाग लिया था. वो उनकी मदद भी करते थे.
लेकिन क्या वे सभी सुनेत्रा पवार के नेतृत्व को इतनी आसानी से स्वीकार कर लेंगे? क्या सुनेत्रा उनकी वफ़ादारी हासिल कर पाएंगी?
पार्टी की कार्यप्रणाली स्वतंत्र है. इसका वित्तीय हिसाब-किताब होता है. तालुकों और ज़िलों में इसके कार्यकर्ता हैं. कई राजनीतिक निर्णय इन सभी स्तरों पर लिए जाते हैं. सुनेत्रा पवार इन निर्णयों में कभी शामिल नहीं रहीं. उन्हें पार्टी मशीनरी चलाने का कोई अनुभव नहीं है. इसलिए, पार्टी पर नज़र रखना उनके सामने एक और बड़ी चुनौती है.
सहयोगी पार्टियों के साथ संबंध
मौजूदा राजनीति का यह सबसे अहम पहलू है. अजित पवार ने बीजेपी के साथ हाथ मिलाया और ऐसे समय में सत्ता में आए जब बीजेपी को वास्तव में उनकी ज़रूरत नहीं थी.
2024 के विधानसभा चुनावों के बाद भी बीजेपी बहुमत में थी और एकनाथ शिंदे-अजित पवार की सौदेबाज़ी की ताक़त समाप्त हो चुकी थी. फिर भी अजित पवार को सत्ता का बड़ा हिस्सा मिला. इसका कारण उनके सहयोगियों से उनके अच्छे संबंध हैं.
अजित पवार शरद पवार की राजनीति के रास्ते पर चलकर नए मित्र बनाने में सक्षम थे. भले ही विचारधाराओं में कभी-कभार मतभेद होते थे.
इसी तरह बीजेपी के साथ उनकी मित्रता विकसित हुई. उन्होंने देवेंद्र फडणवीस और अमित शाह जैसे बीजेपी नेताओं के साथ राजनीति में स्वतंत्र संबंध बनाए थे.
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अब इस कठिन परिस्थिति में सुनेत्रा पवार को भी राजनीति करनी होगी. इसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू बीजेपी की लाइन पर ‘राष्ट्रवाद’ के मूल्यों को बनाए रखना है. उन्हें भी इस मूल्य को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना होगा. यानी, एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ.
इस सरकार में अजीत पवार और एकनाथ शिंदे के बीच एक तरह की अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धा चल रही थी. अब सुनेत्रा पवार को भी सत्ता के उस संतुलन और संघर्ष का सामना करना होगा.
चुनौती यह है कि मुंबई और दिल्ली में सहयोगियों के साथ संबंध कैसे बनाए रखें. अजित पवार ने फडणवीस-शिंदे के साथ मिलकर जो नया सत्ता संतुलन बनाया था, उसे सुनेत्रा को बनाए रखना होगा.
दूसरा तरीक़ा है, स्थानीय स्तर पर नए मित्र बनाना. हाल ही में हुए नगर निगम चुनावों में अजित पवार ने बीजेपी के ख़िलाफ़ विभिन्न शहरों में कई बार नए गठबंधन बनाए थे. चुनौती यह होगी कि क्या वो गठबंधन की इस राजनीति को जारी रख पाएंगी.
पवार परिवार और एनसीपी का भविष्य
यह एक और कठिन चुनौती है. ऐसा लगता है कि पवार परिवार में पिछले दो सालों में जो कुछ हुआ, उसे भुलाकर नए रिश्ते बन रहे हैं.
शरद पवार, अजित पवार, सुप्रिया सुले और रोहित पवार की बैठकें बढ़ गई थीं. एनसीपी के दोनों गुटों के साथ आने और विलय को लेकर चर्चाएं शुरू हुई थीं. अब शरद पवार ने ख़ुद भी सार्वजनिक रूप से यह बात कही है और अजित पवार ने भी कहा था कि यह उनकी इच्छा थी.
इसलिए, अब समय आ गया है कि सुनेत्रा पवार, पवार परिवार और एनसीपी को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं. उन्हें स्वयं भी कुछ भूमिका निभानी होगी.
उप मुख्यमंत्री पद को तुरंत स्वीकार करना और शरद पवार का यह दावा करना कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी, स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.
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अगर विलय होना ही है, तो अब यह कैसे आगे बढ़ेगा, इसमें अजित पवार के परिवार की क्या भूमिका होगी, पार्टी का मालिक कौन होगा ये सभी बड़े सवाल हैं. अब जब उन्हें यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई है तो सुनेत्रा पवार की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है.
‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी’ का भविष्य अब उनके हाथों में है. यह देखना बाकी है कि वो अपने फ़ैसले ख़ुद लेंगी, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सलाह पर भरोसा करेंगी या बीजेपी जैसे सहयोगियों से सलाह लेंगी.
भारतीय राजनीति ने पहले भी मृत्यु या किसी अन्य अप्रत्याशित परिस्थिति के कारण बड़ी राजनीतिक ज़िम्मेदारी का बोझ झेला है.
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इंदिरा गांधी के निधन के बाद कुछ ही घंटों में यह जिम्मेदारी राजीव गांधी पर आ गई थी. राजीव गांधी के निधन के कुछ ही समय के बाद सोनिया गांधी को कांग्रेस की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी.
जब लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा, तो उनकी अनुपस्थिति में राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला.
इन तीनों ने राजनीति और सत्ता को क़रीब से देखा था, लेकिन वे इसमें सक्रिय रूप से शामिल नहीं थे. आगे उन्होंने क्या किया, इसका इतिहास सबके सामने है.
सुनेत्रा पवार को भी कई सालों तक सत्ता के क़रीब रहने के बावजूद इसी तरह के अनुभव हासिल हुए हैं. इसीलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इन परिस्थितियों से उत्पन्न चुनौतियों का क्या समाधान निकालती हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.