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सर्दियों के मौसम में सुबह उठना, तैयार होकर काम पर जाना कई लोगों को सबसे मुश्किल काम लगता है. हवाएं इतनी सर्द होती हैं कि रज़ाई या कंबल से निकलने का मन ही नहीं करता. उत्तर भारत में कोहरा और सर्द हवाएं लोगों के काम को भी प्रभावित करती हैं.
लेकिन ठंड का असर सिर्फ़ हमारी दिनचर्या तक सीमित नहीं है. क्या आप जानते हैं कि ठंडी हवाएं आपके स्वास्थ्य पर सीधा और गंभीर असर डाल सकती है?
पीआईबी ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ‘भारत में आकस्मिक मृत्यु और आत्महत्याएं’ शीर्षक वाली एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि 2019 और 2023 के बीच शीत लहर की चपेट में आने से कुल 3,639 लोगों की मौत हुई.
सर्दियों में चलने वाली ठंडी हवाओं का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है, इसे समझने के लिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने कई हेल्थ एक्सपर्ट्स से बात की.
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने शीत लहर और फ्रॉस्ट से निपटने के लिए एक्शन प्लान तैयार करने से जुड़ी राष्ट्रीय गाइडलाइंस, 2021 में बताया है कि भारत की लगभग 90.90 करोड़ आबादी ऐसे इलाकों में रहती है, जिन्हें मुख्य शीत लहर क्षेत्र या कोर कोल्ड वेव ज़ोन, माना गया है.
भारत के उत्तरी हिस्से, ख़ासकर पहाड़ी इलाके और उनसे सटे मैदानी क्षेत्र, कोर कोल्ड वेव ज़ोन में आते हैं. यह ज़ोन देश के 17 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैला हुआ है. गाइडलाइन्स के अनुसार बच्चे और बुज़ुर्ग इसके प्रति ज़्यादा संवेदनशील होते हैं.
एनडीएमए के अनुसार, ठंडी लहरों का स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है. भारत में साल 2001 से 2019 के बीच अलग-अलग राज्यों में ठंड की वजह से 4,712 लोगों की मौत हुई है.
सर्द हवाएं शरीर को कैसे नुक़सान पहुंचाती हैं?

अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी के प्रमुख जर्नल जेएसीसी में 2024 में एक अध्ययन प्रकाशित हुआ. इसे यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी (ईएससी) कांग्रेस 2024 में पेश किया गया था.
इसमें कहा गया कि बहुत ठंडे मौसम और अचानक आने वाली ठंडी लहरें हार्ट अटैक का ख़तरा बढ़ा देती हैं. इस अध्ययन के मुताबिक, ख़ास बात यह है कि यह ख़तरा ठंड लगते ही नहीं, बल्कि ठंड लगने के 2 से 6 दिन बाद सबसे ज़्यादा होता है.
नई दिल्ली के वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज और सफ़दरजंग अस्पताल में कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष, डॉक्टर एचएस इस्सर कहते हैं, “जैसे ही ठंडी हवाएं शरीर को लगती हैं, हमारा शरीर अपने आप सर्वाइवल मोड में चला जाता है. इस दौरान शरीर का सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम सक्रिय हो जाता है, जिससे रक्त नलिकाएं सिकुड़ जाती हैं.”
वह कहते हैं कि इसका सीधा असर ब्लड प्रेशर और दिल की कार्यक्षमता पर पड़ता है.
“नतीजा यह होता है कि ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है और दिल को सामान्य से ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है.”
डॉक्टर इस्सर के मुताबिक, ठंड में शरीर एड्रेनालिन और कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन भी ज़्यादा मात्रा में छोड़ता है. ये हार्मोन दिल की धड़कन तेज़ करते हैं, नसों को और संकुचित करते हैं और खून में सूजन बढ़ाते हैं.
उनका कहना है कि ठंड के मौसम में लोग पानी कम पीते हैं, जिससे खून थोड़ा गाढ़ा हो जाता है.
वह बताते हैं, “सर्दियों में प्लेटलेट्स ज़्यादा सक्रिय हो जाते हैं, यानी खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है. यही वजह है कि इस मौसम में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का ख़तरा सामान्य दिनों की तुलना में ज़्यादा हो जाता है.”
सांस संंबंधी दिक़्क़तें
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दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में मेडिसिन डिपार्टमेंट के डायरेक्टर, डॉक्टर पुलिन कुमार गुप्ता कहते हैं, “ठंड बढ़ने से शरीर अपने महत्वपूर्ण अंगों जैसे दिमाग, दिल और लीवर को खून की सप्लाई बनाए रखना चाहता है. इसलिए शरीर की बाहरी नसें, स्किन, हाथ-पैरों की छोटी नसें सिकुड़ जाती हैं.”
इससे हाथ-पैरों और उंगलियों में खून कम पहुंचता है. कई लोगों की उंगलियां या हाथ-पैर ऐसे में नीले पड़ जाते हैं, जिसे रेनॉड्स फ़ेनोमेनन कहते हैं.
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो खून की कमी से ऊतक यानी टिश्यू मरने लगते हैं, जिसे फ्रॉस्टबाइट या ठंड से गैंग्रीन कहा जाता है. इसमें तेज़ दर्द हो सकता है या वह हिस्सा सुन्न पड़ सकता है. सबसे ज़्यादा ख़तरा कान, नाक और उंगलियों को होता है.
डॉक्टर गुप्ता ने ठंड में सांस संबंधी समस्याओं पर भी बात की.
वह बताते हैं, “ठंड में सर्द और शुष्क हवा सांस की नलियों को इरिटेट करती है. इससे खांसी बढ़ जाती है और ब्रोंकाइटिस के अटैक तेज़ हो जाते हैं.”
ठंडी हवा अस्थमा को ट्रिगर कर देती है और एयरवेज सिकुड़ने की वजह से सांस लेना मुश्किल हो जाता है.
सर्दियों में लोग कम पानी पीते हैं, जिससे सांस की नलियों में मौजूद स्राव (म्यूकस) सूख जाता है. यह म्यूकस बैक्टीरिया और वायरस को बाहर निकालने में मदद करता है, लेकिन सूखने पर यह काम ठीक से नहीं कर पाता.
हीटर चलाने से कमरे की हवा और सूखी हो जाती है, जिससे अस्थमा और ब्रोंकाइटिस की तकलीफ़ बढ़ जाती है.
ठंड का मौसम वायरस और बैक्टीरिया जैसे इन्फ़्लुएंज़ा, निमोनिया की ग्रोथ के लिए अनुकूल होता है, जबकि ठंड से इम्युनिटी भी थोड़ी कमजोर हो जाती है. वायरस ठंड में ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, जिससे इंफेक्शन आसानी से फैलता है.
सबसे ज़्यादा ख़तरे में कौन?
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डॉक्टर इस्सर के अनुसार, सर्द हवा से सबसे ज़्यादा ख़तरा उनको होता है जिनका हार्ट पहले से कमज़ोर है, ख़ासकर जिन्हें पहले हार्ट अटैक हो चुका हो.
बुज़ुर्गों में पहले से ही इम्युनिटी कमज़ोर होती है, इसलिए ठंड में इंफ़ेक्शन जैसे निमोनिया, फ़्लू, सांस की तकलीफ़, अस्थमा-सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़) की समस्या का ख़तरा बढ़ जाता है.
डायबिटीज वालों में ब्लड शुगर अनियंत्रित हो सकता है क्योंकि सर्दियों में शारीरिक गतिविधि कम होती है और खान-पान भी प्रभावित होता है. वहीं, कम वजन वाले या किडनी से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों में ठंड दिल और किडनी पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है.
सर्दियों में लोग क्या गलतियां करते हैं?
डॉक्टर इस्सर के अनुसार सर्दियों में कई लोग सुबह उठते ही बिना वार्म-अप के ठंड में बाहर निकल जाते हैं या अचानक भारी एक्सरसाइज या काम शुरू कर देते हैं. यह शरीर के लिए ख़तरनाक होता है क्योंकि ठंड से ब्लड वेसल्स सिकुड़ जाती हैं, जिससे ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट बढ़ता है.
अचानक भारी काम या एक्सरसाइज से हार्ट और ब्रेन पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का रिस्क बढ़ जाता है, ख़ासकर हाइपरटेंशन, दिल की बीमारी या डायबिटीज़ वाले मरीजों में.
डॉक्टर इस्सर कहते हैं कि बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न तो बदलें और न ही बंद करें.
ठंडी हवाओं से खुद को कैसे बचाएं?

डॉक्टर गुप्ता कहते हैं, “सर्दियों में लोग अकसर एक मोटी जैकेट या स्वेटर पहनकर निकलते हैं, लेकिन बेहतर है कई कपड़े पहनना, जैसे इनर, उसके ऊपर शर्ट, फिर स्वेटर और आखिर में जैकेट. क्योंकि हर लेयर के बीच हवा फंस जाती है, और हवा हीट का ख़राब कंडक्टर होती है. यह बॉडी की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है, जिससे ज़्यादा प्रोटेक्शन मिलता है.”
वह सलाह देते हैं कि लोगों को जैकेट के साथ टोपी पहननी चाहिए ताकि कान कवर रहे. पार्क में नंगे पैर चलने से ठंड लग सकती है, ऐसे में जूते और मोजे पहनें.
सुबह-शाम जॉगिंग या एक्सरसाइज के लिए बाहर न निकलें. सर्दियों में तापमान कम होने से प्रदूषण और स्मॉग नीचे आ जाता है, जो सांस की दिक्कत बढ़ाता है. अगर निकलना हो तो दोपहर में जाएं या मास्क पहनकर निकलें. ग्लव्स ज़रूर पहनें, ख़ासकर दोपहिया वाहन, रिक्शा या साइकिल चलाने वाले.
डॉक्टर गुप्ता बताते हैं कि ठंड से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि जितना हो सके घर के अंदर रहें. बाहर जाना बहुत ज़रूरी हो तो मल्टीपल लेयर्स में कपड़े पहनकर निकलें.
वह सलाह देते हैं कि घर गर्म रखने के लिए अंगीठी बिल्कुल न जलाएं क्योंकि उससे कार्बन मोनोऑक्साइड बनता है, जो बिना पता चले नींद में मौत का कारण बन सकता है.
ज़्यादातर इलेक्ट्रिक हीटर हवा से नमी सोख लेते हैं, जिससे खांसी, गले में ख़राश और सांस की तकलीफ़ बढ़ सकती है.
वह सावधानी के तौर पर पूरी रात चलाने की बजाय थोड़े समय के लिए ही हीटर चलाने की सलाह देते हैं.
साथ ही खिड़की या दरवाज़ा थोड़ा खुला छोड़ कमरे में वेंटिलेशन रखने की भी सलाह देते हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.