इमेज स्रोत, Mohar Singh Meena
राजस्थान के बीकानेर में 500 लोग खेजड़ी के पेड़ काटे जाने के ख़िलाफ़ आमरण अनशन पर बैठे हुए थे.
हालांकि सरकार के आश्वासन के बाद बीकानेर के पर्यावरण बचाओ महापड़ाव में गुरुवार देर रात लोगों ने ये अनशन तो तोड़ दिया लेकिन महापड़ाव स्थल पर धरना लगातार जारी है.
आंदोलन कर रहे लोगों की मांग है कि पूरे राजस्थान में खेजड़ी कटाई पर रोक लगाई जाए.
आंदोलनरत लोग बिना लिखित आश्वासन के मानने को तैयार नहीं हैं.
खेजड़ी के पेड़ राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति, पशुपालन, और जीवन व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं.
1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में अमृता देवी बिश्नोई समेत 363 लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया था और “सिर सांटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण” सिर्फ़ एक नारा नहीं बल्कि प्रकृति और समाज के रिश्ते की अमिट मिसाल बन गया था.
अब सौर ऊर्जा प्लांट्स के लिए खेजड़ी के पेड़ काटे जाने के ख़िलाफ़ वही चेतावनी फिर गूंज रही है, “सिर कटा देंगे लेकिन खेजड़ी नहीं कटने देंगे.”
आंदोलन के चौथे दिन मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने विधानसभा में खेजड़ी संरक्षण के लिए क़ानून बनाने की घोषणा की है. हालांकि आंदोलनकारी लिखित आश्वासन मिले बिना आंदोलन ख़त्म करने को तैयार नहीं हैं.
महापड़ाव और सामूहिक आमरण अनशन
इमेज स्रोत, Mohar Singh Meena
पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर, बाड़मेर, फलोदी और जैसलमेर समेत कई इलाक़ों से लाखों की संख्या में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई की ख़बरें आ रही थीं. स्थानीय स्तर पर लगातार पर्यावरण प्रेमी खेजड़ी की कटाई का विरोध कर रहे थे.
सरकार पर इस विरोध को नज़रअंदाज़ करने और विकास के नाम विनाश करने का आरोप लगाते हुए दो फरवरी को बीकानेर में महापड़ाव बुलाया गया. खेजड़ी बचाने के लिए इसमें सैकड़ों की संख्या में पर्यावरण प्रेमी जुटे.
ज़िला कलेक्टर कार्यालय के पास एक खेजड़ी का पेड़ मौजूद है, इसकी छांव में पुलिस के कर्मचारी और अधिकारी खड़े हैं. इसके सामने जारी आमरण अनशन के तीसरे दिन लोगों की तबियत बिगड़ने लगी थी. कुछ को आईसीयू में भर्ती करवाना पड़ा.
यह सामूहिक आमरण अनशन महंत स्वामी सच्चिदानंद आचार्य के नेतृत्व में शुरू हुआ था.
आचार्य ने बीबीसी से कहा, “यह सरकार की दोहरी नीति है कि एक पेड़ मां के नाम पर लगाया जा रहा है और दूसरी ओर दादा-दादी के नाम से लगाए गए सैकड़ों साल पुराने पेड़ काटे जा रहे हैं.”
सोलर प्लांट और खेजड़ी के पेड़
इमेज स्रोत, Shivam bikaneri
बीकानेर-जयपुर हाइवे पर दोनों तरफ़ कई जगह सोलर प्लांट लगे हैं. इनमें सिर्फ़ सोलर प्लेटों की एक काली चादर दिखाई पड़ती है. इन प्लांटों के पास कटे हुए पेड़ों के अवशेष दिखाई देते हैं. ये हालात पश्चिमी राजस्थान के लगभग सभी ज़िलों में हैं.
महापड़ाव और आमरण अनशन में शामिल महिलाओं की तादाद भी कम नहीं हैं. वह अपने परिवार और बच्चों को छोड़ कर खेजड़ी बचाने के लिए घरों से निकल आई हैं.
अनशन कर रहीं इंद्रा बिश्नोई कहती हैं कि, “खेजड़ी के लिए हम सब अमृता देवी बिश्नोई की तरह बन कर बैठी हैं, जो उन्होंने किया वही हम करेंगे. हम सिर कटाने के लिए तैयार हैं, लेकिन खेजड़ी नहीं कटने देंगे.”
पर्यावरण संघर्ष समिति के संयोजक परसराम बिश्नोई की इस महापड़ाव में महत्वपूर्ण भूमिका है. महापड़ाव स्थल पर उन्होंने बीबीसी से कहा, “296 साल बाद अब फिर हम वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने को तैयार हैं.”
वह कहते हैं, “केंद्र और राज्य सरकार बंजर जमीन पर सोलर प्लांट लगाने और ग्रीन एनर्जी के नाम पर एक क़ानून लाई. इस क़ानून में धीरे-धीरे संशोधन करके बीकानेर, फलोदी, बाड़मेर, जैसलमेर इन क्षेत्रों में सैकड़ों साल पुराने लाखों पेड़ काट दिए.”
“सरकार हमारी बातें सुन नहीं रही है, मजबूरन हमें महापड़ाव करना पड़ा है. सरकार जब तक हमारी बात नहीं सुनेगी तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा.”
इमेज स्रोत, Mohar Singh Meena
महंत स्वामी सच्चिदानंद आचार्य कहते हैं कि तुरंत प्रभाव से चीफ सेक्रेटरी सर्कुलर जारी करें कि राजस्थान में किसी भी सूरत में पेड़ों की कटाई नहीं होगी. हमें मरना मंजूर है लेकिन हटेंगे नहीं.
संयोजक परसराम बिश्नोई कहते हैं, “खेजड़ी को राजकीय वृक्ष का दर्जा मिला है और उसे ऐसे काटा जा रहा है, जैसे घास हो.”
बता दें कि खेजड़ी राजस्थान और मरुस्थलीय इलाकों में जीवन का आधार माना जाता है. यह पेड़ केवल हरियाली नहीं बल्कि पर्यावण, खेती और पशुपालन का मज़बूत सहारा माना जाता है.
राजस्थान विश्वविद्यालय में वनस्पतिशात्र के असिस्टेंट प्रोफेसर और महाराजा कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल डॉक्टर ऋषिकेश मीणा कहते हैं कि, “बेहद कम पानी में पनपने वाली खेजड़ी मरुस्थलीकरण को रोकती है. अपनी गहरी जड़ों के जरिए मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है. इसे किसान के लिए फसल मित्र भी कहा जाता है.”
वह बताते हैं कि, “खेजड़ी की पत्तियां, तना, जड़ें और फल सभी बेहद उपयोगी है. अस्थमा में इसकी पत्तियों को उबाल कर पीने से राहत मिलती है. इसके फल सांगरी बेहद पौष्टिक होते हैं, इसकी सब्ज़ी बनाई जाती है. इसके पत्तियों को खाने से पशुओं में कैल्शियम की कमी खत्म होती है. सूजन या जलन होने पर इसकी पत्तियों के उपयोग करने से भी आराम मिलता है. फोड़े-फुंसी होने पर इसके तने की छाल को उबाल कर लगाने से राहत मिलती है.”
डॉक्टर मीणा के अनुसार, “इसके फूल डायबिटीज़ और गर्भपात रोकने में मददगार होते हैं. कई शोध में यह सामने आया है कि कैंसर रोधी दवाइयों में पोर्च और जड़ों का उपयोग किया जाता है.”
इमेज स्रोत, Mohar Singh Meena
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
इमेज स्रोत, Mohar Singh Meena
बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर डॉक्टर अनिल छंगाणी ने बीते 10 साल में पश्चिमी राजस्थान में सोलर प्लांट लगाने और खेजड़ी की कटाई को लेकर शोध किया है.
वह दावा करते हैं, “इसी तेज़ी से ग्रीन एनर्जी के नाम पर सोलर प्लांट लगाते रहे तो आने वाले पांच से छह साल में इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे.”
“हमारी 80 फ़ीसदी वाटर बॉडीज सूख चुकी हैं, जहां सोलर प्लांट लगे हैं, वहाँ एग्रीकल्चर और हॉर्टिकल्चर ज़ीरो हो गया है. वहां जितने बर्ड्स, कीट पतंगे, मेमल, रेपटाइल्स थे, उनके घर ख़त्म हो गए, उनकी ब्रीडिंग साइट्स ख़त्म हो गई हैं.”
“यह जैव विविधता पर सीधा-सीधा असर है.”
इमेज स्रोत, Ravi Bishnoi
बिट्स रांची के तापमान के डेटा की स्टडी का हवाला देते हुए वह कहते हैं, “हमने पाया कि जहाँ सोलर प्लांट लगे हैं, वहाँ तापमान ज़्यादा है, दूर जाने पर तापमान दो डिग्री तक कम है और कुछ दूर जाने पर तापमान सामान्य है.”
“गर्मियों की दोपहर में यहां हूटर बजते हैं कि आगे सप्लाई की डिमांड नहीं रही है तो बंद कर दीजिए. उस दौरान सोलर प्लांट का सौ फ़ीसदी रेडिएशन पर्यावरण में रह जाता है.”
“बीकानेर, फलोदी, जैसलमेर, बाड़मेर में जो एनर्जी उत्पादन हो रहा है, इसको खुली तारों से सप्लाई कर रहे हैं, इससे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, वल्चर, माइग्रेटरी बर्ड्स भी मर रही हैं.”
प्रोफ़ेसर डॉक्टर छंगाणी कहते हैं, “1984 में सेंट्रल एरा ज़ोन रिसर्च इंस्टीट्यूट की ओर से खेजड़ी के पेड़ों को लेकर एक सर्वे किया गया था. उसमें पता चला था कि एक हेक्टेयर में कहीं चालीस पेड़ थे, कहीं साठ और कहीं पर डेढ़ सौ.”
“अगर एक लाख हेक्टेयर में सोलर प्लांट लगाया गया है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने लाख पेड़ कट चुके हैं.”
खेजड़ी के अलावा केर, बेर, बबूल, हिंगोटा समेत कई तरह के पेड़ और घास भी नष्ट किए जा रहे हैं.
डॉक्टर छंगाणी कहते हैं, “पश्चिमी राजस्थान में 80 फीसदी ट्रेडिशनल सोलर प्लांट लगे हुए हैं, जिनकी प्लेट साफ़ करने के लिए नाड़ी, तालाब और पोखर से सारा पानी खिंचवा लिया गया है. इससे पानी का संकट हो गया है, जिससे परंपरागत बायोडायवर्सिटी प्रभावित हुई है.”
वह दावा करते हैं, “यही स्थिति रही तो आगामी डेढ़ से दो दशक में ड्रोन से सर्वे होंगे और इन सोलर प्लेटों को हटाना पड़ेगा.”
दूसरे विकल्प
इमेज स्रोत, Mohar Singh Meena
सरकारों ने सोलर प्लांट लगाने के लिए कंपनियों को हज़ारों हेक्टेयर ज़मीनें दी हैं. वहीं, कुछ किसान भी अपनी ज़मीनें कंपनियों को लीज पर दे रहे हैं.
आंदोलनकारियों में भी कुछ ऐसे किसान शामिल हैं जिन्होंने आवेदन किया और उन्हें आवंटन भी हो गए.
नाम न छापने की शर्त पर फलोदी के एक ऐसे ही किसान ने बीबीसी से कहा, “बारिश पर निर्भर खेती से गुज़ारा संभव नहीं है, ऐसे में प्लांट लगाने के लिए आवेदन किया और हमारी करीब सौ बीघा जमीन पर प्लांट आवंटित भी हो गया. अब उसके नुक़सान समझ में आ रहे हैं इसलिए हम अपना आवेदन वापस लेने जा रहे हैं.”
प्रोफ़ेसर छंगाणी कहते हैं, “जब सब नष्ट हो जाएगा तब यही सरकारें करदाताओं के पैसे से ग्रीन कॉरिडोर बनाएंगीं, करोड़ों रुपए की ज़मीनें खरीदी जाएंगी, लाखों रुपए के पौधे लगाए जाएंगे, पंचायतों में रुपए बांटे जाएंगे. लेकिन तब तक देर हो जाएगी.”
प्रोफ़ेसर कहते हैं, “हम सोलर एनर्जी के विरोधी नहीं हैं. लेकिन, इस तरह पेड़ काटकर और रेगिस्तान में पानी को ख़त्म कर तबाही लाने के हक़ में नहीं हैं. पेड़ काटे बिना और प्लेटों को पानी से साफ़ किए बिना भी सौर ऊर्जा प्लांट लगाने के विकल्प मौजूद हैं.”
“सत्रह सौ किलोमीटर लंबी कैनाल है उस पर लगाए जा सकते हैं जिससे पानी का बीस से पच्चीस फ़ीसदी वाष्पीकरण भी बचेगा. सड़कों के दोनों किनारे पिलर लगा कर सोलर प्लेट्स लगाई जा सकती हैं.”
वह अन्य राज्यों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि, “ऐसा करने वाले हम पहले नहीं होंगे, गुजरात में नर्मदा नदी के ऊपर बहुत पहले किया हुआ है. पंजाब ने भी किया हुआ है और हरियाणा में भी कई जगह लगाए हुए हैं.”
हिंदी साहित्य अकादमी उदयपुर के पूर्व अध्यक्ष दुलाराम सारण बीबीसी से कहते हैं, “यह सोलर प्लांट मुहिम नहीं है, इसे खेती तबाही की योजना मान सकते हैं.”
वह कहते हैं, “ऊर्जा ज़रूरी है उसको नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. लेकिन उसके विकल्प हो सकते हैं जैसे हर शहर के राजकीय भवनों की छतों पर, सरकारी जगह हैं, नहरें है, रेलवे लाइनें हैं उनके ऊपर सोलर प्लेट लगाई जा सकती हैं.”
सीएम की कानून बनाने की घोषणा
इमेज स्रोत, CM Rajasthan office
अनशन के चौथे दिन गुरुवार को मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा ने विधानसभा में खेजड़ी संरक्षण के लिए कानून बनाने की घोषणा कर दी.
मुख्यमंत्री ने कहा कि, “मैं राजस्थान की जनता को आश्वस्त करना चाहता हूं कि कि राज्य वृक्ष खेजड़ी को बचाने के कानून लाएंगे. जिससे प्रदेश में खेजड़ी का संरक्षण हो सके.”
उन्होंने आगे कहा, “अगस्त में पर्यावरण प्रेमी संत मुझसे मिले थे जो बीकानेर, फलोदी, जोधपुर, नागौर ज़िलों के थे. मैंने उस समय खेजड़ी संरक्षण कानून बनाने के लिए निर्देश दिए थे. प्रक्रिया चल रही है और हम जल्द ही उसका मसौदा प्रस्तुत करेंगे.”
इससे पहले कैबिनेट मंत्री केके बिश्नोई ने बीकानेर में जूस पिला कर कुछ संतों का अनशन तुड़वाया था. लेकिन, जैसे ही उन्होंने घोषणा की कि, जोधपुर और बीकानेर संभाग में खेजड़ी की कटाई पर रोक लगाई जाती है… अनशनकारी विरोध करने लगे. उनका कहना है कि जबतक पूरे राजस्थान में खेजड़ी की कटाई पर प्रतिबंध नहीं लगेगा तब तक आंदोलन जारी रहेगा.
इस दौरान विवाद भी देखने को मिला. मंत्री केके बिश्नोई मंच से नारे लगवा रहे थे इसी दौरान एक संत ने उनके हाथ से माइक छीन लिया और कहा कि इधर-उधर की बातें न करें.
इस सबके बीच बीकानेर में खेजड़ी बचाओ आंदोलन का महापड़ाव जारी है. अनशनकारी अपनी मांगों पर सरकार से लिखित में नहीं मिलने तक आमरण अनशन ख़त्म करने को तैयार नहीं हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.