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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, दिव्यांगों के लिए ‘अनारक्षित’ पद अब सभी वर्गों के लिए खुले

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Apr 8, 2026


पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण नियमों पर एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि दिव्यांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) के लिए निर्धारित ”अनारक्षित” रिक्तियां एक ‘ओपन पूल’ की तरह हैं।

इसमें चयन का मुख्य आधार केवल मेरिट (योग्यता) होगी। कोर्ट के अनुसार, इन सीटों पर किसी भी सामाजिक या विशेष श्रेणी (एससी, एसटी, ओबीसी या जनरल) का पात्र उम्मीदवार नियुक्त किया जा सकता है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कलकत्ता हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कम अंक वाले सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को प्राथमिकता दी गई थी।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ”अनारक्षित” श्रेणी कोई अलग सामाजिक वर्ग नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए खुला मैदान है।

फैसला लिखते हुए जस्टिस सिंह ने कहा कि आरक्षण कानून में यह पूरी तरह स्थापित है कि अनारक्षित/ओपन श्रेणी किसी विशेष सामाजिक या सामुदायिक श्रेणी (जैसे एससी, एसटी या ओबीसी) को संदर्भित नहीं करती है। यह दुनिया भर के सभी उम्मीदवारों के लिए खुला है, चाहे वे किसी भी सामाजिक या विशेष श्रेणी से संबंधित हों।

यह मामला पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड में जूनियर इंजीनियर की भर्ती से जुड़ा था। यहां एक सीट ‘अनारक्षित (दिव्यांग-लो विजन)’ के लिए थी।

इसमें एक ओबीसी दिव्यांग उम्मीदवार ने 66.667 अंक प्राप्त किए, जबकि एक सामान्य वर्ग के दिव्यांग उम्मीदवार को 55.667 अंक मिले।

कंपनी ने अधिक मेरिट वाले ओबीसी उम्मीदवार को नियुक्त किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई ओबीसी, एससी या एसटी उम्मीदवार अधिक मेधावी है, तो उसे केवल इसलिए अनारक्षित दिव्यांग पद से बाहर नहीं किया जा सकता क्योंकि वहां सामान्य श्रेणी का उम्मीदवार उपलब्ध है।

कोर्ट के अनुसार, समान स्थिति वाले सभी दिव्यांगों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और मेरिट को ही प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

सक्षम अधिकारी ही माफ कर सकते हैं कम स्टांप ड्यूटी पर दंड: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कम स्टांप ड्यूटी पर लगने वाले दंड के मामले में एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि एक हाई कोर्ट कम स्टांप ड्यूटी पर लगने वाले वैघानिक दंड को माफ नहीं कर सकता। ऐसी शक्ति विशेष रूप से संबंधित स्टांप अधिनियम के तहत सक्षम अधिकारी के पास होती है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें लीज के दस्तावेज पर कम स्टांप ड्यूटी के भुगतान के साथ जुर्माने के भुगतान से छूट दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय लंबे समय से लंबित एक अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें लीज के दो दस्तावेज की वैधता को अपर्याप्त स्टांप के आधार पर चुनौती दी गई थी। यह अपील 2008 में दाखिल की गई थी।

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘हाई कोर्ट स्टांप ड्यूटी के भुगतान का निर्देश नहीं दे सकता और वह उस जुर्माने से छूट भी नहीं दे सकता है, जो कानून के तहत अनिवार्य है।’ इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि कर्नाटक स्टांप अधिनियम के तहत कम शुल्क का निर्धारण और जुर्माना लगाना उपायुक्त के अधिकार क्षेत्र में आता है।

स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार : सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति केवल छोड़ने या सेवा समाप्त करने का कार्य नहीं है, बल्कि यह एक कर्मचारी का विशिष्ट अधिकार है, जो आवश्यक सेवा वर्ष पूरे करने पर उपलब्ध होता है।

पीठ ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के 2019 के दो अलग-अलग आदेशों को चुनौती देने वाले एक बैंक द्वारा दायर अपीलों पर अपना निर्णय सुनाया।

जस्टिस जेके महेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा, ”यह स्पष्ट है कि यदि कोई कर्मचारी एक नवंबर, 1993 के बाद 20 वर्षों की योग्य सेवा पूरी करता है और नियुक्ति प्राधिकरण को तीन महीने से कम का नोटिस देता है, तो वह स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त हो सकता है।”

उच्च न्यायालय ने एक बैंक कर्मचारी को अंतिम लाभ देने के लिए निर्देश जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस में निर्दिष्ट तीन महीने की नोटिस अवधि पूरी होने के बाद या सेवा में उपस्थित होना बंद करने की तिथि से उसे स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त माना जाएगा।

सर्वोच्च अदालत ने उल्लेख किया कि कर्मचारी ने 4 अक्टूबर, 2010 को सामान्य प्रबंधक को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का नोटिस भेजा और इसके जवाब में क्षेत्रीय कार्यालय ने पेंशन नियमों के तहत एक नई आवेदन पत्र की मांग की।

बाद में चूंकि स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए नोटिस में निर्दिष्ट अवधि समाप्त हो गई थी, कर्मचारी ने 16 मई, 2011 से बैंक के साथ काम करना बंद कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि बैंक के साथ अपनी नौकरी समाप्त करने के लगभग आठ महीने बाद उस व्यक्ति को 5 मार्च, 2012 को संदिग्ध लेनदेन के आरोप में चार्जशीट किया गया। उसने बाद में हाई कोर्ट में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की अस्वीकृति और जांच की शुरुआत और बर्खास्तगी को चुनौती दी।

पीठ ने कहा कि 29 जून, 2011 को नोटिस अवधि समाप्त होने और काम बंद होने के बाद संप्रेषित अस्वीकृति का कोई महत्व नहीं।

कोर्ट ने कहा,”स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति केवल छोड़ने या सेवा समाप्त करने का कार्य नहीं, बल्कि यह विशिष्ट अधिकार है जो आवश्यक सेवा वर्ष पूरे करने पर उपलब्ध होता है।”

पीठ ने कहा कि चार्जशीट जारी करने और बर्खास्तगी के आदेश के बाद का कार्य भी कानून में उचित नहीं था। हाई कोर्ट के निर्देशानुसार, कर्मचारी सभी संबंधित सेवानिवृत्त लाभों का हकदार होगा। उसने बैंक को तीन महीने में लागू ब्याज के साथ सभी बकाया राशि देने का निर्देश दिया।

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