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हिमालय की घाटी में बसा उत्तराखंड का शहर देहरादून, कुछ हफ़्ते पहले एक ग़लत वजहों से सुर्खियों में आया.
पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा से 1,500 मील से भी ज़्यादा दूरी तय कर दो भाई एंजेल और माइकल चकमा देहरादून आए थे. उनके पिता तरुण चकमा ने बीबीसी को बताया कि 9 दिसंबर को वह बाज़ार गए थे, जहां कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया और कथित तौर पर नस्लीय गालियां दीं.
जब उन्होंने इसका विरोध किया तो उन पर हमला कर दिया गया. माइकल चकमा के सिर पर लोहे के कड़े से वार किया गया, जबकि एंजेल चकमा को चाकू मार दिया गया.
माइकल अब ठीक हो चुके हैं, लेकिन 17 दिन बाद अस्पताल में इलाज के बाद एंजेल चकमा ने दम तोड़ दिया.
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पुलिस ने इस मामले में पांच लोगों को गिरफ़्तार किया है.
हालांकि पुलिस का कहना है कि इस हमले की वजह नस्लीय भेदभाव नहीं है, लेकिन चकमा परिवार ने पुलिस के दावे का तीखा विरोध किया है.
देश के अन्य हिस्सों में भेदभाव
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इस घटना के बाद कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए. इसके साथ ही इससे एक बार फिर सबका ध्यान उस नस्लवाद की ओर भी गया, जिसका सामना पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को करना पड़ता है, जब वह देश के बड़े शहरों में पढ़ाई या काम के लिए जाते हैं.
उनका कहना है कि अक्सर उनके रूप-रंग का मज़ाक उड़ाया जाता है, उनकी राष्ट्रीयता पर सवाल उठाए जाते हैं और सार्वजनिक जगहों, दफ़्तरों में उन्हें परेशान किया जाता है.
कई लोगों के लिए यह भेदभाव सिर्फ़ गालियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मुश्किलें पैदा करता है, जैसे कि वह कहां और कैसे रहते हैं. पूर्वोत्तर के लोगों का कहना है कि मकान मालिक अक्सर उनके रूप-रंग, खाने की आदतों या पहले से बनी उनकी छवि की वजह से उन्हें मकान किराए पर देने से इनकार कर देते हैं.
ऐसे दबावों के चलते बड़े शहरों में पूर्वोत्तर से आए प्रवासी अक्सर कुछ ख़ास मोहल्लों में ही बस जाते हैं. इससे उन्हें सुरक्षा, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक अपनापन मिलता है.
हालांकि कई लोग कहते हैं कि भले ही वे दूसरे शहरों में रोज़मर्रा के पूर्वाग्रहों के साथ रहना सीख लेते हैं ताकि देश में कहीं और भी रह सकें, लेकिन एंजेल चकमा की तरह हिंसक वारदातें उन्हें गहराई से झकझोर देती हैं. ऐसी वारदातें अपनी सुरक्षा को लेकर डर और नाज़ुकपन की भावना को और मज़बूत कर देती हैं.
पिछले कुछ सालों के दौरान भारत में पूर्वोत्तर राज्यों से आने वाले लोगों के साथ नस्लीय हिंसा की कई घटनाएं चर्चा में रहीं.
2014 में नीडो तानिया की हत्या एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गई थी. अरुणाचल प्रदेश के 20 वर्षीय छात्र को दिल्ली में उनके रूप-रंग पर ताने मारे गए और फिर पीट-पीटकर मार डाला गया था. इस घटना का देशभर में विरोध हुआ और इसने नस्लवाद पर बड़ी बहस भी शुरू की.
लेकिन एक्टिविस्ट का कहना है कि इससे ऐसी हिंसा का सिलसिला ख़त्म नहीं हुआ. 2016 में पुणे में पूर्वोत्तर के एक 26 वर्षीय छात्र को पीटा गया. अगले साल बेंगलुरु में एक छात्र को उसके मकान मालिक ने नस्लीय गालियां दीं और उस पर हमला कर दिया.
अधिकार समूहों का कहना है कि ऐसी कई घटनाएं होती हैं जो राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां नहीं बन पातीं.
दिल्ली स्थित राइट्स एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप के निदेशक सुहास चकमा कहते हैं, “दुर्भाग्य से पूर्वोत्तर के लोग जिस नस्लवाद को झेलते हैं वह तभी चर्चा में आता है जब कोई बेहद हिंसक घटना हो जाती है.”
केंद्र सरकार की वार्षिक अपराध रिपोर्टों में नस्लीय हिंसा का डेटा अलग से उपलब्ध नहीं होता.
नस्लवाद को स्वीकार करना ज़रूरी
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असम की अंबिका फोंग्लो राजधानी दिल्ली में रहती और काम करती हैं. एंजेल चकमा की हत्या ने उन्हें अंदर तक हिला दिया है. वह कहती हैं, “हमारे चेहरे की बनावट, जैसे कि पतली आंखें और चपटी नाक, हमें नस्लवाद का आसान शिकार बना देती हैं.”
फोंग्लो बताती हैं कि कुछ साल पहले दफ़्तर में चर्चा के दौरान सहकर्मी उन्हें नस्लीय नामों से बुला रहे थे. वह कहती हैं, “आप इसे झेलते हैं और आगे बढ़ना सीख जाते हैं लेकिन यह अनुभव गहरा मानसिक संत्रास छोड़ जाता है.”
पड़ोसी राज्य मेघालय की मैरी वाहलांग बताती हैं कि उन्होंने कर्नाटक में कॉलेज पूरा करने के बाद बड़े शहरों में नौकरी तलाशने का इरादा छोड़कर घर लौटने का फ़ैसला कर लिया था. वजह थी बार-बार सहपाठी उन्हें नस्लीय नामों से बुलाते थे.
वह कहती हैं, “समय के साथ मुझे लगा कि कुछ लोग बिना सोचे-समझे नस्लीय या तकलीफ़देह बातें करते थे जबकि कुछ लोग जानते-बूझते हुए भी ऐसा करते थे.”
एक्टिविस्ट कहते हैं कि ऐसे अनुभव अलग-थलग नहीं हैं. पूर्वोत्तर राज्यों के लोग बताते हैं कि देश के बड़े शहरों के कार्यस्थलों, कॉलेजों और सार्वजनिक जगहों पर नस्लीय ताने कसे जाना और रोज़मर्रा का भेदभाव उनकी ज़िंदगी का सामान्य हिस्सा बन चुका है.
लोग कहते हैं कि हालांकि पूर्वोत्तर क्षेत्र और वहां के लोगों के प्रति बरते जाने वाले नस्लवाद को लेकर जागरूकता पिछले वर्षों में बढ़ी है, लेकिन रोज़मर्रा का लापरवाही से किया जाने वाला नस्लभेद अब भी मौजूद है.
भारतीय शहरों में नस्लीय हिंसा की बढ़ती शिकायतों के बाद केंद्र सरकार ने 2018 में एक निगरानी समिति का गठन किया था. अलाना गोलमेई इसकी सदस्य हैं. वह कहती हैं, “हम पूरी तरह भारतीय कैसे दिखें? अफ़सोस कि इसका कोई साफ़ जवाब नहीं है.”
उनका कहना है कि ऐसे हमलों को नस्लवाद से जुड़ी हुई घटनाएं न मानकर अलग-थलग मामले मान लेना दरअसल समस्या को और जटिल करता है. उन्होंने बीबीसी से कहा, “सबसे पहले समस्या को स्वीकारना और पहचानना ज़रूरी है, तभी उसका समाधान शुरू हो सकता है.”
नस्लवाद-विरोधी क़ानून की ज़रूरत
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एंजेल चकमा की हत्या ने एक विशेष नस्लवाद-विरोधी क़ानून की मांग को फिर से तेज़ कर दिया है. कई छात्र संगठनों और नागरिक समूहों ने खुले पत्र जारी कर क़ानूनी सुधार की मांग की है.
2014 में नीडो तानिया की मौत के बाद भारत सरकार ने यह जांच करने के लिए एक समिति बनाई थी कि पूर्वोत्तर के लोग जब देश में अन्य जगहों पर रहते हैं तो उन्हें किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है.
इस समिति ने उसी साल गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. इसमें व्यापक रूप से मौजूद नस्लवाद को स्वीकार किया गया और कई उपाय सुझाए गए. इनमें एक अलग नस्लवाद विरोधी क़ानून, तेज़ गति से जांच और संस्थागत सुरक्षा जैसे उपाय शामिल थे.
लेकिन एक्टिविस्ट का कहना है कि तब से अब तक बदलाव बहुत कम हुआ है. अलग से कोई नस्लवाद-विरोधी क़ानून नहीं बना और कई सिफ़ारिशों पर ठीक से अमल ही नहीं किया गया. बीबीसी ने इस पर केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला.
नस्लवाद विरोधी क़ानून की नई मांग ने एक व्यापक बहस को जन्म दिया है कि क्या सामाजिक व्यवहार में जड़ें जमाए पूर्वाग्रहों को कोई क़ानून दूर कर सकता है. चकमा और गोलमेई जैसे विशेषज्ञ और एक्टिविस्ट कहते हैं कि हां, यह संभव है.
वे दहेज और जाति-आधारित अत्याचारों को अपराध घोषित करने वाले क़ानूनों का उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि भले ही इनसे अत्याचार पूरी तरह ख़त्म नहीं हुए, लेकिन पीड़ित सशक्त हुए हैं और जागरूकता बढ़ी है.
गोलमेई कहती हैं, “एक नस्लवाद-विरोधी क़ानून पीड़ितों को सशक्त बना सकता है, शिकायत दर्ज करने को आसान बना सकता है और नस्लीय दुर्व्यवहार को साफ़ तौर पर आपराधिक जवाबदेही के दायरे में ला सकता है.”
इस बीच त्रिपुरा में तरुण चकमा अपने बड़े बेटे का शोक मना रहे हैं और छोटे बेटे को लेकर असमंजस में हैं.
समाजशास्त्र के अंतिम वर्ष के छात्र माइकल को पढ़ाई पूरी करने के लिए देहरादून लौटना है. परिवार ने उन्हें सावधानी बरतने की सलाह दी है, लेकिन तरुण चकमा कहते हैं कि वे बेटे की सुरक्षा को लेकर डर और उसकी पढ़ाई छोड़ देने से होने वाले नुकसान के बीच फंसे हुए हैं.
तरुण चकमा कहते हैं, “आख़िरकार, बेहतर भविष्य के लिए उच्च शिक्षा दिलाना ही वह वजह थी जिसके चलते हमने अपने बेटों को घर से इतनी दूर भेजा था.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.