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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अपनी एक टिप्पणी में कहा कि यूज़र्स के ऑनलाइन कंटेंट को रेगुलेट करने के लिए एक ऑटोनॉमस बॉडी यानी स्वायत्त निकाय की ज़रूरत है जो ‘दबाव से मुक्त’ हो.
चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (सीजेआई) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि ‘ख़ुद से ही बना लिए गए तंत्र’ ऑनलाइन कंटेंट को रेगुलेट करने में नाकाम रहे हैं क्योंकि ग़ैर-क़ानूनी कंटेंट को हटाने में समय लगता है.
सुप्रीम कोर्ट की बेंच पॉडकास्टर रणवीर अलाहाबादिया और अन्य लोगों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी.
याचिकाओं में इस साल फ़रवरी में यूट्यूब शो ‘इंडियाज़ गॉट लेटेंट’ पर किए गए विवादित कमेंट्स से जुड़ी एफ़आईआर को चुनौती दी गई थी.
मार्च में, कोर्ट ने इस मामले का दायरा बढ़ाते हुए केंद्र सरकार से यूट्यूब और दूसरे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर अश्लीलता के ख़िलाफ़ रेगुलेशन का ड्राफ़्ट बनाने की संभावना तलाशने को कहा था.
गुरुवार को हुई सुनवाई में, सीजेआई सूर्यकांत ने भारत में ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर यूज़र-जनरेटेड कंटेंट के मामले में जवाबदेही की कमी पर चिंता जताई.
लाइव लॉ के मुताबिक़ चीफ़ जस्टिस ने कहा, “मैं अपना ख़ुद का चैनल बनाता हूं और मेरी किसी के लिए कोई ज़िम्मेदारी नहीं है. किसी को तो जवाबदेह होना ही होगा.”
केंद्र सरकार की तरफ़ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि बोलने की आज़ादी “ग़लत बर्ताव की वजह” नहीं बन सकती.
कोर्ट के सुझावों से कंटेंट क्रिएटर्स और डिजिटल राइट्स एक्टिविस्ट्स के कुछ ग्रुप्स में चिंता बढ़ गई है, जिन्हें डर है कि ऑनलाइन कंटेंट को रेगुलेट करने वाली कोई संस्था सेंसरशिप जैसी होगी.
मौजूदा रेगुलेशन क्या हैं और सुप्रीम कोर्ट क्या चाहता है?
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अभी ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर यूज़र के कंटेंट, इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) रूल्स, 2021 के अंदर आते हैं.
इन नियमों के तहत, यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म ऐसे कंटेंट, जो भारतीय क़ानूनों के तहत ग़ैर-क़ानूनी हैं, उन्हें हटाने के लिए ज़िम्मेदार हैं.
नियमों के मुताबिक़, अगर कोई सरकारी एजेंसी किसी प्लेटफ़ॉर्म को कोई कंटेंट हटाने के लिए नोटिस भेजती है, तो उसे 36 घंटे के अंदर उस आदेश का पालन करना होता है.
अगर कोई इंटरनेट यूज़र शिकायत करता है, तो प्लेटफ़ॉर्म की शिकायत सुलझाने वाली कमिटी को 24 घंटे के अंदर शिकायत की जानकारी मिलने की बात बतानी होगी और 15 दिनों के अंदर ज़रूरी कार्रवाई करनी होगी.
इसे देखते हुए, कोर्ट ने कहा कि मौजूदा सिस्टम में, ग़ैर-क़ानूनी कंटेंट के ख़िलाफ़ ‘रिस्पॉन्स टाइम’ अक्सर मक़सद को ख़त्म कर देता है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक़, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया, “जहां कंटेंट को देशविरोधी या समाज के नियमों को तोड़ने वाला माना जाता है, तो क्या बनाने वाला इसकी ज़िम्मेदारी लेगा? क्या सेल्फ़-रेगुलेशन काफ़ी होगा?”
“…एक बार जब ग़लत कंटेंट अपलोड हो जाता है और जब तक अधिकारी प्रतिक्रिया देते हैं, तब तक वह कंटेंट लाखों दर्शकों तक वायरल हो चुका होता है, तो आप उसे कैसे कंट्रोल करते हैं?”
इस आधार पर जजों ने सुझाव दिया कि एक स्वायत्त निकाय, “जो इसका फ़ायदा उठाने वालों और राज्य के असर से मुक्त हो” एक रेगुलेटरी उपाय के तौर पर ज़रूरी है.
द हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, कोर्ट ने केंद्र को लोगों की राय लेने के बाद चार हफ़्ते के अंदर यूज़र-जनरेटेड कंटेंट को रेगुलेट करने के लिए गाइडलाइंस का ड्राफ़्ट बनाने का भी निर्देश दिया है.
नया एथिक्स कोड
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इस बीच, सूचना और प्रसारण मंत्रालय एक एथिक्स कोड पर विचार कर रहा है. यह इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी रूल्स, 2021 के ज़रिए लाए गए डिजिटल मीडिया कोड ऑफ़ एथिक्स को बदल देगा.
बीबीसी को प्रस्तावित बदलावों की एक कॉपी मिली है, हालांकि यह अभी पब्लिक में उपलब्ध नहीं है.
सरकार ने प्रस्ताव में जिन बदलावों की बात कही है, उनमें अलग-अलग उम्र के ग्रुप (यू/ए, ए वगैरह) के लिए ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट को रेट करने का प्रस्ताव शामिल है. इसमें कंटेंट के मामले में गाइडलाइंस भी बताई गई हैं जो अश्लीलता और दूसरे ऐसे कंटेंट को परिभाषित करेंगी जिनकी इजाज़त नहीं है.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) से बने कंटेंट के लिए, प्रस्तावित बदलाव में कहा गया है कि नियम पिछले महीने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की ओर से सार्वजनिक सलाह के लिए पब्लिश किए गए ड्राफ़्ट नियमों से लिए जाएंगे.
अगर ये बदलाव लागू होते हैं, तो ये सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, ओटीटी स्ट्रीमिंग सर्विस और डिजिटल न्यूज़ प्लेटफ़ॉर्म पर सभी डिजिटल कंटेंट पर लागू होंगे.
भारत में इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी पॉलिसी को कवर करने वाली पत्रकार अदिति अग्रवाल ने एक एनालिसिस में लिखा है कि संशोधन का वह हिस्सा जो अश्लीलता को परिभाषित करने से जुड़ा है, वह काफ़ी हद तक केबल टेलीविज़न नेटवर्क एक्ट, 1995 के तहत प्रोग्राम कोड से लिया गया है.
इस मामले में एक पक्ष की तरफ़ से पेश हुए एक वकील ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी से पुष्टि की है कि प्रस्तावित संशोधन कोर्ट और सभी पक्षों को भेज दिए गए हैं.
इस पर पुष्टि के लिए बीबीसी ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव के ऑफ़िस और उनके सचिव से फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
इसकी पुष्टि के लिए और सरकार से इस पर टिप्पणी के लिए बीबीसी ने दोनों के ही ऑफ़िस को ईमेल भेजे हैं. अगर कोई जवाब मिलता है तो स्टोरी को अपडेट कर दिया जाएगा.
लोग क्या कह रहे हैं?
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इस मामले पर डिजिटल राइट्स एक्सपर्ट्स और कंटेंट क्रिएटर्स से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं.
ग़ैर लाभकारी संस्था टेक ग्लोबल इंस्टीट्यूट में डिजिटल पॉलिसी एंड ह्यूमन राइट्स प्रोग्राम्स के प्रमुख प्रतीक वाघरे ने बीबीसी को बताया कि ‘यूज़र-जनरेटेड कंटेंट’ शब्द बहुत बड़ा है.
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने इस शब्द को परिभाषित नहीं किया है और इसका मतलब इंस्टाग्राम स्टोरी या सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर कमेंट भी हो सकता है.
वाघरे ने यह भी कहा कि इस बारे में स्पष्टता की कमी है कि सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के मुताबिक़ स्वायत्त निकाय कंटेंट को पब्लिश होने से पहले जांचेगी या बाद में देखेगी.

वाघरे की बातों से व्यंग्यकार माद्री काकोटी भी सहमति जताती हैं. माद्री काकोटी, डॉ. मेडुसा के नाम से जानी जाती हैं. इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर उनके लाखों फॉलोअर्स हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि यह मुमकिन नहीं है कि यह ऑटोनॉमस बॉडी किसी प्रभाव से आज़ाद हो.
डॉ. मेडुसा ने कहा कि वैसे तो कोई भी रेगुलेटरी बॉडी एक अच्छी पॉलिसी बनाती है, लेकिन मौजूदा सरकार के ‘ट्रैक रिकॉर्ड’ को देखते हुए उन्हें शक है कि इस बॉडी का ग़लत इस्तेमाल कुछ ख़ास तबकों को परेशान करने के लिए किया जाएगा.
नए एथिक्स कोड की रिपोर्ट्स पर, उन्हें लगता है कि ‘एंटी-नेशनल यानी देश विरोधी’ और ‘ऑब्सीन यानी अश्लील’ जैसे शब्द बहुत बड़े हैं और सरकार की बुराई करने वाले कंटेंट क्रिएटर्स को चुप कराने के लिए इनका ग़लत मतलब निकाला जा सकता है.
हालांकि, साइबर लॉ के एक्सपर्ट और सीनियर वकील पवन दुग्गल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ऑटोनॉमस बॉडी का प्रस्ताव देकर “सही” किया है.
उन्होंने कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी और दूसरे अश्लील कंटेंट जैसे मामलों में, ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म की ओर से उन्हें हटाने में लगने वाला समय पीड़ित को ख़तरे में डालता है.

कुछ लोग चिंता जता रहे हैं कि नया बनाया जा रहा स्वायत्त निकाय ऑनलाइन कंटेंट पर ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण कर सकता है और कहीं ऐसा न हो कि वह सेंसरशिप की तरह काम करने लगे.
इस पर विशेषज्ञ दुग्गल का कहना है कि सरकार को ही ज़रूरी नियम, निगरानी और संतुलन का ध्यान रखना चाहिए.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इंटरनेट को केबल टीवी वाले पुराने क़ानून से नियंत्रित करना ठीक नहीं होगा.
दुग्गल ने कहा कि 1990 के दशक में टीवी के लिए बनाया गया क़ानून आज के इंटरनेट पर लागू नहीं हो सकता. इंटरनेट की तकनीक और उपयोग बिल्कुल अलग है, इसलिए 2025 की ज़रूरतों को देखते हुए नियम बनाने होंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.