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गुजरात का सूरत शहर हीरे की कटाई और पॉलिशिंग के कारोबार के लिए दुनिया भर में मशहूर है. अब यह शहर औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के एक मॉडल के साथ दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींच रहा है.
इतना ही नहीं, सूरत के लोग कार्बन उत्सर्जन में कमी करके उससे भारी मुनाफ़ा भी कमा रहे हैं.
भारत की पहली एमिशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) विकसित करने के लिए किए जा रहे इस स्थानीय प्रयोग को साल 2025 के अर्थशॉट पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया है.
अर्थशॉट पुरस्कार दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरण पुरस्कारों में से एक है. सूरत के साथ बोगोटा और ग्वांगझू सहित दो अन्य शहर भी फ़ाइनल राउंड में है.
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कमलेश नाइक कपड़ा निर्माता हैं और वो सूरत में एक मध्यम स्तर की फ़ैक्ट्री चलाते हैं. यह फैक्ट्री ईटीएस में शामिल औद्योगिक इकाइयों में से एक है.
कपड़ा निर्माण के साथ ही कमलेश नाइक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के कारोबार से भी कुछ लाख रुपये कमाते हैं. दरअसल वो अपनी फ़ैक्ट्री में पीएम का उत्सर्जन कम करके ऐसा करते हैं.
पिछले कुछ सालों में सूरत के कारखाना मालिकों के लिए ईटीएस आय का एक नया स्रोत बन गया है.
उन्होंने वास्तव में यह आय अर्जित करने के लिए क्या किया है?
इस प्रश्न का सीधा उत्तर यह है कि उन्होंने अपने कारखानों में उत्पादन के लिए ऐसे तरीके अपनाए हैं जिससे कार्बन उत्सर्जन को कम किया जा सके.
वायु प्रदूषण को नियंत्रण में रखने और उद्योगों को फ़ायदेमंद रखने के मक़सद से बनाई गई यह योजना, उत्सर्जन को एक ऐसी वस्तु के रूप में मानती है जिसे ख़रीदा और बेचा जा सकता है.
इस उत्सर्जन की रियल टाइम मॉनिटरिंग भी की जा सकती है.
इस योजना की सफलता को देखते हुए, गुजरात राज्य इस मॉडल को सूरत और अहमदाबाद से आगे ले जाने की तैयारी कर रहा है.
सूरत ईटीएस क्या है?
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सूरत ईटीएस, एमिशन्स मार्केट एक्सेलेरेटर (ईएमए) के प्रयासों का परिणाम है.
ईएमए ने दुनिया के पहले कैप-एंड-ट्रेड मार्केट को डिजाइन और लॉन्च करने में मदद की है.
ईएमए शिकागो यूनिवर्सिटी के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट और अब्दुल लतीफ़ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब (जे-पाल) की एक संयुक्त पहल है.
इस पहल की शुरुआत साल 2019 में सूरत में 294 यूनिट्स के साथ हुई थी और अब इसका विस्तार अहमदाबाद में 120 अतिरिक्त यूनिट्स के साथ किया जा चुका है.
अब गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीपीसीबी), राज्य के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसका विस्तार करने की योजना बना रही है.
जीपीसीबी के सदस्य सचिव देवांग ठाकर ने बीबीसी को बताया, “सूरत में यह भारत का पहला ईटीएस है. इटीएस ने पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के लिए कैप-एंड-ट्रेड मार्केट मॉडल पेश किया है.”
“कपड़ा, रसायन और रंग बनाने वाली लगभग सभी फ़ैक्ट्रियों के मालिक इसमें शामिल हुए हैं, और इस व्यापार के कारण प्रदूषण में भी लगभग 20-30 प्रतिशत की कमी आई है.”
सूरत में पांडेसरा, सचिन, पलसाना और कडोदरा जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थित 342 इकाइयों में से, 168 इकाइयों को शुरू में ईटीएस में भाग लेने के लिए नोटिफ़ाइ किया गया था.
जबकि अन्य 174 उद्योगों से उत्सर्जित प्रदूषण की मॉनिटरिंग पारंपरिक रेग्युलेटरी सिस्टम के माध्यम से की गई थी.
देवांग ठाकर ने कहा, “यह पाया गया कि ईटीएस में भाग लेने वाली 168 यूनिट्स ने उत्सर्जन में कमी की है.”
यह कैसे हुआ संभव?
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कारखाने के मालिकों को अपने यूनिट्स में उत्सर्जन कम करने के लिए विभिन्न तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया.
ईएमए के सह-अध्यक्ष माइकल ग्रीनस्टोन ने बीबीसी को बताया, “सबसे पहले तो इस योजना के अपनाने की लागत पर क़रीबी निगरानी की गई. हमारी स्टडी के मुताबिक़ कम्प्लायन्स कॉस्ट गिरकर 11 प्रतिशत हो गई थी.”
उन्होंने आगे बताया कि प्लान्ट में कोयले के उपयोग पर कर्मचारियों को ट्रेनिंग देकर अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया गया है. अतिरिक्त कोयले को जलाना बंद कर दिया गया है. इससे उत्पादन लागत और कारखाने की कुल इनपुट लागत भी कम हो गई है.
पर सवाल ये है कि ईटीएस कैसे काम करता है? फै़क्ट्री मालिक इससे कैसे कमाई करते हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार, एमिशन ट्रेडिंग स्कीम एक ऐसा बाज़ार है जहां शेयर बाजार में शेयरों के व्यापार की तरह ही पार्टिकुलेट मैटर का व्यापार किया जाता है.
यह काम जीपीसीबी की तरफ से उपलब्ध कराए गए सॉफ्टवेयर की मदद से ऑनलाइन किया जाता है. यह सॉफ्टवेयर कारखानों में स्थापित किया जाता है और जीपीसीबी इसकी निगरानी करता है.
जीपीसीबी ने उद्योगों में उत्पादन की प्रक्रिया दौरान उत्सर्जित किए जाने वाले पीएम की विशिष्ट सीमाएं तय की हैं. सभी उद्योगों का कुल उत्सर्जन इस सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए.
उस सीमा को परमिटों में बांटा गया है, जिनकी नीलामी हर महीने के पहले मंगलवार को की जाती है.
इसमें, कारखाने के मालिक इन परमिटों के लिए बोली लगाते हैं और अपने उत्पादन चक्र के अनुसार इन्हें ख़रीदते हैं. यानी ज़्यादा प्रोडक्शन के सीज़न में ज़्यादा और कम मांग वाले सीज़न में कम.
कारखाने अपने लिए मिले परमिट की सीमा तक ही पीएम उत्सर्जित कर सकते हैं.
अगर इससे अधिक उत्सर्जन करना चाहते हैं, तो वे अन्य कारखाने के मालिकों से अतिरिक्त परमिट ख़रीद सकते हैं, जिनका उत्सर्जन उस दौरान कम रहा हो. दूसरे शब्दों में, कारखाने के मालिकों को अपने परमिटों का व्यापार करने की अनुमति है.
कम हुई कोयले की खपत
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दक्षिण गुजरात टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष जितेंद्र वखारिया ने बीबीसी को बताया, “इस परमिट की लागत 5 रुपये प्रति किलोग्राम से लेकर 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है, जो उत्पादन चक्र और परमिट की मांग और आपूर्ति जैसे कारकों पर निर्भर करती है.”
“यदि सभी इकाइयां पूरी क्षमता से चल रही हैं और कारखाने को अधिक घंटों तक चलाने की आवश्यकता है, तो परमिट की लागत बढ़ जाती है, जबकि यदि उत्पादन चक्र छोटा है, तो इसकी लागत कम होती है.”
जितेंद्र वखारिया उन पहले लोगों में से एक हैं, जिन्होंने फ़ैक्ट्री मालिकों को ईटीएस में शामिल होने के लिए राजी किया.
उत्सर्जन में कमी लाने के अपने अनुभव को साझा करते हुए जितेंद्र वखारिया ने कहा, “इस योजना में शामिल होने से पहले मेरे कारखानों में कोयले की खपत उत्पादन चक्र के आधार पर प्रतिदिन 35 से 40 टन थी.”
“लेकिन इस योजना में शामिल होने के बाद और कर्मचारियों की ट्रेनिंग और नियमों के पालन के कारण, दैनिक खपत घटकर 30 से 31 टन हो गई है.”
ईटीएस से पहले, प्रति इकाई कोयले की औसत दैनिक खपत 50 टन थी. अब इसमें 25% की कमी आई है. उत्सर्जन में यह कमी ईटीएस में भाग लेने वाली कंपनियों के बीच साझा की जाती है.
ट्रेडिंग कैसे की जाती है?
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परमिट हर महीने के पहले मंगलवार को ख़रीदे जाते हैं. जो फ़ैक्ट्री मालिक अपने परमिट बेचना या खरीदना चाहते हैं, वे उसी दिन सॉफ्टवेयर पर अपनी कीमतें दर्ज करते हैं.
वखारिया ने बताया, “बोली की क़ीमत सॉफ्टवेयर ही मांग के आधार पर तय करता है और लोग उसी के अनुसार कमाते हैं.”
उदाहरण के लिए, संयम सिल्क प्राइवेट लिमिटेड के मालिक कमलेश नाइक ने कहा, “कुछ दिनों में हमें अधिक काम करना पड़ता है और उन दिनों के लिए हमें ज़रूरत के हिसाब से परमिट ख़रीदना पड़ता है.”
उस अवधि के दौरान, उत्पादन के लिए इकाइयों के उत्सर्जन की सीमा 15 हज़ार किलोग्राम से लेकर 50 हज़ार किलोग्राम पीएम पीएम होती है.
नाइक ने कहा, “किसी के पास 10 हज़ार किलोग्राम का परमिट हो सकता है और उसे पाँच हज़ार किलोग्राम के लिए अतिरिक्त परमिट की जरूरत हो सकती है. ऐसे लोग अतिरिक्त परमिट हासिल करने के लिए नीलामी में भाग लेते हैं.”
जब नाइक का प्रोडक्शन अधिक था, तो उन्होंने ख़ुद दस रुपये और 25 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से परमिट ख़रीदे.
हालांकि, ठाकर ने कहा कि पिछले कुछ महीनों से ट्रेडिंग निलंबित है.
उन्होंने कहा, “परमिट ट्रेडिंग के दौरान जीएसटी दिशानिर्देशों का पालन करने के लिए सॉफ्टवेयर को अपडेट करने की ज़रूरत है. यह जल्द ही फिर से चालू हो जाएगा.”
वखारिया ने कहा, “एक इकाई जो बीस हज़ार किलोग्राम पीएम उत्सर्जन के लिए परमिट ख़रीदती है और नीलामी में परमिट की कीमत 20 रुपये प्रति किलोग्राम तय की जाती है, तो उसे चार लाख रुपये में परमिट ख़रीदना होता है.”
“जो इकाई एक निश्चित अवधि के दौरान उत्पादन नहीं करती है, वह अपने परमिटों का ट्रेडिंग करके 4 लाख रुपये कमाती है.”
मॉनिटरिंग कैसे की जाती है?
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जीपीसीबी के अधिकारियों और ईएमए विशेषज्ञों के अनुसार, सूरत में ईटीएस शुरू करने में पहली और मुख्य चुनौती कारखाना मालिकों को कुल उत्सर्जन डेटा पंजीकृत करने के लिए राजी करना था.
ठाकर ने कहा, “फै़क्ट्री मालिकों को यह स्पष्ट नहीं था कि सरकार उत्सर्जन डेटा का उपयोग किस मक़सद से करना चाहती है. कई बैठकों के बाद, वे आश्वस्त हो गए और उत्सर्जन की निगरानी के लिए चिमनियों में विशेष उपकरण लगाए गए.”
सूरत में कम से कम 294 और अहमदाबाद में 120 औद्योगिक इकाइयाँ हैं. कोयले जैसे ठोस ईंधन का उपयोग करने वाली और अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में स्थित औद्योगिक इकाइयों को सतत उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (सीईएमएस) के लिए चुना गया था. सीईएमएस उद्योगों की चिमनियों पर मिनट-दर-मिनट डेटा प्रदान करता है.
जीपीसीबी के अध्यक्ष आरबी बारड ने बीबीसी को बताया, “ईटीएस का बैकबोन सीईएमएस से प्राप्त होने वाली सुसंगत और सटीक जानकारी है.”
सीईएमएस डिवाइस एक सॉफ्टवेयर से जुड़ा होती है, जो रियल टाइम डेटा मुहैया कराता है, और जीपीसीबी अंततः यह डेटा उद्योगों को उपलब्ध कराता है.
जीपीसीबी यह सुनिश्चित करता है कि उद्योगों के पास उत्सर्जन के लिए पर्याप्त परमिट हों.
सूरत और अर्थशॉट पुरस्कार
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सूरत को इस पहल के लिए अर्थशॉट पुरस्कार के तीन फाइनलिस्टों में से एक के रूप में चुना गया है. इसके अन्य दो फाइनलिस्ट बोगोटा शहर और ग्वांगझो शहर हैं.
इस संबंध में ज़रूरी निष्कर्ष शिकागो विश्वविद्यालय के माइकल ग्रीनस्टोन, येल विश्वविद्यालय से रोहिणी पांडे और निकोलस रयान और वारविक विश्वविद्यालय के अनंत सुदर्शन के किए गए अध्ययनों से मिले.
अध्ययन में पाया गया कि सूरत में किए गए प्रयोगों से पीएम उत्सर्जन में भारी कमी आई है और उद्योगों को अच्छा रेवेन्यू प्राप्त हुआ है.
पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, वे कैप-एंड-ट्रेड मार्केट मॉडल को ग्लोबल साउथ में फैलाने की योजना बना रहे हैं, जिससे अर्थव्यवस्था के विकास के साथ प्रदूषण को कम करने के लिए एक कॉस्ट इफ़ेक्टिव और एक सतत दृष्टिकोण दिया जा सके.
इस स्टडी में प्रदूषण में कमी के प्रमाण पेश किए गए हैं. 300 से अधिक कारखानों को शामिल करते हुए किए गए इस अध्ययन में पाया गया कि पारंपरिक नियमों की तुलना में प्रदूषण में कम से कम 25 प्रतिशत की कमी आई है. शहरों में उद्योगों के लिए कम्प्लायन्स कॉस्ट में 11 प्रतिशत की कमी आई है.
ठाकर ने कहा, “ईटीएस अच्छा काम कर रही है. प्लान्ट्स के पास 99 प्रतिशत समय में अपने उत्सर्जन को कवर करने के लिए पर्याप्त परमिट थे, जबकि मार्केट के बाहर के संयंत्रों ने 66 प्रतिशत समय के दौरान अपनी प्रदूषण सीमा का पालन किया.”
येल यूनिवर्सिटी में इकॉनोमिक्स के एसोसिएट प्रोफ़ेसर निकोलस रयान ने परियोजना की मुख्य बातों के बारे में बताया था, “हमने गुजरात पॉल्यूशन कन्ट्रोल बॉर्ड के साथ थर्ड पार्टी पॉल्यूशन मॉनिटरिंग और उत्सर्जन डेटा को लोगों के साथ साझा करने जैसे नीतिगत उपायों का परीक्षण करने के लिए एक दशक से अधिक समय तक एक साथ काम किया है.”
उनके मुताबिक़, यह सहयोग पूरे भारत में पर्यावरण नीति की दिशा तय कर रहा है.
अध्ययन करने वालों ने पाया कि मार्केट ने पर्यावरण कानूनों का पालन होना बढ़ाया है और यह अच्छी तरह से काम कर रहा है. उनके मुताबिक़ मार्केट में भाग लेने वाले प्लान्ट्स के उत्सर्जन में कमी, शुरुआती सीमा और व्यापार दोनों की वजह से है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.