
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 11 मार्च 2026 को एक ऐतिहासिक फ़ैसला दिया है, जिसके ज़रिए कोर्ट ने 32 साल के हरीश राणा के जीवन रक्षक इलाज को रोकने की इजाज़त दे दी है.
कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा, ”हरीश के परिवार से हम कहना चाहते हैं कि हमें इस बात का अहसास है कि यह फ़ैसला भावनात्मक रूप से कितना मुश्किल है. यह फ़ैसला कभी-कभी समर्पण या हार मानने जैसा लग सकता है लेकिन हमारे मुताबिक़, यह दरअसल गहरी करुणा और साहस भरा क़दम है.”
“आप अपने बेटे को छोड़ नहीं रहे हैं. आप उसे गरिमा के साथ विदा होने की इजाज़त दे रहे हैं. यह आपके निःस्वार्थ प्रेम और उसके प्रति आपकी गहरी निष्ठा दिखाता है.”
यह फ़ैसला जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया.
हरीश राणा साल 2013 से ‘वेजिटेटिव’ हालत में हैं. यानी वो ज़िंदा हैं, लेकिन उनमें चेतना नहीं है और वो अपने शरीर पर किसी तरह क़ाबू नहीं कर सकते.
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ख़बरों में इसे ‘पैसिव यूथेनेशिया’ या निष्क्रिय इच्छामृत्यु भी कहा जा रहा है. वहीं, अदालत ने कहा कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की जगह अब ‘चिकित्सीय उपचार को रोकना या हटा देना’ शब्द इस्तेमाल किया जाएगा.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस सिलसिले में व्यापक क़ानून बनाने पर विचार करने को भी कहा है.
भारत में अदालती मंज़ूरी के साथ जीवन रक्षक उपचार वापस लेने या रोकने वाला यह पहला मामला बताया जा रहा है.

दूसरी ओर, कोर्ट ने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को यह निर्देश दिया है कि हरीश के ‘लाइफ़ सपोर्ट’ को हटाने के लिए एक ख़ास योजना तैयार की जाए. ताकि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मरीज़ की गरिमा और उनका सम्मान बना रहे.
फ़ैसले के बाद हरीश के पिता अशोक राणा ने बीबीसी को भेजे एक बयान में कहा कि यह उनके लिए बहुत कठिन फ़ैसला है, लेकिन वो हरीश के सबसे बेहतर हित में यह फ़ैसला कर रहे हैं.
हरीश राणा कौन हैं और उनके साथ क्या हुआ था

साल 2013 में हरीश राणा चंडीगढ़ में एक यूनिवर्सिटी से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. हरीश चंडीगढ़ में जहाँ रह रहे थे वहाँ की चौथी मंज़िल से गिर गए.
इससे उन्हें गहरी और गंभीर चोटें आईं. शुरुआत में उनका इलाज चंडीगढ़ के पीजीआई में चला, लेकिन उसके बाद दिल्ली एम्स और कई निजी अस्पतालों में भी उनका इलाज हुआ. इलाज के दौरान ही उन्हें साँस लेने में मदद और खाने-पीने के लिए नली लगाई गई थी.
हरीश के पिता अशोक ने एक बार बीबीसी को बताया था, “डॉक्टर ने हमें कहा कि इसके दिमाग़ की नसें पूरी तरह सूख गई हैं. यहाँ तक कि उन्होंने यह भी कहा कि सीटी स्कैन भी करवाने की ज़रूरत नहीं. हम कई जगह ले गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. हम सुनते हैं, अख़बारों में पढ़ते हैं, चमत्कार के बारे में. हमारे साथ न दुआओं ने काम किया और न ही दवाओं ने.”
बेटे के इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के द्वारका में अपना मकान भी बेचना पड़ा था.
हरीश के परिवार की वकील रश्मि नंदकुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिंदी को बताया कि उनकी जानकारी में यह पहला केस है, जहाँ खाने की नली को ‘लाइफ़ सपोर्ट’ यानी जीवन रक्षक बताया गया है.
हरीश राणा का मामला कैसे पहुँचा कोर्ट

हादसे के बाद से ही हरीश पूरी तरह ‘वेजिटेटिव’ हालत में हैं. उनकी देखभाल उनके परिजन करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़, इतने वर्षों में हरीश की तबीयत में कोई सुधार नहीं आया.
कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल रिपोर्ट और परिजनों के बयानों के मुताबिक़, हरीश की हालत में सुधार की कोई उम्मीद नहीं दिखती, ऐसे में उस इलाज को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है जो सिर्फ़ बिना वजह उनकी तकलीफ़ और लंबी करे.
साल 2018 में कॉमन कॉज़ बनाम भारत सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट ने किसी मरीज़ के चिकित्सीय इलाज रोकने के लिए कुछ दिशा-निर्देश दिए थे. बोलचाल में इन्हें ‘कॉमन कॉज़ गाइडलाइन’ कहते हैं.
गाइडलाइन के हिसाब से किसी मरीज़ का इलाज रोकने का फ़ैसला लेने के लिए अस्पताल में प्राइमरी मेडिकल बोर्ड और सेकेंडरी बोर्ड गठित किए जाएँगे. इस बोर्ड में शामिल डॉक्टर और विशेषज्ञ मरीज़ की हालत के बारे में अपनी रिपोर्ट देंगे.
वकील रश्मि नंदकुमार ने बताया कि “हरीश का केस पेचीदा था. हरीश किसी अस्पताल में नहीं थे. घर पर थे और वहीं उन्हें इलाज मिल रहा था. इसलिए उनकी हालत परखने और मेडिकल बोर्ड के गठन के लिए साल 2024 में परिवार वालों ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख़ किया.”
साल 2024 में हाईकोर्ट ने उनकी इस अर्ज़ी को ख़ारिज़ कर दिया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की लेकिन उस वक़्त उन्हें वहाँ से भी कोई राहत नहीं मिल सकी.
हालाँकि, अदालत ने उन्हें यह इजाज़त दी कि ज़रूरत पड़ने पर वे दोबारा कोर्ट आ सकते हैं. इसके बाद परिवार ने पिछले साल एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की.
साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ग़ाज़ियाबाद में एक प्राइमरी मेडिकल बोर्ड और एम्स में सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड गठित किए.
दोनों बोर्ड का मानना था कि हरीश अब स्थाई रूप से ‘वेजिटेटिव’ हालत में हैं. उन्हें मिल रहा इलाज उन्हें ज़िंदा रखने के लिए तो ज़रूरी है लेकिन उनकी हालत में सुधार लाने में शायद वे नाक़ामयाब रहेंगे.
ये रिपोर्ट और हरीश के परिजनों के बयान, कोर्ट के इस फ़ैसले का एक अहम आधार बने.
भारत में यूथेनेशिया या इच्छामृत्यु पर बहस
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साल 1996 में ज्ञान कौर बनाम पंजाब सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत गरिमा के साथ ‘जीने का अधिकार’ में ‘मरने का अधिकार’ शामिल नहीं है.
हालाँकि, तब शानबाग की देखभाल कर रही नर्सों के विरोध की वजह से इसकी रज़ामंदी नहीं दी गई थी. अरुणा शानबाग की मौत साल 2015 में निमोनिया की वजह से हुई.
यौन हिंसा और जानलेवा हमले के बाद अरुणा शानबाग 42 साल बिस्तर पर एक ‘वेजिटेटिव’ हालत में थीं.
साल 2005 में ‘कॉमन कॉज़’ नाम की संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इस याचिका में अनुच्छेद 21 के तहत ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की माँग की गई थी.
साथ ही कोर्ट से यह भी कहा गया था कि गंभीर रूप से बीमार या इलाज से भी जिनके बचने की उम्मीद न हो, ऐसे मरीज़ों को ‘लिविंग विल’ बनाने की इजाज़त दी जाए, ताकि वे पहले से तय कर सकें कि ऐसी हालत में उनका इलाज कैसे किया जाएगा.
‘लिविंग विल’ एक तरह से इलाज की वसीयत है. इसके तहत कोई बीमार शख़्स अपनी ज़िंदगी के देखभाल से जुड़ी इच्छाएँ दर्ज कर सकता है. यह ख़ासकर तब काम आता है, जब कोई शख़्स खुद फ़ैसला लेने की हालत में न हो.
यही मामला आगे चलकर साल 2018 में ‘कॉमन कॉज़’ बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फ़ैसले तक पहुँचा. इस फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सख़्त शर्तों के साथ ‘लिविंग विल’ और ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की इजाज़त दी.
कॉमन कॉज़ एक मशहूर संस्था है. यह सरकारी पारदर्शिता और आम आदमी के मौलिक अधिकारों के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ती है.
अंग्रेज़ी अख़बार ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कॉमन कॉज़ बनाम भारत सरकार के केस में साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) का रास्ता साफ़ किया. हालाँकि, ‘यूथेनेशिया’ या सक्रिय इच्छामृत्यु भारत में अभी भी ग़ैरक़ानूनी है.
वकील रश्मि नंदकुमार ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से बातचीत में कहा, “पहले की गाइडलाइंस बिना किसी असल ज़िंदगी के केस के मद्देनज़र बनाई गई थीं. यह पहली बार है, जब इन गाइडलाइंस को व्यवहारिक तौर से एक असल केस में इस्तेमाल किया जा रहा है.”
सक्रिय या निष्क्रिय इच्छामृत्यु क्या है
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अदालत ने ‘एक्टिव’ और ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु) में भी फ़र्क़ साफ़ किया है.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक़, ‘पैसिव यूथेनेशिया’ आम तौर पर तब होता है जब कोई मरीज़ लाइलाज हालत में हो या उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न बची हो.
ऐसी सूरत में उसे ज़िंदा रखने वाले इलाज या ‘लाइफ़-सपोर्ट’ जीवन रक्षक तरीक़ों को रोक दिया जाए या हटा लिया जाए.
इसके विपरीत, ‘एक्टिव यूथेनेशिया’ में जानबूझकर ऐसा क़दम उठाया जाता है जिससे मरीज़ की मौत हो जाए. जैसे कि जानलेवा इंजेक्शन देना.
‘द हिन्दू’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, बुधवार को अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘पैसिव यूथेनेशिया’ एक पुराना और काफी भ्रमित करने वाला शब्द है.
आगे क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़, हरीश को अब दिल्ली के एम्स में भर्ती कराया जाएगा. कोर्ट ने अपने आदेश में एम्स को भर्ती की प्रक्रिया तय करने की ज़िम्मेदारी भी दी है.
बीबीसी हिन्दी ने हरीश के मामले में आगे की प्रक्रिया जानने के लिए एम्स के कम्युनिकेशन ऑफिस और पैलिएटिव डिपार्टमेंट में फ़ोन किया लेकिन उन्होंने किसी तरह की जानकारी देने से मना कर दिया.
‘पैलिएटिव केयर’ ऐसी चिकित्सा देखभाल है जिसमें गंभीर या लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीज़ के दर्द, तकलीफ़ और इस तरह के अन्य लक्षणों को कम करने पर ध्यान दिया जाता है.
इसका मक़सद, मरीज़ जब तक ज़िंदा है, उसे जितना मुमकिन हो उतना आराम और बेहतर जीवन देना होता है.
‘पैलिएटिव केयर’ के बारे में समझने के लिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी ने एम्स के ‘पैलिएटिव केयर’ विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष डॉक्टर संगीता भटनागर से बातचीत की.
उन्होंने बताया, “पैलिएटिव केयर का सिद्धांत है कि अगर मरीज़ ठीक नहीं हो सकते तो हम उनका ख़याल रखेंगे ताकि उनके जीवन का अंत गरिमा के साथ हो. मरीज़ को जितनी भी समस्याएँ होंगी, जैसे दर्द या अन्य कोई दिक़्क़त, उसके उपाय किए जाएँगे. लेकिन ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे उनकी ज़िंदगी लंबी हो जाए. जैसे कि आईसीयू का सहारा लेना या वेंटिलेटर पर रखना.”
हरीश के परिवार ने और क्या कहा

हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए मीडिया से कहा, “हमने न्यायालय का रुख़ तब किया जब हमें अहसास हुआ कि हमारे बेटे की स्थिति असाध्य और लाइलाज है. इससे पहले, कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में न्यायालय ने चिकित्सा उपचार विशेष रूप से जीवन रक्षक उपचार बंद करने के लिए दिशानिर्देश और शर्तें निर्धारित की थीं.”
“हम केवल यही चाहते थे कि ये दिशानिर्देश हमारे बेटे के मामले में भी लागू हों. सुप्रीम कोर्ट ने ठीक यही किया है. कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि इसे किसी भी तरह से ‘सक्रिय इच्छा मृत्यु’ नहीं कहा जाना चाहिए. सक्रिय इच्छा मृत्यु किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए घातक इंजेक्शन देना है.”
“हरीश के मामले में उसे वर्तमान में पीईजी ट्यूब के रूप में जो जीवन रक्षक उपचार मिल रहा है, उसे बंद कर दिया जाएगा और उसे उचित दर्दनिवारक दवाएँ और आरामदेह देखभाल दी जाएगी ताकि कुदरत अपना काम कर सके.”
हरीश के पिता ने कहा, “जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, यह हमारे परिवार के लिए एक बहुत ही कठिन फ़ैसला है, लेकिन हम हरीश के सबसे बेहतर हित में काम करना चाहते हैं.”
“हमें यह भी उम्मीद है कि कोर्ट का फ़ैसला और उसके निर्देश अन्य लोगों के लिए भी इसी तरह के मानवीय व्यवहार का रास्ता तैयार करेंगे.”
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.